सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८२ || सौंदर्य लहरी
होगा। शुक्र में दोनों कोषों की बीजरूप से ग्रंथि रहती है, उसके टूटने से दोनों कोषों की गांठ खुल जायगी। इसलिये कामवासना की वृद्धि से यह ग्रंथि दृढ होती है और ब्रह्मचर्य अर्थात् उर्द्धवरेता होने से यह ग्रंथि शिथिल होती है। प्रजनन शक्ति वाले द्रव्य से प्राण शक्ति का पृथक्करण होने पर वह विद्युत्ताग्नि, सूर्याग्नि-क्रम से सोम में परिणत हो जायगी। प्राण का सोम से पृथक्कर दूसरी ग्रंथि का और सोम का आत्मत्व में लयकरण तीसरी ग्रंथि का बेध है।
दूसरा प्रजनन शक्तियुक्त द्रव्य जो रुधिर के और अण्डकोषों के रस के योग से बनता है वह भी प्राण शक्तियुक्त होता है, परन्तु वहां दोनों का वीर्य में एकीकरण रहता है। स्वाधिष्ठान में जल और अग्नि का संधि स्थान है, इसलिये जलस्थ अग्नि को बडवाग्नि नाम दिया गया है। समुद्र में रहने वाले अग्नि को वडवानल कहते हैं। मणिपूर में सौदामिनी स्वरूपा विद्युत् अग्नि है, जिसको अन्न को पचाने वाला वैश्वानर अग्नि भी कहते हैं, उसको समान वायु भी कहते हैं और उसे ही स्वान्तरात्मा कहा गया है।
जब कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है, तब उसे मूलाग्नि का प्रज्वलन समझना चाहिये। जिसकी क्रिया नीचे पैरों में और ऊपर हड्डियों में होती है, और साथ ही जल में भी। अर्थात् मांस, रुधिर मेदा, स्नायु, अस्थि, मज्जा, शुक्र सातों धातुएं संतप्त हो जाती हैं। इनके क्षुब्ध अथवा मथन होने से शुक्र (वीर्य) की आहुति मूलाधार में पडती है। वह बहिर्मुख होकर जब स्त्री के गर्भाशय में पोषण पाता है तो एक नये शरीर की रचना करता है, परन्तु जब अन्तर्मुखी होकर उसकी मूलाग्नि में आहुति दी जाती है