सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी १७१
तंत्र
सनातन धर्म में उपासना की पद्धति वैदिक, तांत्रिक और पौराणिक तीन प्रकार की है। तथापि द्विजों के लिये मिश्रित पद्धति काम में लाई जाती है, जो द्विज नहीं हैं उनको वेदों का अधिकार नहीं दिया गया है, वे तांत्रिक और पौराणिक उपासनाओं में ही दीक्षित किये जाते हैं। तांत्रिक उपासना के दो भेद हो गए हैं-- समयाचार और कौलाचार, जिनको दक्षिण और वाम मार्ग भी कहते हैं। ब्राह्मणों के लिये कौलाचार निषिद्ध है, क्योंकि उसमें पंचमकार अर्थात् मांस, मदिरा, मत्स्य, मैथुन और मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। वामाचार के कारण ही साधारण जनता की दृष्टि में सारी तांत्रिक उपासना बदनाम हो रही है। यद्यपि पंचमकारों का आध्यात्मिक अर्थ भी किया जाता है, जैसे मदिरा से सोमपान, मैथुन से शिवशक्ति का सहस्रार में योग, इत्यादि; और कुलार्णव तंत्र में स्पष्टतया उनका निषेध कराने के लिये साधकों को चेतावनी दी गयी है कि इनका प्रयोग करने वाला मनुष्य नर्कगामी होता है। परन्तु तो भी यह निर्विवाद मानना पड़ता है कि सब साधक आध्यात्मिक दृष्टि वाले नहीं होते। प्रायः अधिक मनुष्यों का लक्ष्य सांसारिक भोगों की उपलब्धि तक ही सीमित रहता है। उक्त ६४ तंत्रों में ऐसी ही सिद्धियां प्राप्त करने के साधन हैं, जो सच्चे जिज्ञासु को पथभ्रष्ट कर सकते हैं। श्री अरविन्दजी इस विषय पर कल्याण के ‘शक्ति अंक’ में पृष्ठ ३२ पर प्रकाशित एक लेख में लिखते हैं कि “विशेषकर तंत्र के वाम मार्ग में ऐसी २ बातें आ गई हैं, जिनसे न केवल अच्छे बुरे का, पापपुण्य का कोई विचार न रहा प्रत्युत पाप पुण्यादि द्वंद्वों के स्थान में स्वभाव नियत सद्धर्म की स्थापना होने के बजाय