सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
२५० सौंदर्य लहरी
के इस वाक्य से प्रकट होता है। यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। इत्यादि।
गीता के एकादश अध्यायोक्त विराट् दर्शन में अर्जुन को इस ही प्रकार की दिव्य दृष्टि होने का वर्णन है।
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाडवस्तदा (गीता ११.१३)
पांडव ने वहां सारे अनेकधा प्रविभक्त जगत् को एक स्थान पर ही देवाधिदेव के शरीर में देखा। अज्ञानी की दृष्टि इससे विपरित जगत् को 'सत्यवत् देखती है और भगवान की उसमें व्यापकता की कल्पना मात्र करती है। सुषुप्ति में ज्ञानी की स्थिति सात्विक सोमामृतमयी होने से आत्मस्थिति का अनुभव कराती है, और ज्ञानी स्वप्नों के दृश्यों को भी आत्मा के स्वरूप की रश्मियोंवत् जानता है।
तीसरा नेत्र आग्नेय है। और अग्नि का रंग लाल होता है। वह नेत्र लाल क्यों है। इसका कारण ५० वें श्लोक में बताया गया है, ४९ वें श्लोक में उस ही दृष्टि की विविध भावपूर्ण अवलोकन-शक्तियों का वर्णन है। जिनका वर्णन करने में प्रत्येक शक्ति को कवि ने अपनी समकालीन प्रमुख नगरियों के नाम से नामांकित किया है।
जिनके नाम यह हैं, १ विशाला (बद्रीनाथ) २ कल्याणी (मुंबई और नासिक के मध्यवर्ती एक रेलवे जंक्शन) ३ अयोध्या,
सौंदर्य लहरी २५१
४ धारा (आधुनिक धार), ५ मथुरा (आधुनिक मथुरा अथवा मदुरा), ६ भोगवतिका (अमरावती), ७ अवन्ती (आधुनिक उज्जैन) ८ विजया (आधुनिक विजय नगर)।
[ ४९ ]
विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः
कृपाधारा धारा किमपि मधुराभोगवतिका ।
अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया
ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ॥
कठिन शब्दों का अर्थः— कुवलय = कमल; व्यवहरण = नाना-अर्थों के संदेह को हरण करने वाले।
अर्थः— तेरी दृष्टि विशाला, कल्याणी खिले हुए कमलों की शोभा की उपमा से ऊंची अयोध्या, कृपा की धारा सदृश धारा, कुछ२ मधुरा, भोगवतिका, सबकी रक्षा करने वाली अवन्तिका, और अनेक नगरों के विस्तार को जीतने वाली विजया है, और निश्चय से इन प्रत्येक नगरियों के नाम से संबोधित नाना अर्थों के संदेह को हरण करने के योग्य हैं । अर्थात् प्रत्येक के नाम की भाव सूचक हैं ।
विशाला अर्थात् उदारता के कारण विशाला है। सबका कल्याण करती है, इसलिये कल्याणी है। कमलों की शोभा तेरे सामने हार मानती है, इसलिये अयोध्या है। मधुर होने के कारण मधुरा है।
२५२ सौंदर्य लहरी
भोगों को देती है, इसलिये भोगवतिका है। सबकी रक्षा करती है, इसलिये अवन्तिका है। और तेरे पराक्रम को कोई नहीं पा सकता, इसलिये विजया है। उक्त आठ प्रकार के भाव युक्त भगवती की दृष्टि है, पंडित सुब्रह्मण्य शास्त्री और श्री निवास अयंगर की अंग्रेजी पुस्तक में इन दृष्टियों के स्वरूप इस प्रकार बताये गये हैं। अन्तर्विकसित दृष्टि विशाला कहलाती है, आश्चर्ययुक्त दृष्टि कल्याणी है, जिसमें पुतलियां फैल जायें वह अयोध्या, आलस्य युक्त दृष्टि धारा, नेत्रों के किंचित् चक्कर खाने पर मधुरा, मैत्री के भावयुक्त भोगवती, निष्पाप दृष्टि जिसमें भोलापन टपक अवन्ती, और तिरछी निगाह विजया कहलाती है। इन दृष्टियों का प्रभाव क्रमशः उच्चाटन, आकर्षण, द्रवीकरण, संमोहन, वशीकरण, ताडन, विद्रावण और मारण है।
उक्त आठों भाव अग्नि में पाये जाते हैं, इसलिये यह दृष्टि तीसरे नेत्र से विशेषेण संबंधित है।
[ ५० ]
कवीनां संदर्भस्तवकमकरन्दैकरसिकं
कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौ कर्णयुगलम् ।
अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला-
वसूयासंसर्गादलिकनयनं किञ्चिदरुणम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:—संदर्भ=कविता; अलिकनयनं=माथे का तीसरा नयन; अलिक=ललाट ।
सौंदर्य लहरी २५३
