सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी २२३
तो वह ऊर्ध्व मुख होकर सूक्ष्म स्तरों पर चढ़ने लगता है। जिसको ब्रह्मचर्य कहते हैं। उन सूक्ष्म स्तरों पर चढ़ने की क्रिया को अन्तः पंचाग्नि याग कहते हैं। छान्दोग्य उपनिषद में प्राकृतिक बाह्य पंचाग्नियाग का वर्णन है, योग शिखोपनिषद में लयाभिमुख अन्तर्याग का संकेत है।
जैसे सूर्य का ताप वायु मण्डल के भूमि के निकटस्थ निम्न स्तरों को ही संतप्त कर सकता है, ऊपर के पर्वत शिखरों के स्तर को नहीं तपा सकता, जिसका कारण यह है कि निम्न स्तरों की वायु भूमि की उष्णता से अथवा समुद्र के जल की उष्णता से तप्त होकर उष्ण हो जाती है, परन्तु ऊपर के स्तरों की तरल वायु उतनी तप्त नहीं हो सकती। इसी प्रकार जब सूर्य अधोमुख होता है तो देह की सब धातुओं को संतप्त कर देता है, और उसको विष बरसाने वाला कहा जाता है। परन्तु जब वह ऊर्ध्व मुख होता है तब सुषुम्ना पथ के सूक्ष्म स्तरों पर चमकने लगता है, और उसकी देह को संतप्त करने वाली शक्ति ऊर्ध्व गामिनी हो जाती है, जिससे ऊपर के अमध्यस्थ चन्द्र मण्डल पर प्रकाश पड़ने लगता है। उस प्रकाश को सोम कहते हैं। चन्द्रमा का नाम सोम भी है। और मध्य के विशुद्ध चक्र पर विशुद्ध सोम का ही प्रकाश चमकने लगता है।
वास्तव में अग्नि, विद्युत् और सूर्य तीनों एक ब्रह्म तेज से ही प्रकाशमान है। इसीप्रकार पांचों अग्नियां एक चिति शक्ति से प्रकाशमान समझनी चाहियें, और चिति शक्ति का स्थान आज्ञा