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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ
६९०सौंदर्य लहरी

ध्यास, चौथे से प्रलय, और पांचवे से प्रलय के पश्चात् बन्धन में पड़े हुए जीवों की फिर उत्पत्ति । बिन्दु से नाद का संबंध न बताने का यह अभिप्राय है कि ब्रह्म कभी जीव नहीं बनता, आत्मा सदा ब्रह्म स्वरूप है, और जीव भाव की एक मिथ्या प्रतीति मात्र है ।

यदि बिन्दु को शिव शक्ति भेद से दो प्रकार का माना जाय तो शक्त्यात्म बिन्दु ही बीज है, और दोनों से शब्द ब्रह्म नाद की उत्पत्ति समझनी चाहिये और शब्द से कला अर्थात् अर्थात्मक सृष्टि की उत्पत्ति ।

शिव शक्ति का अङ्गी और अङ्गवत सम्बन्ध

[ ३४ ]

शरीरं त्वं शंभोः शशि मिहिरवक्षो रुहयुगं.
तवात्मानं मन्ये भगवति नवा ( भवा ) त्मानमनघम् ।
अतः शेषः शेषीत्ययमुभयसाधारणतया
स्थितः संबंधो वां समरस परानन्दपरयोः ॥

अर्थः— हे भगवति ! मैं ऐसा समझता हूं कि तू शंभु का शरीर है, जिसके वक्षः स्थल पर सूर्य और चन्द्र दो स्तन उभरे हुए हैं, और तेरी आत्मा सारे भव की आत्मा शंकर हैं, अथवा नवात्मा शंकर है । इसलिये तुम दोनों परा शक्ति और आनन्द का एक समरस होने के कारण शेष और शेषी वत् संबंध स्थित् है ।

सौंदर्य लहरी १०१

सं० टि० शक्ति को शिव का स्थूल देह समझना चाहिये । शंकर का एक नाम चिदंबर भी है । सांग विश्व ( ब्रह्माण्ड ) शक्ति का रूप है और वह विराट् भगवान का स्थूल देह है । इसलिये शिव और शक्ति का आधार आधेय संबंध यहां दिखाया गया है । यदि पर पद शिव है तो आनन्द पद को शक्ति का रूप समझना चाहिये । दोनों की एकता का समरसपना दोनों की अभिन्नता प्रकट करता है । जैसे शक्कर और उसकी मधुरता । यह अधिदैव रूप है अर्थात् चित् और आनन्द का जोडा ही ब्रह्म और शक्ति का जोडा है । आध भौतिक स्तर पर भी ऐसा ही समझना चाहिये, सत् प्रकृति है और चिदानन्द शिव्

व्याख्या— वेदों और पुराणों में सूर्य और चन्द्र को विराट् भगवान के नेत्र माना गया है, परन्तु यहां उन्हें जगज्जननी प्रकृति के दोनों स्तनों से उपमित किया गया है, क्योंकि प्राण और सोम दोनों से विश्व का पोषण होता है । सूर्य से विश्व को प्राण शक्ति प्राप्त होती है और चन्द्रमा से सोम रस । आध्यात्मिक स्तर पर भी सूर्य हृदय में रहकर और चन्द्र मस्तिष्क में रहकर रक्षा करते हैं । सत् चित् आनन्द स्वरूप ब्रह्म के सत् स्वरूप का परिणाम सारा विश्व है, और आध्यात्म स्तर पर चेतन सत्ता दो स्तरों पर दृष्टि-गोचर होती है, आनन्द के रूप में और ज्ञान के रूप में । इस श्लोक में ज्ञान के रूप को शिव अथवा परम भाव कहा है और आनन्द को शक्ति भाव । दोनों भाव समरस वत् एक ही हैं जैसे

१५२ सौंदर्य लहरी


शक्कर और मीठापन । परम भाव शक्कर सदृश विशेष्य है और आनन्द मीठेपन के सदृश विशेषण, प्रथम रूप शिव का है और दूसरा शक्ति का । परानन्द का मार्ग शक्ति का योग मार्ग है । और ज्ञान मार्ग वैदिक वेदान्त का मार्ग है । यहां यह दिखाया गया है कि दोनों मार्गों का इतना एकरस पना है कि जैसे विशेषण और विशेषी का, अर्थात् दोनों मार्ग पारस्परिक सापेक्षिक हैं और एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं । आनन्द के मार्ग को भाव योग कहते हैं जो कुण्डलिनी शक्ति के जागने पर प्राप्त होता है और ज्ञान मार्ग आत्म चिन्त रूप ध्यान योग का मार्ग है । गीता के १२ वें अध्याय में श्री भगवान ने प्रथम भाव योग को सरल बताकर उसकी श्लाघा की है और ज्ञानमार्ग को कठिन कहकर उसकी प्राप्ति को दुःख साध्य बताया है ।

