भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 415 में से

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२५० सौंदर्य लहरी


के इस वाक्य से प्रकट होता है। यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। इत्यादि।

गीता के एकादश अध्यायोक्त विराट् दर्शन में अर्जुन को इस ही प्रकार की दिव्य दृष्टि होने का वर्णन है।

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाडवस्तदा (गीता ११.१३)

पांडव ने वहां सारे अनेकधा प्रविभक्त जगत् को एक स्थान पर ही देवाधिदेव के शरीर में देखा। अज्ञानी की दृष्टि इससे विपरित जगत् को 'सत्यवत् देखती है और भगवान की उसमें व्यापकता की कल्पना मात्र करती है। सुषुप्ति में ज्ञानी की स्थिति सात्विक सोमामृतमयी होने से आत्मस्थिति का अनुभव कराती है, और ज्ञानी स्वप्नों के दृश्यों को भी आत्मा के स्वरूप की रश्मियोंवत् जानता है।

तीसरा नेत्र आग्नेय है। और अग्नि का रंग लाल होता है। वह नेत्र लाल क्यों है। इसका कारण ५० वें श्लोक में बताया गया है, ४९ वें श्लोक में उस ही दृष्टि की विविध भावपूर्ण अवलोकन-शक्तियों का वर्णन है। जिनका वर्णन करने में प्रत्येक शक्ति को कवि ने अपनी समकालीन प्रमुख नगरियों के नाम से नामांकित किया है।

जिनके नाम यह हैं, १ विशाला (बद्रीनाथ) २ कल्याणी (मुंबई और नासिक के मध्यवर्ती एक रेलवे जंक्शन) ३ अयोध्या,