भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी २३१


शिव ताण्डव

हिरण्मयेनपात्रेण सत्यस्यापिहितंमुखम् ।
तत्त्वंपूषन्नपा वृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ (यजुर्वेद)

वेद कहते हैं कि सत्य का मुख सुवर्ण के पात्र से ढका हुआ है, मानो सत्य की देवी ने सुनहरी घूंघट से अपना सुंदर वदन छुपा लिया है, अथवा उसकी सुनहरी अलकें ही मुख पर आ पडी हैं जो घूंघट का काम कर रही हैं। यदि कहें कि सूर्य अपनी ही किरणों में स्वयं छुप गया है तो अधिक ठीक है। यह उपमा आत्मदेव के लिए दी गई है। अध्यात्म-सूर्य जो सत्य है, अपनी माया के सुनहरी पडदे में स्वयं अंतर्हित हो रहा है। कोई-कोई दार्शनिक विद्वान माया की अन्धकार से तुलना करते हैं, परन्तु माया का अर्थ सुवर्णमय विस्तार भी तो किया जाता है। क्या यह दूसरा अर्थ सुंदर नहीं है ? सुवर्ण किसको प्रिय नहीं लगता ? सुवर्ण में तो एक कांति चमकती है, अंधकार में कांति कहां ? इसलिये हम तो यह ही समझते हैं कि माया का पडदा अथवा घूंघट हिरण्यमय ही ठीक बखाना गया है, जिसके आकर्षण में पडकर जीव अनादिकाल से मर-मर कर भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहा। आधुनिक युग का भौतिक विज्ञान तो इस सुनहरी घूंघट के सौंदर्य से संतुष्ट नहीं होता, उसने उस पर हजारों रहस्यमय तारे लगा दिये हैं, मानों प्रकृति के विद्युत्कण(electrons) अनंत संख्या में चमक रहे हैं। यद्यपि भौतिक विज्ञानियों की दृष्टि पडदे के पीछे छुपे हुये सत्य के मौलिक सौंदर्य तक नहीं जाती, तो भी वह अपने मनोरंजन में व्यस्त हैं। इसमें