'नवात्म=शंकर । शिव, शक्ति और श्री चक्र तीनों ९ व्यूहात्म हैं । तीनों के ९ नौ २ व्यूह नीचे दिये जाते हैं । शिव के ९ व्यूह:— काल, कुल, नाम, ज्ञान, चित्त, नाद, विन्दु, कला और जीव ।

शक्ति के ९ व्यूह:— वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, अंबिका, इच्छा, ज्ञान, क्रिया, शान्ति और परा ।

श्री चक्र के ९ व्यूह:— ११ श्लोकोक्त ४ श्रीकंठ और ५ शिव युवतियां अर्थात् ९ मूल त्रिकोण । इसलिये शिवजी सब के आधिष्ठातृ देव अर्थात् आत्मा होने के कारण नवात्मा कहे गये हैं ।

सौंदर्य लहरी १९३


साराविश्व शक्ति का परिणाम है

( ३५ )

मनस्त्वं व्योमस्त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां नहि परम् ।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ॥

अर्थ: — हे शिवयुवति ! तू मन है, आकाश तू है और वायु है सारथी जिसका वह अग्नि भी तू ही है, तू जल है और तू भूमि है; तेरी परिणति के बाहर कुछ भी नहीं । अर्थात् सारा विश्व तेरे परिणाम का ही रूप है । तू ने ही अपने आप को परिणत करने के लिये, चिदानन्दाकार को विराट देह के भाव द्वारा व्यक्त किया हुआ है

सं० टि०: — जैसे श्लोक (३४) विश्व और शिव की एकता दिखाता है, वैसे ही (३५) श्लोक में चिदानन्द को समझना चाहिये, अर्थात् यह अध्यात्म स्वरूप है । यहां चित् और आनन्द का जोडा भी उसी प्रकार समझना चाहिये । मन, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी सत् शक्ति के विकार हैं उनसे आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान और आधार चक्रों से संबंधित् तत्त्वों के अधि देवताओं का संकेत है, जिनका अगले श्लोकों में वर्णन है । ये चिदानन्दाकार भगवती के ही रूप हैं ।

१९४ सौंदर्य लहरी


ब्रह्म सत् स्वरूप है अर्थात् उसकी सत्ता है । श्रुति छा० ६,२) कहती है 'सदेवसौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' । 'तदैक्षत'—उसने इच्छा की, कि 'बहुस्यां प्रजायेय'—सृष्टि के लिये मैं अनेक हो जाऊँ (अर्थात् वह चेतन चित् स्वरूप है) । उसकी सत् शक्ति में क्रिया की प्रवृत्ति होती है और चेतन चित्शक्ति में अधिष्ठातृत्व शक्ति रहती है। और 'अग्रे' अर्थात् सृष्टि के पूर्व वह एक ही अद्वितीय था । और वह स्वयं ही अनेक हो गया, अर्थात् तेज, जल, अन्न में परिणत हो गया और उनसे अनेक रूप की सृष्टि होती गई । इसीलिये श्रुतिवचन है कि 'सर्वंखल्विदं ब्रह्म' । 'एकमेव' में 'एव' का प्रयोग इस बात का निश्चय कराता है कि अद्वितीय होने के कारण दूसरा कुछ न था ।

तस्माद्धान्यन्न परः किंचनाऽऽस । ( नासदासीय सूक्त ) ऋग्वेद परिशिष्ट (१)

**अर्थ:—**उससे अन्य दूसरा कुछ भी न था ।

इसलिये ब्रह्म की सत् शक्ति का परिणाम यह सारा विश्व है और उसका अधिष्ठातृत्व आधार चिदानन्द स्वरूप है । यह भाव इस श्लोक में दिखाया गया है । मन, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ब्रह्म की सत् शक्ति के परिणाम हैं और चेतना और आनन्द का प्रकाश उस परिणाम के प्रत्येक स्तर प्रत्याभासित् हो रहा है । ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५ कर्मेन्द्रियां और ५ ज्ञानेन्द्रियां और मन बुद्धि चित्त अहंकार का अन्तःकरण चतुष्टय सब सत् शक्ति के परिणाम हैं, जो चिति शक्ति के प्रकाश से चेतन और अचेतन

