भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी २४९


ा से दक्षिण की ओर लिपिक्रम होता है, अर्थात् पहिले दिवस
र पश्चात् रात्रि की क्रमगति है और मध्य में संध्या । दिवस से
ग्रत, रात्रि से सुषुप्ति और संध्या से स्वप्नावस्था का ग्रहण करना
हिये । भगवती की कृपा दृष्टि से जाग्रत में जगत् की अज्ञान स्वरूप
ति होती है, रात्रि में सुषुप्ति का अज्ञानान्धकार रहता है परन्तु वह
वती के चन्द्रात्मक नेत्र के प्रकाश से ज्ञानमय समाधि की अवस्था में
णत हो जाता है, और संध्या रूपी स्वप्नावस्था ज्ञान की वह भूमिका
जिसमें जगत स्वप्नवत् दिखने लगता है । तीनों को ज्ञान की
शः पांचवी, छठी और सातवी भूमिकायें समझना चाहिये ।
सूत्र (३. २. १.) में स्वप्न के लिये संध्य पद का प्रयोग किया
ा है। वहां शंकर भगवत्पाद अपने भाष्य में संध्य की व्याख्या
शब्दों में करते हैं:— "संध्यामिति स्वप्नस्थानमाचष्टे वेदे प्रयोग
नात् 'संध्यं तृतीयं स्वप्न स्थानम्' (वृ. ४. ३. ९.) द्वयोर्लोक
ानयोः प्रबोधसंप्रसादस्थानयोर्वा संधौ भवतीति संध्यम् ।"

अर्थ:— सन्ध्या स्वप्नावस्था को कहते हैं । वेदों में ऐसा
योग मिलता है । जैसे सन्ध्या तीसरा स्वप्न स्थान है । अथवा
ोध संप्रसाद के दोनों लोकस्थानों की संधी भी संध्या होती है ।
ात् में प्रबोध अर्थात् ज्ञान दृष्टि और संप्रसाद (ब्रह्मलीनता
रूप समाधि) दोनों के मध्यवर्तीदशा संध्या कहलाती है । प्रबोध
जाग्रत् और संप्रसाद से सुषुप्ति का अभिप्राय है । परन्तु ज्ञानी
र अज्ञानी के दृष्टिकोण में इतनी भिन्नता रहती है, कि ज्ञानी
ग्रत् में जगत् को ब्रह्म में स्थित देखता है । जैसा कि भगवान