भारतकोश
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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सौन्दर्य लहरी १८५


उठाकर मणिपुर में, पांचवे को मणिपुर से उठाकर अनाहत् में, छठे को अनाहत् से उठाकर विशुद्ध में, सातवे को विशुद्ध से उठाकर लंबिका में, आठवें को लंबिका से उठाकर आज्ञा में, नवें को आज्ञा से उठाकर विन्दु में, दसवें को विन्दु से उठाकर अर्धचंद्रिका में, ११वें को अर्धचन्द्रिका से उठाकर निरोधिका में, १२वें को निरोधिका से उठाकर नाद में, १३ वें को नाद से उठाकर नादान्त में, १४ वें को नादान्त से उठाकर शक्ति में, १५ वें को शक्ति से उठाकर व्यापिका में, इस क्रम से प्रत्येक पूर्व अक्षर को अगले अक्षर में लीन करते हुए पूरा मंत्र उन्मनी में, जो पराकला स्वरूपा श्री कला है, लीन कर दिया जाता है। ललिता सहस्रनाम के श्लोक ११३ की व्याख्या में भास्करराय कहते हैं कि त्रिपुरसुन्दरी निर्विवार्द षोडशकलात्मिका है जैसा कि वासना सुभगोदय में कहा है:—

दर्शाद्याः पूर्णिमान्ताद्या कलाः पंचदशैवतु ।
षोडशी तु कला ज्ञेया सच्चिदानन्द रूपिणी ॥

चन्द्र मण्डल में वह कला वृद्धि ह्रासरहिता है, शेष अन्य १५ कलायें आने जाने वाली होती हैं। दर्शा शुक्ल प्रतिपदा को कहते हैं, अर्थात् शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णमासी तक १५ कलाएं होती हैं जो पञ्चदशी मंत्र के १५ अक्षरों के अनुरूप समझी जानी चाहियें। उक्त १५ कलायें नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा भेद से और वाग्भव, कामकला, और शक्ति कूट ऐसे त्रिरावृत्त

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भेद से बढ़ती हैं। परन्तु दूसरे कूट में ६ अक्षर और शक्ति कूट में ४ अक्षर होने से पंचदशी के पांच २ अक्षरों से तीन खंड इस प्रकार समझने चाहिये। कामराज कूटकी अन्तिम हल्लेखा एकादशी होती है और दशमी से विद्धा होने के कारण वह दशमी कला के ही अन्तर्गत माननी चाहिये परन्तु उसका योग शक्ति कूट के प्रथम अक्षर के साथ, जो द्वादशी है तीसरे खण्ड की पूर्ति करता है और 'उपोष्या द्वादशी शुद्धा' इस वचन के अनुसार द्वादशी को ही एकादशी मानकर दोनों कूटों का योग समझ लेना चाहिये। और उन्नेय भूमिका में तदनुसार ही भावना करनी चाहिये। इस प्रकार भावना करने से प्रथम कूट को अधः सहस्रार से उठाकर अनाहत् म उसका विलिनीकरण होता है, दूसरे कूट को अनाहत् से उठाकर उसका निरोधिका में और तीसरे को निरोधिका से उठाकर व्यापिका में विलिनीकरण होता है, परन्तु निरोधिका से नाद तक एकादशी का द्वादशी में संक्रमण समझना चाहिये और नीचे अर्धचन्द्रिका से दशमी में। मंत्र के तीनों कूटों के पांच पांच अक्षरों के खण्ड करने से प्रथम, छटा, और ग्यारहवां अक्षर नन्दा, दूसरा, सातवां और बारहवां अक्षर भद्रा, तीसरा, आठवां और तेरहवां जया, चौथा, नवां और चौदहवां रिक्ता और पांचवां, दसवां और पन्द्रहवां अक्षर पूर्णा समझना चाहिये।

इस प्रकार मंत्र का वाग्भव कूट रूपी मुख जो नीचे था, और शक्ति कूट रूपी कटि के नीचे का भाग जो ऊपर को था, सीधा ऊर्ध्वमुख हो जाता है।

सौंदर्य लहरी १८७


दूसरे प्रकार की भावना में विशुद्ध चक्र के १६ पत्रों पर पूर्व से अग्नि, दक्षिण, नैऋत, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और ईशान क्रमानुसार १६ अक्षरों की भावना की जाती है. जो चन्द्रमा की कलाओं के सदृश चमकती हैं और सहस्रार की पूर्ण कला के बिंब से आज्ञाचक्र पर होती हुई नीचे के विशुद्धचक्र पर प्रतिबिंबित होती हैं। इस प्रकार चितिशक्ति का सम्बन्ध १६ नित्यकलाओं से, उनका संवन्ध मन्त्र से, मन्त्र का संवन्ध सुषुम्ना से, सुषुम्ना का मातृका से, मातृका का संवन्ध ईड़ा पिंगला से, और तत्सम्बन्धी सूर्याग्निचन्द्र से और सबका श्रीचक्र से, जो देह (पिण्ड) और विराट् देह (ब्रह्माण्ड) दोनों का प्रतीक है, सबका पारस्परिक सम्बन्ध समझना चाहिये।

