सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 226, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७६ | सौन्दर्य लहरी |
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यह हादि लोपा मुद्रा का मंत्र बताया गया है । इसके १५ अक्षर हैं ।
अर्थः— हे नित्ये ! स्मर, (काम), योनि (त्रिकोण), लक्ष्मी इन तीनों को तेरे मंत्र के आदि (अक्षरों के स्थान) पर रखकर निरवधि महा भोग के रसिक तेरे कुछ भक्त, चिन्तामणियों की गुंथी हुई अक्ष माला पर तेरा भजन करते हैं, और शिवा (त्रिकोण) अग्नि हवन कुण्ड में सुरभि (गाय) के घी की सैकड़ों धाराओं की आहुतियां देते हैं । (३३)
यह कादि मूल विद्या का मंत्र है ।
स०टि० दोनों श्लोकों में हादि कादि विद्याओं के मंत्र बताये गये हैं। देखे त्रिपुरोपनिषद् (परिशिष्ट) ऋचा ८ । शिवाग्नि=कुण्डलिनी का मुख, घी=अमृत, चिन्तामणि=चित्कला, गुण=सत्व, रज, तम, निरवधि- महाभोगरसिकाः=भोग और मोक्ष दोनो की इच्छा रखने वाले ।
व्याख्याः— षोडशी का १६ वां अक्षर गुरु मुख से जानना चाहिये । मंत्र के चार पाद होते हैं, प्रथम तीन पाद तीन कूट वाग्भवव, कामकला, और शक्ति कूट के नामों से प्रसिद्ध हैं, चौथा पाद श्रीकूट है। प्रथम तीन पादों को अग्नि, सूर्य और चन्द्र; विष्णु ब्रह्मा और रुद्र की क्रमशः क्रिया, इच्छा और ज्ञान शक्तियां; जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के अनुरूप विश्व, तैजस् और प्राज्ञ; सत्व, रजस् और तमस् समझना चाहिये । चौथा पाद तुरीय पद है । बाह्य