सौंदर्य लहरी १९५

दिखते हैं। जैसे अंधकार प्रकाश की अपेक्षा रखता है, इसी प्रकार अचेतन चेतन प्रकाश की अपेक्षा रखता है। क्योंकि प्रकाश का तिरोभाव अंधकार का कारण है, और चेतना का तिरोभाव अचेतना का कारण। जैसे समुद्र की तरंगों के उठाव उतार पर अथवा भूमि की ऊंचे नीचे धरातल पर प्रकाश पड़ने से कहीं प्रकाश दिखता है, कहीं छाया का अंधकार, उसी प्रकार सत् शक्ति के परिणाम की विषमता पर प्रतिबिंबित चिदानन्दाकार के कारण कहीं चेतनता कहीं अचेतनता की अनुभूति समझनी चाहिये। वेदानुवचन है कि

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबल क्रिया च।
(श्वे० ६, ८)

इच्छा, ज्ञान और क्रिया भेद से वह पराशक्ति त्रिधा दिख रही है। चितिशक्ति का स्थान सहस्रार में है और उन्मनी समनी दोनों स्तरों पर व्यक्त होती है, उन्मनी में सूक्ष्म सामान्य रूप से और समनी पर विशेष रूप से। चिदानन्द की अभिव्यक्ति व्यापिका और शक्ति के स्तरों पर होती है, व्यापिका पर सूक्ष्म अविशेष सामान्य अभिव्यक्ति है और शक्ति के स्तर पर विशेष घनानन्द स्वरूप की अभिव्यक्ति है। नीचे के स्तरों पर सत् शक्ति का शब्द और अर्थ अथवा नाम और रूप दो भेद से फटाव हो जाता है। पहिले शब्द, फिर रूप की अभिव्यक्ति होती है। महानाद और नाद दो स्तरों पर शब्दात्मज्ञान के हैं, महानाद पर अविशेष और नाद पर सविशेष ज्ञान की अनुभूति रहती है। उनके नीचे बिन्दु अर्धेन्दु और निरोधिका के उत्तरोत्तर स्तर रूपों के संप्रज्ञात भेद हैं। मन का

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स्थान आज्ञाचक्र है, आकाश का विशुद्ध, वायु का अनाहत, अग्नि का मणिपूर, जल का स्वाधिष्ठान, और पृथिवी का स्थान मूलाधार है। पातंजल दर्शनोक्त वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता से संबंधित् चार प्रकार की मानसिक संप्रज्ञात समापत्ति के अंर्तगत् क्रमशः आज्ञा से ऊपर के ३, २, २, २ स्तर हैं। इसलिये इन सबका समावेश आज्ञाचक्र में है जो मन का स्थान है, और मन एवं पांचों महाभूतों के छः ही चक्र मुख्य माने जाते हैं। जिनका विशेष उल्लेख शंकर भगवत्पाद अगले छः श्लोकों में करते हैं। मन का स्थूल ध्येयाकार हो जाना उसकी रूपापत्ति कहलाती है, उस अवस्था को वितर्क संप्रज्ञात समापत्ति कहा गया है, मन का शब्दात्म होना विचार संप्रज्ञात समापत्ति के अन्तर्गत है, आनन्दाकार होना सानंद समापत्ति है और चिदात्म होना सास्मिता समापत्ति कहलाती है। समता की प्राप्ति को समापत्ति कहते हैं और प्रज्ञा से संयुक्ति को संप्रज्ञात कहते हैं। अर्थात् इन अवस्थाओं में मन प्रज्ञा से संयुक्त रहकर स्थूलाकार, सूक्ष्माकार, आनन्दाकार और चिदाकार रहता है।

आज्ञाचक्र

( ३६ )

तवाज्ञाचक्रस्थं तपनशशिकोटिद्युतिधरं
परं शम्भुं वन्दे परिमिलितपार्श्वे परचिता।
यमाराध्यन् भक्त्या रविशशिशुचीनामविषये
१ निरातङ्के लोको निवसति हि भालोक भ (भु) वने ॥

१ पाठांतर=निरालोके लोके

सौंदर्य लहरी १९७


कठिन शब्दः—निरालोके लोके=जिस लोक मे सूर्य चन्द्र और अग्नि का प्रकाश नहीं है । लोकः=मनुष्य ।

**अर्थः—**तेरे आज्ञा चक्र में स्थित किरोडों सूर्य और चन्द्र के तेज से युक्त पर शिव को वन्दना करता हूं, जिसका वाम पार्श्व पराचिति से एकीभूत हैं । उसका जो मनुष्य भक्तिपूर्वक आराधन करते हैं, वे उस प्रकाशमान लोक में निवास करते हैं जो सूर्य चन्द्र और अग्नि का विषय नहीं है अथवा सब आतङ्कों से मुक्त हैं । अथवा सूर्यचन्द्र और अग्नि का विषय न होने के कारण उन के प्रकाश से प्रकाशित नहीं हैं ।

