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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 415 में से

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२२५ | सौंदर्य लहरी


चक्र के ऊपर है, और सोम ही उसका शुद्ध स्वरूप है, इसलिये उसे पर विन्दु अथवा ब्रह्म का पर रूप कहते हैं ।

जिन साधकों की कुण्डलिनी शक्ति का जागरण नहीं हुआ है,

| श्रद्धा का<br>ब्रह्मचर्य से<br>सम्बन्ध | परन्तु ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं, उनको अपनी श्रद्धा पर संयम करना अत्यावश्यक है । क्योंकि जब तक काम वासना का वेग कार्य करता रहता है, शुक्र अन्तर्मुखी नहीं हो सकता । |

काम वासना भी स्त्रीसंग की ओर प्रेरणा करने वाली एक प्रकार की राजसी श्रद्धा का ही रूप है । जब सात्विक श्रद्धा का उदय होता है और देव बुद्धि अथवा पूज्य बुद्धि उत्पन्न होती है, तब तुरन्त काम वासना शान्त हो जाया करती है । श्रद्धा ही बहिर्मुखी होकर सृष्टि का कारण बन जाती है जैसा ऊपर पंचाग्नि विद्या में कहा गया है और अन्तर्मुखी रहने पर श्रद्धा ही मोक्ष का साधन होती है । इसलिये श्रद्धा को सात्विक रखने पर स्थूल विन्दु की ऊर्ध्व गति संभव है, अन्यथा नहीं । देवता उसकी आहुति सृष्टि के हेतु बहिर्यागार्थ निम्न स्तरों पर देते हैं और मुमुक्षु आत्मचिन्तन रूपी अन्तर्याग द्वारा उसको उलट क्रम का अनुष्ठान करता है ।

गुरु शिष्य का संबंध भी श्रद्धा के सूत्र से बंधा होता है । इसलिये गुरु शिष्य के संबंध पर भी कुछ विचार प्रकट कर के हम यहां विषयान्तर के दोष को पाठकों के लाभार्थ ग्रहण करते हैं ।

<u>गुरु और शिष्य का सम्बन्ध और श्रद्धा ।</u>

गुरु और शिष्य में जो संबंध होता है, उसका सूत्र एक मात्र शिष्य की गुरु के प्रति श्रद्धा ही है । यदि शिष्य की श्रद्धा शिथिल

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