सबका उपरोक्त पारस्परिक सम्बन्ध जानने के साथ नाद विन्दु और कला का अर्थ और उनका मन्त्र, यंत्र और देहस्थ चक्रों से सम्बन्ध भी समझना आवश्यक है और यह जानना आवश्यक है कि इन तीनों का पारस्परिक सम्बन्ध क्या है।

नाद, विन्दु और कला:

बिन्दुः शिवात्मको बीजं शक्ति र्नादस्तयोर्मितः ।
समवायः समाख्यातः सर्वागम विशारदैः ॥

सच्चिदानन्द विभवात् संकलात्परमेश्वरात् ।
आसीच्छक्तिस्ततो नादो नादाद्विन्दु समुद्भवः ॥

पर शक्तिमयः साक्षात् त्रिधासौ भिद्यते पुनः ।
विन्दुनादो बीजमिति तस्यभेदाः समीरिताः ॥

रौद्री विन्दोस्ततो नादाज्ज्येष्ठा बीजादजायत ।
वामा ताभ्यः समुत्पन्नाः रुद्रब्रह्मरमाधिपाः ॥

१८८ | सौंदर्य लहरी


ते ज्ञानेच्छाक्रियात्मानो वह्नीन्द्वर्क स्वरूपिणः ।
इच्छा क्रिया तथा ज्ञान गौरी ब्राह्मी तु वैष्णवी ॥
त्रिधा शक्तिःस्थिता यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति ॥ संग्रहीत श्लोक

तत्व-क्रम / विभाजनव्याख्या
शिव (पर बिन्दु)<br><br>शक्ति<br><br>सदाख्यशिव (नाद)<br><br>ईश्वर (बिन्दु)<br><br>शुद्ध विद्या ""अर्थः— आगमों के विद्वानों का ऐसा मत है कि बिन्दु शिवात्मक है, बीज शक्त्यात्मक है और दोनों के समवाय से उत्पन्न होने वाला तत्व नाद कहलाता है। सत् चित् आनन्द स्वरूप विभु परमेश्वर के स्पन्द रूपी संकलन से शक्ति उत्पन्न होती है, फिर नाद और नाद से बिन्दु उत्पन्न होता है। जो साक्षात् परा शक्ति से युक्त है। वह बिन्दु फिर तीन रूपों में फट जाता है अर्थात् बिंदु, बीज और नाद।
* नादबीजबिन्दु
ज्येष्ठावामारौद्री
ब्रह्मा (इच्छा)विष्णु (क्रिया)रुद्र (ज्ञान)
ब्राह्मी (क्रिया)वैष्णवी (ज्ञान)गौरी (इच्छा)
सूर्य (प्राण)अग्नि (चिति)चन्द्र (मन)

अर्थः— बिन्दु से रौद्री, नाद से ज्येष्ठा और बीज से वामा, और उनसे क्रमशः रुद्र ब्रह्मा और विष्णु हुए। वे क्रमशः ज्ञान इच्छा और क्रियात्मा हैं और अग्नि, चन्द्र और सूर्य के रूप हैं। इच्छा, क्रिया और ज्ञान क्रमशः गौरी, ब्राह्मी और वैष्णवी शक्तियां हैं, जहां पर तीनों का आधार है वह ॐ स्वरूप परं ज्योति है। बीज को शक्त्यात्मिका कला समझना चाहिये।


* नोटः— बिंदुनाद कला ब्रह्मन् विष्णु ब्रह्नेश देवताः (यो०शि०६, ७०)
यहां विष्णु को बिन्दु, ब्रह्मा को नाद और ईश(रुंद्र)को कला माना गया है।

सौंदर्य लहरी १८२


भास्करराय विरचित वरिवास्यारहस्य में बिन्दु, अर्धचन्द्रिका रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, और उन्मनी इन नौ स्तरों की समष्टि को नाद संज्ञा दी गई है ।

बिंद्वादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते । (१.३) ।

अर्थात् हृल्लेखा के उच्चारण होने पर अनुनासिक ध्वनि उक्त नौ स्तरों से होती हुई उन्मनी में समाप्त होती है, जिसके काल की मात्रा उत्तरोत्तर आधी होती जाती है और सबके योग का काल $\frac{१}{२}$ मात्रा होता है । जो बिन्दु की आधी मात्रा सहित पूरी १ मात्रा बनाती है । अर्थात्

$$\frac{१}{२} + \frac{१}{४} + \frac{१}{८} + \frac{१}{१६} + \frac{१}{३२} + \frac{१}{६४} + \frac{१}{१२८} + \frac{१}{२५६} + \frac{१}{५१२} = १$$

