सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 284, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें२३४ | सौंदर्य लहरी
नृत्य कर रही है और तेज भी युग पद् अपरिणामी होते हुए भो, उसके नृत्य के साथ ताण्डव करता रहता है । यह ही शिवशक्ति का अनादि जोडा है ।
यह समस्त जड-चेतनमय विश्व शंकर भगवान के अविराम ताण्डव नृत्य का अभिनय है और उनके ताण्डव के अंगहार अथवा अंग विक्षेप ही मानों सत् शक्ति के परिणामक्रम के विभिन्न स्तरों पर उसकी स्वांग भरी नृत्य कलाएं हैं, जिस शृंगार के नवधा-रस-परिपूर्ण हाव-भावों में शंकर के चिदानंद स्वरूप का प्रत्याभास हो रहा है । इस नृत्य को आनंद ब्रह्म के उन्मेश से प्रेरणा मिलती है और प्रलयकालीन विराम भी नृत्य के परिश्रम के अनंतर विश्रामरूपी आनंद का आभोगरूपी निमेश है । शिवजी के इस आनंदोन्मेशरूपी ताण्डव को वेदों ने संवर्तन कहा है और शंकर भगवत्पाद उसको विवर्तन कहते हैं । हमको तो दोनों शब्द एक ही अर्थ में प्रयुक्त हुये से दीखते हैं ।
शिवजी के ताण्डव नृत्य को तालबद्ध करने के लिये उन दिगम्बर एवं चिदम्बर के पास डमरू के वाद्य के सिवाय दूसरा यंत्र नहीं ! डमरू में दो विपरीत दिशाओं से शिव-शक्त्यात्मक दोनों ही प्रकार के शब्द ताल दिया करते हैं । जिनसे सरस्वती देवी अ-क--च-ट-त-प-यशों के वर्ण-वर्गों की वर्ण-माला की शिक्षा ग्रहण करके समस्त वैखरी वाणी की सृष्टि करती है । मानों शिवजी के डमरू की सहायता से ही वह वाक्शक्ति बोलना सीखती है और उसका अभ्यास अपनी वीणातंत्री पर किया करती हैं । अर्थात ताण्डव की तालों से निकलने वाली शिव-शक्त्यात्मक ध्वनि ही शंकर का