भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 288

२३८ सौंदर्य लहरी


का अन्तिम विकासस्तर कहकर चेतनकारण वाद को स्वयं सिद्ध करने में, बिना समझे सहायक बनते हैं । ब्रह्माण्ड में जो चेतन सत्ता अपरोक्ष में निहित है, वह पिंड में प्रत्यक्ष प्रकाशमान है । सूर्य चन्द्र, तारागण के अनन्त विश्व में भौतिक वादियों को जड प्रकृति का ही विस्तार दिखाई देता है, जिसके सामने आकीट पतंग, पशु, पक्षि, एवं मनुष्य में चमकने वाली चेतना के ये सब विकास स्थान अतिक्षुद्र और अणु समान हैं, तो भी समस्त चेतन जगत् का शिरोमणि मनुष्य, प्रकृति को स्वायत करने में कृत कार्य होकर चेतन सत्ताकी महिमा को सिद्ध करता है । जो चेतन सत्ता प्राणि-मात्र में अर्ध विकसित दिख पडती है, मनुष्य देह में उसका विकास इतना अधिक है कि उसे पूर्ण विकास कहने में संकोच नहीं होता, परन्तु भारत के ऋषि महर्षियों ने यह दावा किया है कि मनुष्य देह में जो चेतन प्रकाश है वह प्रसुप्तवत् अंशविकास ही है, उसकी चरम और परम सीमा ब्रह्म भाव के जागृत होने पर मिलती है । सृष्टि की आदि कारण भूताशक्ति चिति की ही वह सत्ता है, जो एक अंश में समस्त चेतन जगत में विद्यमान है ।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ॥ गीता ॥

और प्रत्येक मनुष्य-देह प्रकृति देवी के विकास का वह पुष्प है, जिसके द्वारा पूर्णतया विकसित होने पर, वह आदि शक्ति अपनी संपूर्ण अनन्त महिमा की अभिव्यक्ति स्वरूप किरणों को सुगन्धवत् फैलाने लगती है, तथापि उसके परोक्ष अस्तित्व का परिचय ब्रम्हाण्ड का अणु २ दे रहा है । पिंड और ब्रह्मांड दोनों में उसी की व्यक्तता