सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२
श्री मद्भागवत् में भगवान वासुदेव का परं सूक्ष्मरूप समझने के लिये उसकी शून्यवत् कल्पना करने का निर्देश किया गया है, यथा:—
यत्तद्ब्रह्म परं सूक्ष्ममशून्यं शून्यकल्पितं ।
भगवान् वासुदेवेति यं गृणन्ति हि सात्वताः ॥(९, ९, ३०)
इंद्रियों एवं मन के संचालक, बुद्धि के प्रज्ञात्म प्रकाश, प्राणों के प्राण और प्रकाश को भी प्रकाश देने वाले ऐसे परम तत्त्व का ध्यान कैसे किया जा सकता है ? सामान्य जन की स्थूल चंचल बुद्धि वहां काम नहीं करती, इसलिये उसके व्यक्त होने वाले गुणों का ही ध्यानार्चन करना पडता है । वह ऐसा सूर्य है, जिसको दृष्टि नहीं देख सकती, उसके तेज का ही ध्यान संभव होने के कारण, उस तेज के विभिन्न स्तरों पर चमकने वाली उसकी विभूतियों द्वारा ही उसका चिन्तन किया जाता है, यह ही सगुण उपासना कहलाती है । उससे उद्भूत तेजोमयी भ्राजमान शक्ति की व्यक्तता में ही उस सत्य को देखा जा सकता है । उसकी श्री को कोई प्रकृति, कोई माया, कोई उमा, कोई लक्ष्मी, कोई शक्ति, कोई प्रकृति कहते हैं । वह वैष्णवी माया चेतन प्राणियों की चेतना है, विश्व की कान्तिमयी श्री है, जगत् की धात्री और प्रतिष्ठा है । बुद्धि वह है तो निद्रा भी वह ही है, तृषा है तो तृष्टि भी वह ही है । प्रेम, भक्ति, श्रद्धा, दया के सात्विक भाव उसी की मंद मुस्कान से विभूषित होने के कारण सदा विश्व का कल्याण करने के निमित्त अनुग्रह की वर्षा किया करते हैं ।
इसलिये सगुण उपासना में शक्ति रूप से ब्रह्म की उपासना करने की प्रधानता सनातन धर्म में विशेष रूप से पाई जाती है । नास्तिक