सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी २१५
कहते हैं । ब्रह्मग्रंथि का स्थान मूलाधार में, विष्णुग्रंथि का स्थान हृदय में और रुद्रग्रंथि का स्थान आज्ञाचक्र में समझना चाहिये । ललितासहस्रनाम में ग्रंथित्रय के स्थानों का वर्णन इस प्रकार है:—
मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रंथि विभेदिनी ।
मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रंथि विभेदिनी ॥ ८९
आज्ञाचक्रान्तरालस्था रुद्रग्रंथि विभेदिनी ।
सहस्राराम्बुजारूढा सुधासारामिवर्षिणी ॥ ९०
भूतजय होने पर रुद्रग्रंथि का, इंद्रिय जय होने पर ब्रह्मग्रंथि का और मनोजय होने पर विष्णुग्रंथि का बेध जानना चाहिये । भूतजय होने पर मधुमतीका भूमिका का उदय होता है और इंद्रिय एवं मनोजय होने पर मधुप्रतीका भूमिका का । इनसे पूर्व कुण्डलिनी जागरणोपरान्त रजतमोमिश्रित सत्व गुण की भूमिका का नाम प्रारम्भ कल्पिका और ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होनेपर शुद्धसत्व गुण प्रधान भूमिका का नाम मधुमती भूमिका है । देखें योगदर्शन विभूतिपाद सूत्र (५१) पर व्यास भाष्य और श्लोक १८ पृष्ठ (१३०) ।
| विन्दु त्रय<br>पंचाग्नि विद्या<br>और ब्रह्मचर्य | संवर्ताग्नि प्रलयाग्नि को कहते हैं, उसे पाताल स्थित कालाग्नि भी कहते हैं । शंकर भगवत्पाद ने निम्न चक्रों में स्थित अग्नि को जो लयाभिमुख होकर सब तत्वों को अपने २ कारण में लीन करता है, संवर्ताग्नि कहा है । क्योंकि केवल तीन ही अग्नियों का यहां वर्णन है, अर्थात स्वाधिष्ठानस्थ संवर्त अग्नि, मणिपुरस्थ विद्युताग्नि |
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