सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी २३७
सौन्दर्य लहरी (उत्तरार्द्ध)
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणतास्म ताम् ॥
सौन्दर्य लहरी को दो भागों में विभक्त किया जाता है। प्रथम भाग जिसमें ४१ श्लोक हैं, आनन्द लहरी के नाम से विख्यात है। यह नाम श्लोक ८ में स्पष्ट रूप से मिलता है और २१ वें श्लोक में भी परमाह्लाद लहरी पद का प्रयोग तदर्थ वाचक है। इस भाग में शंकर भगवत्पाद ने पिंडस्थ शक्ति और तत्संबंधी श्री चक्र, श्री विद्या, षट् चक्र वेध और उनका मातृकाओं के द्वारा परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणि से, और सब के पारस्परिक संबंधों पर प्रकाश डाला है, जिसका उद्देश्य कुण्डलिनी शक्ति के जागरण द्वारा अद्वैत सिद्धान्त के जीव ब्रह्मैक्य ज्ञान की अपरोक्षानुभूति कराना मात्र है। यह पूर्व भाग पूरे ग्रंथ की आत्मा कही जा सकती है, क्योंकि सृष्टि के जड चेतन अनन्त प्रसार में मनुष्य देह ही पूर्ण समझा जाता है। यद्यपि चेतन सत्ता जड प्रकृति का कार्य प्रतीत होती है, और इस भ्रान्ति में पडकर अनेक भौतिकवादी अनात्म वाद का समर्थन करने लगते हैं, परन्तु चेतना को प्रकृति