अर्थ:— कवियों की कविता रूपी स्तवक से उठने वाली सुगंध के रसिक कानों का साथ न छोड़ने वाले तेरे कटाक्ष विक्षेप युक्त, तिरछी निगाह से देखने वाले, भ्रमरों के सदृश, और कविताओं के ९ रसों का आस्वाद लेने को बेचैन, चंचल दोनों नेत्रों को देख कर ईर्ष्या के संसर्ग से तेरा (तीसरा) मस्तक वाला नेत्र कुछ लाल रंग युक्त है ।
भाव यह है कि दोनों कान कवियों की कविताओं के रसिक हैं, और दोनों नेत्र भी उसके ९ रसों का स्वाद लेने को बेचैन हैं, इसलिये कानों का स्पर्श करने के लिये वहां तक फैले हुए हैं। और उनसे तीसरा नेत्र ईर्ष्या करता है, क्योंकि उसकी पहुंच कानों तक नहीं होती, इसीलिये वह असूया से लाल हो गया है। नेत्रों का बड़ा होना सौंदर्य का लक्षण है। कवि उनको कान तक फैला हुआ कहा करते हैं, और साथ ही इस मिस से तीसरे नेत्र के रक्तवर्ण होने का कारण भी बताया गया है।
[ ५१ ]
शिवे शृङ्गारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा
सरोषा गंगायां गिरिशचरिते विस्मयवती ।
हराहिभ्यो भीता सरसिरुह सौभाग्यजयिनी
सखीषु स्मेरा ते मयि जननि दृष्टिः सकरुणा ॥
अर्थ:— शिव के प्रति तेरी दृष्टि शृङ्गारार्द्र है. इतर जनों के प्रति कुत्सित उपेक्षा युक्त, गंगा पर सरोष, शिवजी के
२५४ | सौंदर्य लहरी
चरित्रों पर विस्मय प्रकट करने वाली, शिवजी के सर्पों से भीत, कमलों की शोभा को पराजित करने वाली, सखियों के प्रति मुस्कान लिए हुए है, और हे जननि मेरे ऊपर तेरी करुणायुक्त दयादृष्टि है ।
यहां यह बताया गया है कि भगवती की दृष्टि से ९ रसों का भाव टपकता है। जिनके क्रमशः नाम इस प्रकार हैं। श्रृंगार, विभत्स (घृणा), रौद्र, अद्भुत (विस्मय), भयानक, वीर, हास्य, करुणा, और शान्त। इस श्लोक में अन्तिम शान्त रस का नाम नहीं आया है। इसका अभिप्राय यह है कि भगवती की स्वाभाविक दृष्टि शान्त रस पूर्ण है, जो शान्ति कला का स्वभाव है, इसलिये स्पष्ट कहने की आवश्यकता नही है। अर्थात् भगवती की दृष्टि नवधारस पूर्ण है। इस श्लोक का संबंध ४९ वें श्लोक से है। परन्तु दोनों के भाव में भिन्नता है।
[ ५२ ]
गते कर्णाभ्यर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती
पुरां भेत्तूश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले ।
इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके
तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:— फल=फल और बाण का अग्र भाग; गोत्र=पर्वत, गरुत=पर, पंख.
सौंदर्य लहरी २५५
अर्थः- हे पर्वतराज के कुल की प्रमुख कली ! ये तेरे बाणों सदृश दोनों नेत्र कानों तक पहुंचे हुए हैं, जो पंखों के स्थान पर पलकें धारण किए हुए हैं, और पुरारि के चित्त की शान्ति को भंग करने वाले फल से युक्त हैं, कान तक ताने हुए ये कामदेव के बाणों का कार्य कर रहे हैं ।
बाणों को गति देने के लिये पंख लगाये जाते हैं, और चीरने का कार्य करने के लिये अग्र भाग में लोहे का फल होता है, यहां पलकें पंखवत् हैं, और कटाक्ष का फल शंकर के शान्त चित्त को भंग करने वाला फल है। यहां फल शब्द उभयार्थ प्रयुक्त है, और धनुष चढाने पर बाण को कान तक ताना जाता है, इस प्रकार दोनों नेत्रों की पूर्ण उपमा कामदेव के बाणों से दी गई है । काम देव के बाणों का प्रहार मनुष्यों के चित्त में क्षोभ उत्पन्न करता है, इसी प्रकार देवी का कटाक्ष शंकर के चित्त में क्षोभ उत्पन्न करता है, अर्थात् परब्रह्म में स्पन्द उत्पन्न करता है ।
[ ५३ ]
विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितलीलाऽञ्जनतया
विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते ।
पुनः स्रष्टुं देवान्द्रुहिणहरिरुद्रानुपरतान्
रजः सत्त्वं बिभ्रत्तम इति गुणानां त्रयमिव (स्वयमिव) ॥
अर्थः- हे ईशान की दयिते ! ये तेरे तीनों नेत्र तीन रंग का अंजन लगाने से मानों पृथक २ तीन रंग के चमक
२५६ | सौंदर्य लहरी
रहे हैं, और महा प्रलय के अन्त में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र को जो प्रलय काल में उपरत हो गये थे, फिर पैदा करने के लिये रज, सत्व और तम तीनों गुणों को धारण किये हुए से प्रतीत होते हैं ।