तब आज्ञा चक्र कहने का क्या अभिप्राय है ? भगवती की काल्पनिक मूर्ति को ध्यान में लाकर उसके भ्रूमध्यस्थ स्थान में पराचिति को वामांक में लिये हुए पर शिव की आराधना करने का यहां विधान किया गया है, अथवा साधकों को अपने ही आज्ञा चक्र में इस प्रकार ध्यान करने की ओर संकेत है, यह बात विचारणीय है । भगवती के देह के अन्तर्गत सारा ब्रह्माण्ड और पिंड दोनों हैं । अथवा श्री चक्र जो भगवती के देह का प्रतीक है, उसके षोडश और अष्ट दलों में आज्ञा चक्र की भावना पूर्वक अर्चन करने से श्लोकोक्त भालोक भवन की प्राप्ति कही गई है । ब्रह्माण्ड रूपी विराट देह में आज्ञा अथवा अन्य चक्रों का स्थिर करना असंभव है । और काल्पनिक मूर्ति के ध्यान में भी चक्रों की कल्पना करने पर साधक को अपने भीतर ही ध्यान करना पडेगा, अन्यथा ध्यान नहीं हो सकता । आकाश में तो चक्रों की कल्पना करना वृथा है । पार्थिव

१९८ सौंदर्य लहरी

अथवा चित्र की प्रतिमा में चक्रों की कल्पना करना आकाश में ही कल्पना करने के सदृश है। हां! श्री चक्र पर अर्चन तो किया जा सकता है, परन्तु ध्यान तो अपने अन्दर ही करना पड़ेगा। इसलिये इस श्लोक और आगे आने वाले श्लोकों में बताए गये ध्यान अपने ही शरीरस्थ चक्रों में किये जाने चाहियें। 'तव' अर्थात् 'तेरे' पद का प्रयोग किये जाने का एक अभिप्राय यह भी हो सकता है कि साधक को अपना देहाभिमान त्याग कर अपना स्थूल सूक्ष्म देह सब भगवती का ही रूप समझना चाहिये। जैसा कि गत श्लोक में कहा जा चुका है कि मन, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी सब भगवती की परिणति के कार्य हैं। जब सारा प्रपंच भगवती की परिणति के अन्तर्गत है तो 'मेरा' कहने के लिये स्थान नहीं रहता। २२ वें श्लोकोक्त 'भवानित्वं' अथवा ३० वें श्लोकोक्त 'त्वामहमिति' की भावना करने वाले साधक के मुख से 'तवाज्ञा चक्र' इत्यादि शब्दों का उद्गार अनन्यता का सूचक है। और सुषुम्ना को भी जिसमें सब चक्रों की स्थिति है चिदात्मिका महा शक्ति का ही एक रूप समझा जाता है। जैसे नीचे दी हुई श्रुति से प्रकट है।

सुषुम्नायै कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्र मण्डलात् ।
मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्त्यै चिदात्मने ॥ यो. शि. (६, ३)

इसलिये सुषुम्ना में स्थित सब चक्र चिति शक्ति के विभिन्न केन्द्र होने के कारण भगवती के ही चक्र हैं। आज्ञा चक्र से सहस्रार में उठने वाली दोनों ओर की नाड़ियों का नाम वरणा और असी है, इस स्थान को वाराणसी कहते हैं। यह ही स्थान काशी है

सौंदर्य लहरी १९१


जहां शंभु विराजते हैं और उनके वाम अंग में चिति शक्ति शोभायमान है । प्रयाण समय आज्ञा चक्र में लेजाकर प्राणों का त्याग करने वाले योगी को शिवजी तारक मंत्र का उपदेश दे कर उसे निज लोक प्रदान करते हैं, जो स्वयं प्रकाशमान है और जहां अग्नि सूर्य और चन्द्र की गति नहीं ।

निरालोके लोकेः—

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्र तारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेवभान्तमनुभातिसर्वं, तस्यभासा सर्वमिदं विभाति ॥ (मु. २, २, १०)

मूलाधार स्वाधिष्ठान दोनों अग्नि मंडल के अन्तर्गत हैं, मणिपूर अनाहत् सूर्य मण्डल के अन्तर्गत और विशुद्ध आज्ञा चन्द्र मण्डल के अन्तर्गत, आज्ञा से ऊपर सहस्रार में जो सदा पूर्ण ज्योति का परम स्थान है, तीनों से ऊपर है । वहां जाकर साधक जन्म मरण के आतंक से छूट जाता है ।

१४ श्लोकोक्त ६४ किरणें आधी परशंभु की और आधी परचिति की किरणें जाननी चाहियें ।

<u>विशुद्धचक्र</u>

( ३७ )

विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिकविशदं व्योमजनकं
शिवं सेवे देवीमपि शिवसमानव्यवसिताम् ।
ययोःकान्त्यायान्त्या शशिकिरण सारूप्य सरणि (णेः)
विधूतान्तर्ध्वान्ता विलसति चकोरीव जगती ॥

२०० | सौंदर्य लहरी

अर्थ:— तेरे विशुद्ध चक्र में आकाशतत्त्व के जनक, शुद्ध स्फटिकवत् स्वच्छ शिव की और शिव के समान सुव्यवसित् देवी की भी, मैं सेवा करता हूं। जिन दोनों की चन्द्रमा की किरणों के सदृश कान्ति से जगत्, जिसका अन्तरन्धकार नष्ट हो गया है, चकोरी की तरह आनन्दित होता है,

विशुद्ध चक्र में कुण्डलिनी शक्ति सोती है, वह योगियों को मोक्षदायिनी होती है।

सा कुण्डलिनी कण्ठोर्ध्वभागे सुप्ता चेद्योगिनां मुक्तये भवति।

शांडिल्योपनिषत् (१.३७)

विशुद्ध चक्र आकाश तत्त्व का स्थान है, जिसके अधिष्ठातृ देव सदाशिव हैं। आकाश तत्त्व के उपादान होने के कारण उनको व्योमेश्वर और भगवती को व्योमेश्वरी कहते हैं। आकाश के कारण स्वरूप चिदम्बर सदाशिव शुद्ध स्फटिक सदृश कान्तिमान हैं। श्रुति का वचन है कि

सत्यंज्ञानमनन्तंब्रम्ह यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्
सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रम्हणा विपश्चितेति ।
एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः। आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः,
अग्नेरापः, अद्भ्य. पृथिवी। तै०ब्रम्हानन्दवल्ली प्रथमोऽनुवाकः।

सौंदर्य लहरी २०१


अर्थः— ब्रह्म सत्य स्वरूप, ज्ञान स्वरूप और अनन्त है, जो उसको गुहा में निहित परमाकाशवत् जानता है वह ब्रह्म ज्ञान सहित सब कामनाओं को प्राप्त कर लेता है । इस आत्मा से आकाश उत्पन्न होता है, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथिवी उत्पन्न होती है ।

श्लोक १४ में बताई गई ७२ मयूखायें आधी २ व्योमेश्वर और व्योमेश्वरी की समझनी चाहिये । बहुधा आकाश का अर्थ अवकाश अथवा अभावात्मक शून्य किया जाता है। परन्तु अभाव से भावात्मक वायु की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती, इसलिये आकाश को एक भावात्मक तत्व मानना पड़ेगा । पाश्चात्य भौतिक विज्ञानवादी भी आकाश के स्थान पर एक तत्व की सत्ता मानते हैं जिस के माध्यम द्वारा प्रकाश, उष्णता, विद्युत् और चुंबक (magnetic rays) की किरणें प्रसारित होती हैं । यह बात आधुनिक रेडिओ विज्ञान के अविष्कार से सर्व साधारण के सामने प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध है । उक्त किरणों का माध्यम भौतिक आकाश कहा जा सकता है । भौतिक वायु की उत्पत्ति उससे किस प्रकार होती है, यह अभी भौतिक विज्ञान नहीं समझ सका है । वायु को जमाकर गरमी निकाली जा सकती है, जैसे भाप को जल के रूप में जमाने से उष्णता निकाली जाती है, उसे वायुगत गुप्त तेज (latent heat) कहते हैं । और जल को बरफ़ के रूप में जमाने में भी उष्णता खेंचनी पडती हैं । उसे जल का गुप्त तेज (latent heat) कहते हैं । भौतिक विज्ञान ने भिन्न २ तत्वों के गुप्त तेज का कैलोरियों (calories) में नाप भी किया हुआ है । जब बरफ को

२०२ सौन्दर्य लहरी


तपाया जाता है तब जब तक सब बरफ नहीं पिघलती जल का तापमान बरफवत् ही रहता है। श्रुति का भी वचन है कि 'आपो वा अर्कस्तद्यदपां शर आसीत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत् तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः।' (बृ. १, २, २)

**अर्थ:—**जल सूर्य ही है, जो जल रूपी शर अर्थात् किरण थीं, उनको उसने छोड़ा, वे पृथिवी बन गईं। उस परिश्रम से श्रान्त और सन्तप्त उसका जो तेज रूपी रस निकला वह अग्नि थी।

यह पूर्व श्लोक के नीचे कहा जा चुका है कि सारा भौतिक जगत् परमात्मा की सत् शक्ति का परिणाम है और उसपर चमकने वाली चैतन्य सत्ता उसकी चित् शक्ति की छाया है। इस प्रकार सारा चेतन अचेतन विश्व का उपादान कारण सच्चिदेकं ब्रह्म ही है।

