भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 240
६९०सौंदर्य लहरी

ध्यास, चौथे से प्रलय, और पांचवे से प्रलय के पश्चात् बन्धन में पड़े हुए जीवों की फिर उत्पत्ति । बिन्दु से नाद का संबंध न बताने का यह अभिप्राय है कि ब्रह्म कभी जीव नहीं बनता, आत्मा सदा ब्रह्म स्वरूप है, और जीव भाव की एक मिथ्या प्रतीति मात्र है ।

यदि बिन्दु को शिव शक्ति भेद से दो प्रकार का माना जाय तो शक्त्यात्म बिन्दु ही बीज है, और दोनों से शब्द ब्रह्म नाद की उत्पत्ति समझनी चाहिये और शब्द से कला अर्थात् अर्थात्मक सृष्टि की उत्पत्ति ।

शिव शक्ति का अङ्गी और अङ्गवत सम्बन्ध

[ ३४ ]

शरीरं त्वं शंभोः शशि मिहिरवक्षो रुहयुगं.
तवात्मानं मन्ये भगवति नवा ( भवा ) त्मानमनघम् ।
अतः शेषः शेषीत्ययमुभयसाधारणतया
स्थितः संबंधो वां समरस परानन्दपरयोः ॥

अर्थः— हे भगवति ! मैं ऐसा समझता हूं कि तू शंभु का शरीर है, जिसके वक्षः स्थल पर सूर्य और चन्द्र दो स्तन उभरे हुए हैं, और तेरी आत्मा सारे भव की आत्मा शंकर हैं, अथवा नवात्मा शंकर है । इसलिये तुम दोनों परा शक्ति और आनन्द का एक समरस होने के कारण शेष और शेषी वत् संबंध स्थित् है ।