पंचदशी के ३ अनुस्वार तीन बिन्दु हैं, हृल्लेखा नाद, और १५ अक्षर १५ कला । नाद बिन्दु और कला तीनों को भी त्रिबिन्दु कह सकते हैं । श्री चक्र को भी नाद बिन्दु कला भेद से त्रिधा माना जाता है ।

नाद से बिन्दु, बिन्दु से कला, नाद से कला, कला से बिन्दु और कला से नाद का पांच प्रकार का ऐक्य संबंध जानने से अन्तर्याग की सिद्धि होती है ।

ब्रह्म को बिन्दु, शक्ति को कला और जीव को नाद समझकर उक्त पांच प्रकार का संबंध स्थापित होता है । प्रथम में जीव ब्रह्मैक्य भाव है, दूसरे में ब्रह्म से सृष्टि का प्रभव, तीसरे से देहा-

६९०सौंदर्य लहरी

ध्यास, चौथे से प्रलय, और पांचवे से प्रलय के पश्चात् बन्धन में पड़े हुए जीवों की फिर उत्पत्ति । बिन्दु से नाद का संबंध न बताने का यह अभिप्राय है कि ब्रह्म कभी जीव नहीं बनता, आत्मा सदा ब्रह्म स्वरूप है, और जीव भाव की एक मिथ्या प्रतीति मात्र है ।

यदि बिन्दु को शिव शक्ति भेद से दो प्रकार का माना जाय तो शक्त्यात्म बिन्दु ही बीज है, और दोनों से शब्द ब्रह्म नाद की उत्पत्ति समझनी चाहिये और शब्द से कला अर्थात् अर्थात्मक सृष्टि की उत्पत्ति ।

शिव शक्ति का अङ्गी और अङ्गवत सम्बन्ध

[ ३४ ]

शरीरं त्वं शंभोः शशि मिहिरवक्षो रुहयुगं.
तवात्मानं मन्ये भगवति नवा ( भवा ) त्मानमनघम् ।
अतः शेषः शेषीत्ययमुभयसाधारणतया
स्थितः संबंधो वां समरस परानन्दपरयोः ॥

अर्थः— हे भगवति ! मैं ऐसा समझता हूं कि तू शंभु का शरीर है, जिसके वक्षः स्थल पर सूर्य और चन्द्र दो स्तन उभरे हुए हैं, और तेरी आत्मा सारे भव की आत्मा शंकर हैं, अथवा नवात्मा शंकर है । इसलिये तुम दोनों परा शक्ति और आनन्द का एक समरस होने के कारण शेष और शेषी वत् संबंध स्थित् है ।

सौंदर्य लहरी १०१

सं० टि० शक्ति को शिव का स्थूल देह समझना चाहिये । शंकर का एक नाम चिदंबर भी है । सांग विश्व ( ब्रह्माण्ड ) शक्ति का रूप है और वह विराट् भगवान का स्थूल देह है । इसलिये शिव और शक्ति का आधार आधेय संबंध यहां दिखाया गया है । यदि पर पद शिव है तो आनन्द पद को शक्ति का रूप समझना चाहिये । दोनों की एकता का समरसपना दोनों की अभिन्नता प्रकट करता है । जैसे शक्कर और उसकी मधुरता । यह अधिदैव रूप है अर्थात् चित् और आनन्द का जोडा ही ब्रह्म और शक्ति का जोडा है । आध भौतिक स्तर पर भी ऐसा ही समझना चाहिये, सत् प्रकृति है और चिदानन्द शिव्

व्याख्या— वेदों और पुराणों में सूर्य और चन्द्र को विराट् भगवान के नेत्र माना गया है, परन्तु यहां उन्हें जगज्जननी प्रकृति के दोनों स्तनों से उपमित किया गया है, क्योंकि प्राण और सोम दोनों से विश्व का पोषण होता है । सूर्य से विश्व को प्राण शक्ति प्राप्त होती है और चन्द्रमा से सोम रस । आध्यात्मिक स्तर पर भी सूर्य हृदय में रहकर और चन्द्र मस्तिष्क में रहकर रक्षा करते हैं । सत् चित् आनन्द स्वरूप ब्रह्म के सत् स्वरूप का परिणाम सारा विश्व है, और आध्यात्म स्तर पर चेतन सत्ता दो स्तरों पर दृष्टि-गोचर होती है, आनन्द के रूप में और ज्ञान के रूप में । इस श्लोक में ज्ञान के रूप को शिव अथवा परम भाव कहा है और आनन्द को शक्ति भाव । दोनों भाव समरस वत् एक ही हैं जैसे