हृदय कमल

( ३८ )

समुन्मीलत्संवित्कमलमकरन्दैकरसिकं
भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम्।
यदालापादष्टादशगुणितविद्यापरिणति
र्यदादत्ते दोषाद्गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥

**अर्थ:—**हृद्देश में विकसित संवित् कमल से निकलने वाले मकरन्द के एकमात्र रसिक उस किसी (अद्भुत) हंसों के जोडे का मैं भजन करता हूं, जो महान् पुरुषों के मन रूपी मानसरोवर में

सौंदर्य लहरी २०३

विहार करता है, जिसकी वार्तालाप का परिणाम १८ विद्याओं की व्याख्या है, और जो दोषों से समस्तगुण को इस प्रकार निकाल लेता है जैसे जलमिश्रित दूध से सब दूध को हंस निकाल लेता है ।

संवित् कमल — संवित् का अर्थ ज्ञान है । १२ अरों का अनाहत् चक्र जो सुषुम्ना में स्थित है, उससे यह अष्टदल पद्म पृथक है । इसका स्थान वक्षस् में है ।

अरुणाचल के विख्यात रमणमहर्षि की श्रीरमण गीता में इस कमल का स्थान दक्षिण भाग में होना बताया गया है । रमणगीता के तत्संबंधी श्लोक हम नीचे उद्धृत करते हैं ।

अहंवृत्तिः समस्तानां वृत्तीनां मूलमुच्यते ।
निर्गच्छति यतोऽहंधीर्हृदयं तत्समासतः ॥ (५, ४)
हृदस्य यदि स्थानं भवेच्चक्रमनाहतं ।
मूलाधारं समारभ्य योगस्योपक्रमः कुतः ॥ (५, ३)
अन्यदेव ततो रक्तपिण्डाद्धृदयमुच्यते
अहंहृदितिवृत्या तदात्मनो रूपमीरितम् ॥ (५, ५)
तस्य दक्षिणतो धाम हृत्पीठे नैव वामतः ।
तस्मात्प्रवहति ज्योतिः सहस्रारं सुषुम्नया ॥ (५, ६)

अर्थ:—सब वृत्तियों का मूल अहम्-वृत्ति है, और जिस स्थान पर अहम्-बुद्धि का उदय होता है, वह हृदय है । यदि हृदय

२०४ सौंदर्य लहरी


का स्थान अनाहत् चक्र माना जाय, तो मूलाधार से आरम्भ होने वाले योग का उपक्रम कहां रहता है (अर्थात् नहीं रहता)। इसलिये हृदय उससे अन्य है, और वह रक्त पिण्ड से भी अन्य है । अयंहृद् इस वाक्य से आत्मा का स्वरूप कहा गया है। (देखें छांदोग्योपनिषद् (८, ३, ३), हृद्+अयम्=हृदयं, यहां ‘अयम्’ पद आत्मा के लिये प्रयुक्त किया गया है)। उसका स्थान दक्षिण की ओर है, वाम ओर नहीं। उस स्थान से ज्योति का प्रवाह उठ कर सुषुम्ना में जाकर सहस्रार में जाता है।

अहंसंवित् अर्थात् अहंवृत्ति का ज्ञान जिस स्थान से उदय होता हुआ अनुभव में आवे वह ही हृदय का स्थान जानना चाहिये। वह स्थान आत्मा का स्थान है, वहां पर ही मन का स्फुरण होता है और वहां पर ही परमात्मा विराजते हैं। इस स्थान पर ‘हंस:’ मन्त्र का जप किया जाता है।

हंसोपनिषद् में हंस का ध्यान इस प्रकार किया जाना कहा गया है कि

हृदयेऽष्टदले हंसात्मानं ध्यायेत् । अग्निसोमौ पक्षौ, ॐ कारः शिरो बिन्दुस्तुनेत्रं मुखो रुद्रो रुद्राणि चरणौ वाहूकालश्चाग्निश्च ... एषोऽसौ परमहंसो भानुकोटिप्रतीकाशः ।

अर्थ:— हृदय में अष्ट दल पद्म पर आत्मा स्वरूप हंस का ध्यान करना चाहिये। अग्नि और चन्द्र उसके दो पंख हैं, ॐ कार शिर, बिन्दु नेत्र, मुख रुद्र, चरण रुद्राणी, अग्नि और काल बाहू। ऐसा

