भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 415 में से

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२३२ सौंदर्य लहरी


किसी का क्या दोष है ? हिरण्मय घूंघट की ही शोभा इतना आकर्षण रखती है, कि उसे स्वयं आत्मदेव ने ही ओढ लिया है । अपना मुख छुपाने की दृष्टि से नहीं, परन्तु इसमें उसका अपने सौंदर्य का विकास करने का ही मुख्य उद्देश्य जान पडता है । शायद शून्यवादी इस रहस्य से परिचित नहीं है, उसका तो विश्वास यह जान पडता है कि घूंघट के पीछे कोई तत्त्व नहीं, केवल शून्य पर ही पददा पडा हुआ है, वास्तव में जांच तो उसकी किसी हद तक ठीक ही सी जान पडती है, परन्तु क्या शून्य का ही नाम सत्य है ? वेद मिथ्या क्यों बहकाने लगे । इसी धारणा से शायद बुड्ढे भारत के कतिपय पागल जिज्ञासु उस शून्य में ही मौलिक सत्य की खोज के लिये कटिबद्ध रहते हैं । जिसका घूंघट, जो उसी की किरणों की प्रभा की जाली से बना हुआ है, इतना सुंदर है, तो उस सत्य के मुख की शोभा कितनी ऊंची होना चाहिये । पाठकगण ! वह अनुमान का विषय नहीं है, परन्तु कोई-कोई सत्य के अन्वेषक साक्षि देते हैं कि वह अवश्य दर्शनीय है । इसलिये इन भौतिकवादियों की बातों में नहीं आना, उसे शून्य मत समझो, वह शून्य नहीं है, वरन् पूर्ण है, सुंदर है, स्वयं ज्योति स्वरूप है, सत्य है, अनंत ज्ञान निधि है, और आनंद का खजाना है । वह पददे में है दिखता नहीं तो यह नहीं समझना चाहिये कि उसका अस्तित्व ही नहीं । ठीक बात तो यह ही है कि सूर्य अपनी किरणों में छुपा होने के कारण नहीं दिखाई दे रहा, बस यह बात बीसों बिसवे सत्य समझो ! उक्त हिरण्यमय पददे को ही गायत्री मंत्र 'भर्गो देवस्य' कहकर ध्यान करने का उपदेश करता है । तेज के ध्यान द्वारा तेजस्वी का ध्यान होता है, और शक्ति का ध्यान करने से शक्ति मान का ध्यान होता