१५२ सौंदर्य लहरी


शक्कर और मीठापन । परम भाव शक्कर सदृश विशेष्य है और आनन्द मीठेपन के सदृश विशेषण, प्रथम रूप शिव का है और दूसरा शक्ति का । परानन्द का मार्ग शक्ति का योग मार्ग है । और ज्ञान मार्ग वैदिक वेदान्त का मार्ग है । यहां यह दिखाया गया है कि दोनों मार्गों का इतना एकरस पना है कि जैसे विशेषण और विशेषी का, अर्थात् दोनों मार्ग पारस्परिक सापेक्षिक हैं और एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं । आनन्द के मार्ग को भाव योग कहते हैं जो कुण्डलिनी शक्ति के जागने पर प्राप्त होता है और ज्ञान मार्ग आत्म चिन्त रूप ध्यान योग का मार्ग है । गीता के १२ वें अध्याय में श्री भगवान ने प्रथम भाव योग को सरल बताकर उसकी श्लाघा की है और ज्ञानमार्ग को कठिन कहकर उसकी प्राप्ति को दुःख साध्य बताया है ।

'नवात्म=शंकर । शिव, शक्ति और श्री चक्र तीनों ९ व्यूहात्म हैं । तीनों के ९ नौ २ व्यूह नीचे दिये जाते हैं । शिव के ९ व्यूह:— काल, कुल, नाम, ज्ञान, चित्त, नाद, विन्दु, कला और जीव ।

शक्ति के ९ व्यूह:— वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, अंबिका, इच्छा, ज्ञान, क्रिया, शान्ति और परा ।

श्री चक्र के ९ व्यूह:— ११ श्लोकोक्त ४ श्रीकंठ और ५ शिव युवतियां अर्थात् ९ मूल त्रिकोण । इसलिये शिवजी सब के आधिष्ठातृ देव अर्थात् आत्मा होने के कारण नवात्मा कहे गये हैं ।

सौंदर्य लहरी १९३


साराविश्व शक्ति का परिणाम है

( ३५ )

मनस्त्वं व्योमस्त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां नहि परम् ।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ॥

अर्थ: — हे शिवयुवति ! तू मन है, आकाश तू है और वायु है सारथी जिसका वह अग्नि भी तू ही है, तू जल है और तू भूमि है; तेरी परिणति के बाहर कुछ भी नहीं । अर्थात् सारा विश्व तेरे परिणाम का ही रूप है । तू ने ही अपने आप को परिणत करने के लिये, चिदानन्दाकार को विराट देह के भाव द्वारा व्यक्त किया हुआ है

सं० टि०: — जैसे श्लोक (३४) विश्व और शिव की एकता दिखाता है, वैसे ही (३५) श्लोक में चिदानन्द को समझना चाहिये, अर्थात् यह अध्यात्म स्वरूप है । यहां चित् और आनन्द का जोडा भी उसी प्रकार समझना चाहिये । मन, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी सत् शक्ति के विकार हैं उनसे आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान और आधार चक्रों से संबंधित् तत्त्वों के अधि देवताओं का संकेत है, जिनका अगले श्लोकों में वर्णन है । ये चिदानन्दाकार भगवती के ही रूप हैं ।

१९४ सौंदर्य लहरी


ब्रह्म सत् स्वरूप है अर्थात् उसकी सत्ता है । श्रुति छा० ६,२) कहती है 'सदेवसौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' । 'तदैक्षत'—उसने इच्छा की, कि 'बहुस्यां प्रजायेय'—सृष्टि के लिये मैं अनेक हो जाऊँ (अर्थात् वह चेतन चित् स्वरूप है) । उसकी सत् शक्ति में क्रिया की प्रवृत्ति होती है और चेतन चित्शक्ति में अधिष्ठातृत्व शक्ति रहती है। और 'अग्रे' अर्थात् सृष्टि के पूर्व वह एक ही अद्वितीय था । और वह स्वयं ही अनेक हो गया, अर्थात् तेज, जल, अन्न में परिणत हो गया और उनसे अनेक रूप की सृष्टि होती गई । इसीलिये श्रुतिवचन है कि 'सर्वंखल्विदं ब्रह्म' । 'एकमेव' में 'एव' का प्रयोग इस बात का निश्चय कराता है कि अद्वितीय होने के कारण दूसरा कुछ न था ।

तस्माद्धान्यन्न परः किंचनाऽऽस । ( नासदासीय सूक्त ) ऋग्वेद परिशिष्ट (१)