सौंदर्य लहरी २०५

यह परम हंस कोटि सूर्य के प्रकाश से युक्त है। हंसः इस मंत्र का एक कोटि जप करने से यह कमल खिलता है। हं और सः दोनों को हंस और हंसिनी का जोडा कहते हैं। हं पुमान् है और सः शक्ति का रूप है। प्रत्येक दल के क्रम से आठों दलों पर उसके बैठने का फल इस प्रकार है। पूर्व पर पुण्य मति, आग्नेय कोण पर निद्रा आलस्य, दक्षिण पर क्रूर बुद्धि, नैर्ऋत् पर पाप बुद्धि, पश्चिम पर क्रीडा की इच्छा, वायव्य कोण पर यात्रा की इच्छा, उत्तर पर रति इच्छा और ईशान कोण पर धनेच्छा, मध्य में वैराग्य, केशर पर जाग्रत, कर्णिका में स्वप्न, सूक्ष्म में सुषुप्ति और पद्म का त्याग कर के ऊपर उडने पर तुरीया समाधि की अवस्था होती है।

हंस का जोडा जब वार्तालाप करता है, तब योगियों को १८ विद्याएं आ जाती हैं, मानो दोनों की वार्ता का विषय उनकी व्याख्या स्वरूप होती है। १८ विद्याओं के नाम ये हैं:— शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छन्द, चार वेद, दोनों मीमांसा दर्शन, न्याय, पुराण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्व विद्या और नीति शास्त्र। चारों वेदों की चार विद्याओं में और दोनों मीमांसा दर्शनों की एक विद्या में गणना करनी चाहिये।

गौडपादाचार्य रचित सुभगोदय के भाष्य में श्री भगवत्पाद ने हंसके जोडे का रूप एक दीप शिखा के सदृश बताया है। उसके दक्षिण और वाम भाग ही हंसेश्वर और हंसेश्वरी हैं। हंसेश्वर को शिखी और हंसेश्वरी को शिखिनी भी कहते हैं उनका ध्यान हृदय पद्म के मध्य में करना चाहिये।

२०६ | सौंदर्य लहरी


नारायणोपनिषद् में भी हृद्देश में दीपशिखा का ध्यान करने का उपदेश मिलता है। उसका वर्णन इस प्रकार है:—

तस्य मध्ये (हृदयस्य) वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता नीलतोयदमध्यस्थाद्विद्युल्लेखेवभास्वरा, नीवारशूकवत्तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा। तस्याः शिखायामध्ये परमात्मा व्यवस्थितः, सब्रह्मा, सशिवः, सहरिः, सेन्द्रः सोऽक्षरः परमःस्वराट् (ना० खण्ड १३)

**अर्थ:—**उस हृदय कमल के मध्य में अग्नि की छोटीसी शिखा है। नीलवर्ण के मेघों में चमकने वाली विद्युत् रेखा के सदृश पीले रंग की धान्य के तिनके के अग्रभाग जैसी पतली होती है। उस शिखा के मध्य में परमात्मा रहते हैं, वह ही ब्रह्मा, शिव, हरि, इन्द्र और अक्षर परब्रह्म है। विद्युत् प्रकाश में दिखने वाले श्याम मेघ सदृश रंग हंसेश्वर का और पीत वर्ण हंसेश्वरी का समझना चाहिये। वैष्णव सम्प्रदाय में पीतवर्णा श्रीजी और श्यामवर्ण भगवान का हृदय में ध्यान इसी आधार पर बताया जाता है। १४ श्लोकोक्त ५४ वायव्य किरणें आधी हंसेश्वर की और आधी हंसेश्वरी की हैं।

बृहदारण्यकोपनिषद् में भी इसका वर्णन मिलता है, वह इस प्रकार है:—

मनोमयोयं पुरुषो भाःसत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहि- र्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किंच ॥ (५, ६, १)

सौंदर्य लहरी २०७


अर्थः— यह मनोमय पुरुष प्रकाशमान सत्य स्वरूप है, वह अन्तर्हृदय में धान अथवा जौ के सदृश चमकता है। वह सब का ईश्वर, सबका अधिपति इस जगत में जो कुछ है सब पर शासन करता है।

छान्दोग्योपनिषद् के अष्टम अध्याय में जो दहर विद्या का वर्णन है वह भी इस संवित् कमल में ही अहं संवित् के ध्यान पूर्वक ज्योति दर्शन द्वारा ब्रह्म प्राप्ति की विद्या है।

स्वाधिष्ठान चक्र

( ३९ )

तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं
तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।
यदालोके लोकान् दहति महतिक्रोधकलिते
*दयार्द्राया दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥

*पाठान्तर—दयार्द्राभिर्दृग्भिः

अर्थः— हे जननि ! तेरे स्वाधिष्ठान चक्र में अग्नितत्त्व को अधिष्ठान (प्रभाव) में रखने के लिये जो संवर्ताग्नि रहता है, उसकी और उस महती समया देवी की मैं स्तुति करता हूं, जिस समय संवर्ताग्नि बडी क्रोध भरी दृष्टि से लोकों को जलाने लगता है, उस समय समया देवी की दयार्द्र दृष्टि शीतल उपचार करती है।

