भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौन्दर्य लहरी १८५


उठाकर मणिपुर में, पांचवे को मणिपुर से उठाकर अनाहत् में, छठे को अनाहत् से उठाकर विशुद्ध में, सातवे को विशुद्ध से उठाकर लंबिका में, आठवें को लंबिका से उठाकर आज्ञा में, नवें को आज्ञा से उठाकर विन्दु में, दसवें को विन्दु से उठाकर अर्धचंद्रिका में, ११वें को अर्धचन्द्रिका से उठाकर निरोधिका में, १२वें को निरोधिका से उठाकर नाद में, १३ वें को नाद से उठाकर नादान्त में, १४ वें को नादान्त से उठाकर शक्ति में, १५ वें को शक्ति से उठाकर व्यापिका में, इस क्रम से प्रत्येक पूर्व अक्षर को अगले अक्षर में लीन करते हुए पूरा मंत्र उन्मनी में, जो पराकला स्वरूपा श्री कला है, लीन कर दिया जाता है। ललिता सहस्रनाम के श्लोक ११३ की व्याख्या में भास्करराय कहते हैं कि त्रिपुरसुन्दरी निर्विवार्द षोडशकलात्मिका है जैसा कि वासना सुभगोदय में कहा है:—

दर्शाद्याः पूर्णिमान्ताद्या कलाः पंचदशैवतु ।
षोडशी तु कला ज्ञेया सच्चिदानन्द रूपिणी ॥

चन्द्र मण्डल में वह कला वृद्धि ह्रासरहिता है, शेष अन्य १५ कलायें आने जाने वाली होती हैं। दर्शा शुक्ल प्रतिपदा को कहते हैं, अर्थात् शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णमासी तक १५ कलाएं होती हैं जो पञ्चदशी मंत्र के १५ अक्षरों के अनुरूप समझी जानी चाहियें। उक्त १५ कलायें नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा भेद से और वाग्भव, कामकला, और शक्ति कूट ऐसे त्रिरावृत्त