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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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२०२ सौन्दर्य लहरी


तपाया जाता है तब जब तक सब बरफ नहीं पिघलती जल का तापमान बरफवत् ही रहता है। श्रुति का भी वचन है कि 'आपो वा अर्कस्तद्यदपां शर आसीत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत् तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः।' (बृ. १, २, २)

**अर्थ:—**जल सूर्य ही है, जो जल रूपी शर अर्थात् किरण थीं, उनको उसने छोड़ा, वे पृथिवी बन गईं। उस परिश्रम से श्रान्त और सन्तप्त उसका जो तेज रूपी रस निकला वह अग्नि थी।

यह पूर्व श्लोक के नीचे कहा जा चुका है कि सारा भौतिक जगत् परमात्मा की सत् शक्ति का परिणाम है और उसपर चमकने वाली चैतन्य सत्ता उसकी चित् शक्ति की छाया है। इस प्रकार सारा चेतन अचेतन विश्व का उपादान कारण सच्चिदेकं ब्रह्म ही है।

हृदय कमल

( ३८ )

समुन्मीलत्संवित्कमलमकरन्दैकरसिकं
भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम्।
यदालापादष्टादशगुणितविद्यापरिणति
र्यदादत्ते दोषाद्गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥

**अर्थ:—**हृद्देश में विकसित संवित् कमल से निकलने वाले मकरन्द के एकमात्र रसिक उस किसी (अद्भुत) हंसों के जोडे का मैं भजन करता हूं, जो महान् पुरुषों के मन रूपी मानसरोवर में

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