भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी १९५

दिखते हैं। जैसे अंधकार प्रकाश की अपेक्षा रखता है, इसी प्रकार अचेतन चेतन प्रकाश की अपेक्षा रखता है। क्योंकि प्रकाश का तिरोभाव अंधकार का कारण है, और चेतना का तिरोभाव अचेतना का कारण। जैसे समुद्र की तरंगों के उठाव उतार पर अथवा भूमि की ऊंचे नीचे धरातल पर प्रकाश पड़ने से कहीं प्रकाश दिखता है, कहीं छाया का अंधकार, उसी प्रकार सत् शक्ति के परिणाम की विषमता पर प्रतिबिंबित चिदानन्दाकार के कारण कहीं चेतनता कहीं अचेतनता की अनुभूति समझनी चाहिये। वेदानुवचन है कि

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबल क्रिया च।
(श्वे० ६, ८)

इच्छा, ज्ञान और क्रिया भेद से वह पराशक्ति त्रिधा दिख रही है। चितिशक्ति का स्थान सहस्रार में है और उन्मनी समनी दोनों स्तरों पर व्यक्त होती है, उन्मनी में सूक्ष्म सामान्य रूप से और समनी पर विशेष रूप से। चिदानन्द की अभिव्यक्ति व्यापिका और शक्ति के स्तरों पर होती है, व्यापिका पर सूक्ष्म अविशेष सामान्य अभिव्यक्ति है और शक्ति के स्तर पर विशेष घनानन्द स्वरूप की अभिव्यक्ति है। नीचे के स्तरों पर सत् शक्ति का शब्द और अर्थ अथवा नाम और रूप दो भेद से फटाव हो जाता है। पहिले शब्द, फिर रूप की अभिव्यक्ति होती है। महानाद और नाद दो स्तरों पर शब्दात्मज्ञान के हैं, महानाद पर अविशेष और नाद पर सविशेष ज्ञान की अनुभूति रहती है। उनके नीचे बिन्दु अर्धेन्दु और निरोधिका के उत्तरोत्तर स्तर रूपों के संप्रज्ञात भेद हैं। मन का