भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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प्राक्-कथन

सनातन वैदिक धर्म में ब्रह्मोपासना की विधि के निर्गुण सगुण भेद से दो क्रम कहे जा सकते हैं । निर्गुण ब्रह्म सत् असत् से परे अक्षर अबिनाशी अनिर्देश्य अचिन्त्य अव्यक्त स्वरूप है । वह सर्व व्यापक होने पर भी कूटस्थ स्पन्दरहित अचल है, इन्द्रियों का वह विषय नहीं, मन की उस तक गति नहीं और बुद्धि की विवेक शक्ति वहां तक पहुंचते २ थक जाती है । एक मात्र निर्विकल्पावस्था में ही उसकी उपलब्धि होना संभव है । कहा है ‘एकमेव दर्शनं ख्यातिरेव दर्शनम्’ (पञ्चशिखाचार्य) । अव्यक्त स्वरूपा प्रकृति से भी अतीत वह परम अव्यक्त है,

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
गीता (८, २०)

चेतन आत्मा की भी पराकाष्ठा अर्थात् अन्तिम सीमा होने के कारण उसको परमात्मा कहते हैं । उसी को सर्व व्यापक होने से महा विष्णु, सर्व कल्याणमय होने से पर शिव, सर्वशक्तिमान होने से शक्ति का ईश्वर, निरतिशय सर्वज्ञ होने से प्रज्ञान घन, परं सत्य होने से सत्यनारायण, सुख राशी होने से आनन्दकंद, सत्तात्म होने से सद्ब्रह्म, चेतन होने से चिद्ब्रह्म या चिन्मात्र चिति शक्ति कहते हैं । उसकी परम अव्यक्तता के कारण ही उसे बौद्धों ने शून्य निर्वाण पद कहा है ।