**अर्थ:—**उससे अन्य दूसरा कुछ भी न था ।

इसलिये ब्रह्म की सत् शक्ति का परिणाम यह सारा विश्व है और उसका अधिष्ठातृत्व आधार चिदानन्द स्वरूप है । यह भाव इस श्लोक में दिखाया गया है । मन, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ब्रह्म की सत् शक्ति के परिणाम हैं और चेतना और आनन्द का प्रकाश उस परिणाम के प्रत्येक स्तर प्रत्याभासित् हो रहा है । ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५ कर्मेन्द्रियां और ५ ज्ञानेन्द्रियां और मन बुद्धि चित्त अहंकार का अन्तःकरण चतुष्टय सब सत् शक्ति के परिणाम हैं, जो चिति शक्ति के प्रकाश से चेतन और अचेतन

सौंदर्य लहरी १९५

दिखते हैं। जैसे अंधकार प्रकाश की अपेक्षा रखता है, इसी प्रकार अचेतन चेतन प्रकाश की अपेक्षा रखता है। क्योंकि प्रकाश का तिरोभाव अंधकार का कारण है, और चेतना का तिरोभाव अचेतना का कारण। जैसे समुद्र की तरंगों के उठाव उतार पर अथवा भूमि की ऊंचे नीचे धरातल पर प्रकाश पड़ने से कहीं प्रकाश दिखता है, कहीं छाया का अंधकार, उसी प्रकार सत् शक्ति के परिणाम की विषमता पर प्रतिबिंबित चिदानन्दाकार के कारण कहीं चेतनता कहीं अचेतनता की अनुभूति समझनी चाहिये। वेदानुवचन है कि

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबल क्रिया च।
(श्वे० ६, ८)

इच्छा, ज्ञान और क्रिया भेद से वह पराशक्ति त्रिधा दिख रही है। चितिशक्ति का स्थान सहस्रार में है और उन्मनी समनी दोनों स्तरों पर व्यक्त होती है, उन्मनी में सूक्ष्म सामान्य रूप से और समनी पर विशेष रूप से। चिदानन्द की अभिव्यक्ति व्यापिका और शक्ति के स्तरों पर होती है, व्यापिका पर सूक्ष्म अविशेष सामान्य अभिव्यक्ति है और शक्ति के स्तर पर विशेष घनानन्द स्वरूप की अभिव्यक्ति है। नीचे के स्तरों पर सत् शक्ति का शब्द और अर्थ अथवा नाम और रूप दो भेद से फटाव हो जाता है। पहिले शब्द, फिर रूप की अभिव्यक्ति होती है। महानाद और नाद दो स्तरों पर शब्दात्मज्ञान के हैं, महानाद पर अविशेष और नाद पर सविशेष ज्ञान की अनुभूति रहती है। उनके नीचे बिन्दु अर्धेन्दु और निरोधिका के उत्तरोत्तर स्तर रूपों के संप्रज्ञात भेद हैं। मन का

१९६ | सौंदर्य लहरी


स्थान आज्ञाचक्र है, आकाश का विशुद्ध, वायु का अनाहत, अग्नि का मणिपूर, जल का स्वाधिष्ठान, और पृथिवी का स्थान मूलाधार है। पातंजल दर्शनोक्त वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता से संबंधित् चार प्रकार की मानसिक संप्रज्ञात समापत्ति के अंर्तगत् क्रमशः आज्ञा से ऊपर के ३, २, २, २ स्तर हैं। इसलिये इन सबका समावेश आज्ञाचक्र में है जो मन का स्थान है, और मन एवं पांचों महाभूतों के छः ही चक्र मुख्य माने जाते हैं। जिनका विशेष उल्लेख शंकर भगवत्पाद अगले छः श्लोकों में करते हैं। मन का स्थूल ध्येयाकार हो जाना उसकी रूपापत्ति कहलाती है, उस अवस्था को वितर्क संप्रज्ञात समापत्ति कहा गया है, मन का शब्दात्म होना विचार संप्रज्ञात समापत्ति के अन्तर्गत है, आनन्दाकार होना सानंद समापत्ति है और चिदात्म होना सास्मिता समापत्ति कहलाती है। समता की प्राप्ति को समापत्ति कहते हैं और प्रज्ञा से संयुक्ति को संप्रज्ञात कहते हैं। अर्थात् इन अवस्थाओं में मन प्रज्ञा से संयुक्त रहकर स्थूलाकार, सूक्ष्माकार, आनन्दाकार और चिदाकार रहता है।

आज्ञाचक्र

( ३६ )

तवाज्ञाचक्रस्थं तपनशशिकोटिद्युतिधरं
परं शम्भुं वन्दे परिमिलितपार्श्वे परचिता।
यमाराध्यन् भक्त्या रविशशिशुचीनामविषये
१ निरातङ्के लोको निवसति हि भालोक भ (भु) वने ॥

१ पाठांतर=निरालोके लोके

सौंदर्य लहरी १९७


कठिन शब्दः—निरालोके लोके=जिस लोक मे सूर्य चन्द्र और अग्नि का प्रकाश नहीं है । लोकः=मनुष्य ।

