सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 244, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें१९४ सौंदर्य लहरी
ब्रह्म सत् स्वरूप है अर्थात् उसकी सत्ता है । श्रुति छा० ६,२) कहती है 'सदेवसौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' । 'तदैक्षत'—उसने इच्छा की, कि 'बहुस्यां प्रजायेय'—सृष्टि के लिये मैं अनेक हो जाऊँ (अर्थात् वह चेतन चित् स्वरूप है) । उसकी सत् शक्ति में क्रिया की प्रवृत्ति होती है और चेतन चित्शक्ति में अधिष्ठातृत्व शक्ति रहती है। और 'अग्रे' अर्थात् सृष्टि के पूर्व वह एक ही अद्वितीय था । और वह स्वयं ही अनेक हो गया, अर्थात् तेज, जल, अन्न में परिणत हो गया और उनसे अनेक रूप की सृष्टि होती गई । इसीलिये श्रुतिवचन है कि 'सर्वंखल्विदं ब्रह्म' । 'एकमेव' में 'एव' का प्रयोग इस बात का निश्चय कराता है कि अद्वितीय होने के कारण दूसरा कुछ न था ।
तस्माद्धान्यन्न परः किंचनाऽऽस । ( नासदासीय सूक्त ) ऋग्वेद परिशिष्ट (१)
**अर्थ:—**उससे अन्य दूसरा कुछ भी न था ।
इसलिये ब्रह्म की सत् शक्ति का परिणाम यह सारा विश्व है और उसका अधिष्ठातृत्व आधार चिदानन्द स्वरूप है । यह भाव इस श्लोक में दिखाया गया है । मन, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ब्रह्म की सत् शक्ति के परिणाम हैं और चेतना और आनन्द का प्रकाश उस परिणाम के प्रत्येक स्तर प्रत्याभासित् हो रहा है । ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५ कर्मेन्द्रियां और ५ ज्ञानेन्द्रियां और मन बुद्धि चित्त अहंकार का अन्तःकरण चतुष्टय सब सत् शक्ति के परिणाम हैं, जो चिति शक्ति के प्रकाश से चेतन और अचेतन