भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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१८६ | सौंदर्य लहरी

भेद से बढ़ती हैं। परन्तु दूसरे कूट में ६ अक्षर और शक्ति कूट में ४ अक्षर होने से पंचदशी के पांच २ अक्षरों से तीन खंड इस प्रकार समझने चाहिये। कामराज कूटकी अन्तिम हल्लेखा एकादशी होती है और दशमी से विद्धा होने के कारण वह दशमी कला के ही अन्तर्गत माननी चाहिये परन्तु उसका योग शक्ति कूट के प्रथम अक्षर के साथ, जो द्वादशी है तीसरे खण्ड की पूर्ति करता है और 'उपोष्या द्वादशी शुद्धा' इस वचन के अनुसार द्वादशी को ही एकादशी मानकर दोनों कूटों का योग समझ लेना चाहिये। और उन्नेय भूमिका में तदनुसार ही भावना करनी चाहिये। इस प्रकार भावना करने से प्रथम कूट को अधः सहस्रार से उठाकर अनाहत् म उसका विलिनीकरण होता है, दूसरे कूट को अनाहत् से उठाकर उसका निरोधिका में और तीसरे को निरोधिका से उठाकर व्यापिका में विलिनीकरण होता है, परन्तु निरोधिका से नाद तक एकादशी का द्वादशी में संक्रमण समझना चाहिये और नीचे अर्धचन्द्रिका से दशमी में। मंत्र के तीनों कूटों के पांच पांच अक्षरों के खण्ड करने से प्रथम, छटा, और ग्यारहवां अक्षर नन्दा, दूसरा, सातवां और बारहवां अक्षर भद्रा, तीसरा, आठवां और तेरहवां जया, चौथा, नवां और चौदहवां रिक्ता और पांचवां, दसवां और पन्द्रहवां अक्षर पूर्णा समझना चाहिये।

इस प्रकार मंत्र का वाग्भव कूट रूपी मुख जो नीचे था, और शक्ति कूट रूपी कटि के नीचे का भाग जो ऊपर को था, सीधा ऊर्ध्वमुख हो जाता है।