**अर्थः—**तेरे आज्ञा चक्र में स्थित किरोडों सूर्य और चन्द्र के तेज से युक्त पर शिव को वन्दना करता हूं, जिसका वाम पार्श्व पराचिति से एकीभूत हैं । उसका जो मनुष्य भक्तिपूर्वक आराधन करते हैं, वे उस प्रकाशमान लोक में निवास करते हैं जो सूर्य चन्द्र और अग्नि का विषय नहीं है अथवा सब आतङ्कों से मुक्त हैं । अथवा सूर्यचन्द्र और अग्नि का विषय न होने के कारण उन के प्रकाश से प्रकाशित नहीं हैं ।

तब आज्ञा चक्र कहने का क्या अभिप्राय है ? भगवती की काल्पनिक मूर्ति को ध्यान में लाकर उसके भ्रूमध्यस्थ स्थान में पराचिति को वामांक में लिये हुए पर शिव की आराधना करने का यहां विधान किया गया है, अथवा साधकों को अपने ही आज्ञा चक्र में इस प्रकार ध्यान करने की ओर संकेत है, यह बात विचारणीय है । भगवती के देह के अन्तर्गत सारा ब्रह्माण्ड और पिंड दोनों हैं । अथवा श्री चक्र जो भगवती के देह का प्रतीक है, उसके षोडश और अष्ट दलों में आज्ञा चक्र की भावना पूर्वक अर्चन करने से श्लोकोक्त भालोक भवन की प्राप्ति कही गई है । ब्रह्माण्ड रूपी विराट देह में आज्ञा अथवा अन्य चक्रों का स्थिर करना असंभव है । और काल्पनिक मूर्ति के ध्यान में भी चक्रों की कल्पना करने पर साधक को अपने भीतर ही ध्यान करना पडेगा, अन्यथा ध्यान नहीं हो सकता । आकाश में तो चक्रों की कल्पना करना वृथा है । पार्थिव

१९८ सौंदर्य लहरी

अथवा चित्र की प्रतिमा में चक्रों की कल्पना करना आकाश में ही कल्पना करने के सदृश है। हां! श्री चक्र पर अर्चन तो किया जा सकता है, परन्तु ध्यान तो अपने अन्दर ही करना पड़ेगा। इसलिये इस श्लोक और आगे आने वाले श्लोकों में बताए गये ध्यान अपने ही शरीरस्थ चक्रों में किये जाने चाहियें। 'तव' अर्थात् 'तेरे' पद का प्रयोग किये जाने का एक अभिप्राय यह भी हो सकता है कि साधक को अपना देहाभिमान त्याग कर अपना स्थूल सूक्ष्म देह सब भगवती का ही रूप समझना चाहिये। जैसा कि गत श्लोक में कहा जा चुका है कि मन, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी सब भगवती की परिणति के कार्य हैं। जब सारा प्रपंच भगवती की परिणति के अन्तर्गत है तो 'मेरा' कहने के लिये स्थान नहीं रहता। २२ वें श्लोकोक्त 'भवानित्वं' अथवा ३० वें श्लोकोक्त 'त्वामहमिति' की भावना करने वाले साधक के मुख से 'तवाज्ञा चक्र' इत्यादि शब्दों का उद्गार अनन्यता का सूचक है। और सुषुम्ना को भी जिसमें सब चक्रों की स्थिति है चिदात्मिका महा शक्ति का ही एक रूप समझा जाता है। जैसे नीचे दी हुई श्रुति से प्रकट है।

सुषुम्नायै कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्र मण्डलात् ।
मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्त्यै चिदात्मने ॥ यो. शि. (६, ३)

इसलिये सुषुम्ना में स्थित सब चक्र चिति शक्ति के विभिन्न केन्द्र होने के कारण भगवती के ही चक्र हैं। आज्ञा चक्र से सहस्रार में उठने वाली दोनों ओर की नाड़ियों का नाम वरणा और असी है, इस स्थान को वाराणसी कहते हैं। यह ही स्थान काशी है

सौंदर्य लहरी १९१


जहां शंभु विराजते हैं और उनके वाम अंग में चिति शक्ति शोभायमान है । प्रयाण समय आज्ञा चक्र में लेजाकर प्राणों का त्याग करने वाले योगी को शिवजी तारक मंत्र का उपदेश दे कर उसे निज लोक प्रदान करते हैं, जो स्वयं प्रकाशमान है और जहां अग्नि सूर्य और चन्द्र की गति नहीं ।

निरालोके लोकेः—

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्र तारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेवभान्तमनुभातिसर्वं, तस्यभासा सर्वमिदं विभाति ॥ (मु. २, २, १०)