२०८ सौंदर्य लहरी


स्वाधिष्ठान=स्व+अधि+स्थान, कुण्डलिनी शक्ति का जागने के पश्चात् सुषुम्ना के भीतर रहने का अपना स्थान।

संवर्ताग्नि=अच्छी तरह से वर्तमान रहने वाला अग्नि। प्रलयाग्नि को संवर्ताग्नि कहते हैं। यह रुद्र का रूप है।

समया देवी=समयाचार की देवी।

कुण्डलिनी शक्ति के जागने का फल समाधि है। कुण्डलिनी महायोग का एक अंग लययोग भी है और षट् चक्र वेध द्वारा तत्वों का वेध पूर्वक प्रतिप्रसवक्रम भी एक अंग है। प्रतिप्रसवक्रम प्रसव के उलट क्रम को कहते हैं। अर्थात् योगी प्रतिप्रसवक्रम का आश्रय लेकर ही षट् चक्र वेध करता है और पंच महाभूतों पर जय प्राप्त करता है। प्रलय के समय भी संवर्ताग्नि पृथिवी को जल में, जल को तेज में, तेज को वायु में और वायु को आकाश में लीन करता हुआ, सब तत्वों को प्रकृति लीन कर देता है।

सृष्टिक्रम में शक्ति प्रभवाभिमुख होकर फिर विविध रचना करने लगती है, मानो वह देवी दयार्द्रदृष्टि से संवर्ताग्नि को शान्त करके लोकानुग्रह करती है। वास्तव में सृष्टि स्थिति और संहार की त्रिधा शक्ति निरंतर अणु २ में कार्य करती रहती है, परन्तु योगी क षट्चक्र वेध के समय लयक्रम प्रधान रहता है इसलिये कहा गया है कि स्वाधिष्ठान चक्र में अग्नितत्व का संयम पूर्वक प्रयोग होकर पृथिवी और जल दोनों का वेध मूलाधार में होता है और अग्नि का वेध मणिपूर में होता है। जैसा श्लोक ९ में समझाया जा चुका है। यदि यह लयक्रम तीव्र हो तो शरीर के नष्ट होने की सम्भावना

सौंदर्य लहरी २०९


हो सकती है; परन्तु ऐसा होता नहीं, शरीर ही तो दोनों मोक्ष का और भोग का साधन है। जब तक जीवन मुक्ति की दशा की प्राप्ति नहीं होती, शरीर की रक्षा करना परम कर्तव्य है। इसलिये षट्‌चक्रवेध द्वारा लयक्रम और शरीर का पुनः निर्माण एवं संगठन अथवा जीर्णोद्धार रूपी सृष्टि स्थिति क्रम भी युगपद् चलता रहता है। इसी अभिप्राय से संवर्ताग्नि की संहार क्रिया को संयम में रखने के लिये समयादेवी अपनी दयार्द्र दृष्टि से शीतल उपचार करती रहती हैं।

अनाहत् चक्र के नीचे नाभिस्थान में मणिपूर, और उसके नीचे उपस्थ के पीछे स्वाधिष्ठान, और गुदा के पास मूलाधार की स्थिति है। दोनों के बीच में योनि स्थान है, जो अग्नि की पीठ मानी जाती है। योनिस्थान का संबंध स्वाधिष्ठान से भी है, इसलिये अग्नि को स्वाधिष्ठान चक्र में रहने वाला कहा गया है। श्लोक ९ की पद रचना, इस दृष्टिकोण को सामने रख कर, समझनी चाहिये। यह कहा जा चुका है:—‘महींमूलाधारे कमपि, मणिपूरे हुतवहं स्थितं स्वाधिष्ठाने, इत्यादि भित्वा....। अर्थात् मूलाधार में पृथिवी और जल को भी, और मणिपूर में अग्नि को, जो स्वाधिष्ठान में स्थित है, वेध करके इत्यादि’। उस श्लोक में तत्वों के वेध का स्थान एवं क्रम बताया गया है, और उनकी स्थिति के लिये केवल अग्नि तत्त्व के स्थान का संकेत है, अन्य तत्वों के स्थान का नहीं, क्योंकि अन्य तत्वों के स्थान और उनके वेध के स्थान एक ही हैं। केवल स्वाधिष्ठान चक्र में जल और अग्नि दोनोंका संधि स्थान है। इसलिये वायु के पश्चात् अग्नि का वर्णन करने के लिये पहिले उसकी स्थिति के स्थान स्वाधिष्ठान का और फिर वेध के स्थान मणिपूर का अगले