मूलाधार स्वाधिष्ठान दोनों अग्नि मंडल के अन्तर्गत हैं, मणिपूर अनाहत् सूर्य मण्डल के अन्तर्गत और विशुद्ध आज्ञा चन्द्र मण्डल के अन्तर्गत, आज्ञा से ऊपर सहस्रार में जो सदा पूर्ण ज्योति का परम स्थान है, तीनों से ऊपर है । वहां जाकर साधक जन्म मरण के आतंक से छूट जाता है ।

१४ श्लोकोक्त ६४ किरणें आधी परशंभु की और आधी परचिति की किरणें जाननी चाहियें ।

<u>विशुद्धचक्र</u>

( ३७ )

विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिकविशदं व्योमजनकं
शिवं सेवे देवीमपि शिवसमानव्यवसिताम् ।
ययोःकान्त्यायान्त्या शशिकिरण सारूप्य सरणि (णेः)
विधूतान्तर्ध्वान्ता विलसति चकोरीव जगती ॥

२०० | सौंदर्य लहरी

अर्थ:— तेरे विशुद्ध चक्र में आकाशतत्त्व के जनक, शुद्ध स्फटिकवत् स्वच्छ शिव की और शिव के समान सुव्यवसित् देवी की भी, मैं सेवा करता हूं। जिन दोनों की चन्द्रमा की किरणों के सदृश कान्ति से जगत्, जिसका अन्तरन्धकार नष्ट हो गया है, चकोरी की तरह आनन्दित होता है,

विशुद्ध चक्र में कुण्डलिनी शक्ति सोती है, वह योगियों को मोक्षदायिनी होती है।

सा कुण्डलिनी कण्ठोर्ध्वभागे सुप्ता चेद्योगिनां मुक्तये भवति।

शांडिल्योपनिषत् (१.३७)

विशुद्ध चक्र आकाश तत्त्व का स्थान है, जिसके अधिष्ठातृ देव सदाशिव हैं। आकाश तत्त्व के उपादान होने के कारण उनको व्योमेश्वर और भगवती को व्योमेश्वरी कहते हैं। आकाश के कारण स्वरूप चिदम्बर सदाशिव शुद्ध स्फटिक सदृश कान्तिमान हैं। श्रुति का वचन है कि

सत्यंज्ञानमनन्तंब्रम्ह यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्
सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रम्हणा विपश्चितेति ।
एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः। आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः,
अग्नेरापः, अद्भ्य. पृथिवी। तै०ब्रम्हानन्दवल्ली प्रथमोऽनुवाकः।

सौंदर्य लहरी २०१


अर्थः— ब्रह्म सत्य स्वरूप, ज्ञान स्वरूप और अनन्त है, जो उसको गुहा में निहित परमाकाशवत् जानता है वह ब्रह्म ज्ञान सहित सब कामनाओं को प्राप्त कर लेता है । इस आत्मा से आकाश उत्पन्न होता है, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथिवी उत्पन्न होती है ।

श्लोक १४ में बताई गई ७२ मयूखायें आधी २ व्योमेश्वर और व्योमेश्वरी की समझनी चाहिये । बहुधा आकाश का अर्थ अवकाश अथवा अभावात्मक शून्य किया जाता है। परन्तु अभाव से भावात्मक वायु की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती, इसलिये आकाश को एक भावात्मक तत्व मानना पड़ेगा । पाश्चात्य भौतिक विज्ञानवादी भी आकाश के स्थान पर एक तत्व की सत्ता मानते हैं जिस के माध्यम द्वारा प्रकाश, उष्णता, विद्युत् और चुंबक (magnetic rays) की किरणें प्रसारित होती हैं । यह बात आधुनिक रेडिओ विज्ञान के अविष्कार से सर्व साधारण के सामने प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध है । उक्त किरणों का माध्यम भौतिक आकाश कहा जा सकता है । भौतिक वायु की उत्पत्ति उससे किस प्रकार होती है, यह अभी भौतिक विज्ञान नहीं समझ सका है । वायु को जमाकर गरमी निकाली जा सकती है, जैसे भाप को जल के रूप में जमाने से उष्णता निकाली जाती है, उसे वायुगत गुप्त तेज (latent heat) कहते हैं । और जल को बरफ़ के रूप में जमाने में भी उष्णता खेंचनी पडती हैं । उसे जल का गुप्त तेज (latent heat) कहते हैं । भौतिक विज्ञान ने भिन्न २ तत्वों के गुप्त तेज का कैलोरियों (calories) में नाप भी किया हुआ है । जब बरफ को

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तपाया जाता है तब जब तक सब बरफ नहीं पिघलती जल का तापमान बरफवत् ही रहता है। श्रुति का भी वचन है कि 'आपो वा अर्कस्तद्यदपां शर आसीत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत् तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः।' (बृ. १, २, २)

**अर्थ:—**जल सूर्य ही है, जो जल रूपी शर अर्थात् किरण थीं, उनको उसने छोड़ा, वे पृथिवी बन गईं। उस परिश्रम से श्रान्त और सन्तप्त उसका जो तेज रूपी रस निकला वह अग्नि थी।

यह पूर्व श्लोक के नीचे कहा जा चुका है कि सारा भौतिक जगत् परमात्मा की सत् शक्ति का परिणाम है और उसपर चमकने वाली चैतन्य सत्ता उसकी चित् शक्ति की छाया है। इस प्रकार सारा चेतन अचेतन विश्व का उपादान कारण सच्चिदेकं ब्रह्म ही है।

हृदय कमल

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समुन्मीलत्संवित्कमलमकरन्दैकरसिकं
भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम्।
यदालापादष्टादशगुणितविद्यापरिणति
र्यदादत्ते दोषाद्गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥

**अर्थ:—**हृद्देश में विकसित संवित् कमल से निकलने वाले मकरन्द के एकमात्र रसिक उस किसी (अद्भुत) हंसों के जोडे का मैं भजन करता हूं, जो महान् पुरुषों के मन रूपी मानसरोवर में

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विहार करता है, जिसकी वार्तालाप का परिणाम १८ विद्याओं की व्याख्या है, और जो दोषों से समस्तगुण को इस प्रकार निकाल लेता है जैसे जलमिश्रित दूध से सब दूध को हंस निकाल लेता है ।

संवित् कमल — संवित् का अर्थ ज्ञान है । १२ अरों का अनाहत् चक्र जो सुषुम्ना में स्थित है, उससे यह अष्टदल पद्म पृथक है । इसका स्थान वक्षस् में है ।

अरुणाचल के विख्यात रमणमहर्षि की श्रीरमण गीता में इस कमल का स्थान दक्षिण भाग में होना बताया गया है । रमणगीता के तत्संबंधी श्लोक हम नीचे उद्धृत करते हैं ।

अहंवृत्तिः समस्तानां वृत्तीनां मूलमुच्यते ।
निर्गच्छति यतोऽहंधीर्हृदयं तत्समासतः ॥ (५, ४)
हृदस्य यदि स्थानं भवेच्चक्रमनाहतं ।
मूलाधारं समारभ्य योगस्योपक्रमः कुतः ॥ (५, ३)
अन्यदेव ततो रक्तपिण्डाद्धृदयमुच्यते
अहंहृदितिवृत्या तदात्मनो रूपमीरितम् ॥ (५, ५)
तस्य दक्षिणतो धाम हृत्पीठे नैव वामतः ।
तस्मात्प्रवहति ज्योतिः सहस्रारं सुषुम्नया ॥ (५, ६)

अर्थ:—सब वृत्तियों का मूल अहम्-वृत्ति है, और जिस स्थान पर अहम्-बुद्धि का उदय होता है, वह हृदय है । यदि हृदय

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का स्थान अनाहत् चक्र माना जाय, तो मूलाधार से आरम्भ होने वाले योग का उपक्रम कहां रहता है (अर्थात् नहीं रहता)। इसलिये हृदय उससे अन्य है, और वह रक्त पिण्ड से भी अन्य है । अयंहृद् इस वाक्य से आत्मा का स्वरूप कहा गया है। (देखें छांदोग्योपनिषद् (८, ३, ३), हृद्+अयम्=हृदयं, यहां ‘अयम्’ पद आत्मा के लिये प्रयुक्त किया गया है)। उसका स्थान दक्षिण की ओर है, वाम ओर नहीं। उस स्थान से ज्योति का प्रवाह उठ कर सुषुम्ना में जाकर सहस्रार में जाता है।

अहंसंवित् अर्थात् अहंवृत्ति का ज्ञान जिस स्थान से उदय होता हुआ अनुभव में आवे वह ही हृदय का स्थान जानना चाहिये। वह स्थान आत्मा का स्थान है, वहां पर ही मन का स्फुरण होता है और वहां पर ही परमात्मा विराजते हैं। इस स्थान पर ‘हंस:’ मन्त्र का जप किया जाता है।

हंसोपनिषद् में हंस का ध्यान इस प्रकार किया जाना कहा गया है कि

हृदयेऽष्टदले हंसात्मानं ध्यायेत् । अग्निसोमौ पक्षौ, ॐ कारः शिरो बिन्दुस्तुनेत्रं मुखो रुद्रो रुद्राणि चरणौ वाहूकालश्चाग्निश्च ... एषोऽसौ परमहंसो भानुकोटिप्रतीकाशः ।

अर्थ:— हृदय में अष्ट दल पद्म पर आत्मा स्वरूप हंस का ध्यान करना चाहिये। अग्नि और चन्द्र उसके दो पंख हैं, ॐ कार शिर, बिन्दु नेत्र, मुख रुद्र, चरण रुद्राणी, अग्नि और काल बाहू। ऐसा