रजो गुण रक्त वर्ण हैं, सत्व शुक्ल वर्ण और तमो गुण कृष्ण वर्ण हैं। भगवती के दो नेत्र चन्द्र सूर्यात्मक श्वेत और कृष्ण वर्ण हैं, और तीसरा नेत्र मस्तक में आग्नेय रक्त वर्ण हैं। महा प्रलय में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी लीन हो जाते हैं, परन्तु शक्ति ब्रह्म के साथ अव्यक्त रूप में बनी रहती है। प्रलय के अन्त में व्यक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु, और रुद्र को फिर अपने नेत्रों के उन्मीलन से उत्पन्न करती है। ब्रह्मा रजो गुण के, विष्णु सत्व गुण के और रुद्र तमो गुण के अधिदेव हैं, इसलिये मानों भगवती के तीनों नेत्रों के खुल जाने पर वह उन में सत्व, रज और तम रूपी तीन प्रकार का अंजन आंज लेती हैं। अर्थात् भगवती की दृष्टि तीन गोलकों का आश्रय लेने से तीनों के रूप में व्यक्त होती हैं। यद्यपि दृष्टि की शक्ति एक ही है तो भी तीन प्रकार के गुण रूपी अंजनों के कारण त्रिधा प्रतीत होती है, क्योंकि तीनों में सृष्टि स्थिति संहार करने की तीनों शक्तियां एक ही शक्ति के तीन रूप हैं ।
सौंदर्य लहरी २५७
( ५४ )
पवित्री कर्तुं नः पशुपतिपराधीनहृदये दयामित्रै र्नेत्रैररुणधवलश्यामरुचिभिः । नदः शोणो गङ्गा तपनतनयेति ध्रुवममु ( मयं ) त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि संभेदमन्वम् ॥
**अर्थः—**पशुपति शंकर भगवान की पराधीनता में हृदय समर्पण करने वाली हे भगवती ! अरुण, शुक्ल, और श्याम वर्णों की शोभा से युक्त दयापूर्ण अपने नेत्रों से शोणनदी, गंगा और सूर्यतनया ( जमुना ) इन तीनों तीर्थों के सदृश निश्चय ही हम लोगों को पवित्र करने के लिये तू पवित्र संगम बना रही है ।
गंगा और यमुना का संगम प्रयाग में है जो दोनों नेत्रों के बीच है, वह भ्रू मध्य भाग काशी है । उसके ऊपर तीसरा नेत्र शोणनदी है । ज्ञाननेत्र में तीनों का एकीकरण होता है । शोणनदी काशी से कुछ आगे चल कर गंगाजी से मिलती है । नासिका के अग्रभाग पर, भ्रूमध्य में और ललाट प्रदेश में ध्यान करने की विधि योग धारणा के प्रधान साधन हैं । उन स्थानों पर धारणा करके वहां चित्त को ध्यान मग्न कर देना ही उक्त तीर्थों में स्नान करना है ।
२५८ सौंदर्य लहरी
( ५५ )
निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती
तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये ।
त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः
परित्रातुं शंके परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥
अर्थ:— हे धरणिधर राजन्य हिमाचल की पुत्री ! सन्तों का कहना है कि तेरे निमेष (नेत्र बंद करने) से जगत् का प्रलय और उन्मेष अर्थात् नेत्र खोलने से उद्भव अर्थात् सृष्टि होती है । यह सारा जगत् प्रलय के पश्चात् तेरे उन्मेष से उत्पन्न हुआ है, उसकी रक्षा करने के लिये ही मुझे शंका होती है, कि तेरी आंखों ने झपकना बंद कर रखा है ।
आंखों का झपकना इस लिये बन्द कर रखा है कि कहीं झपकने के साथ तुरन्त प्रलय न हो जाय । देवताओं के नेत्रों में झपकियां नहीं पडतीं; इस लिये भगवती के नेत्र भी सदा निमेषोन्मेषरहित रहते हैं, यह बात इस श्लोक में कही गई है । यदि कहो कि कमल खिला रहता है और मछलियों के नेत्र भी नहीं झपकते, तो अगला श्लोक लिखते हैं कि:—
सौन्दर्य लहरी १०२
[ ५६ ]
तवार्पणे कर्णे जपनयन पैशुन्य चकिता
निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः ।
इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयं
जहाति प्रत्यूषे निशि च विघटय्य प्रविशति ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— शफरिका=मछली; कुवलय=कुमुद ।
अर्थ:— हे अपर्णे ! निमेष रहित मछलियां तो सदा पानी में छुपी रहती हैं, उनको यह भय रहता है कि कहीं तेरी आंखें ईर्ष्या वश उनकी चुगली तेरे कानों से न करदें, और यह लक्ष्मी सबेरा होने पर कपाटों के सदृश बंद हो जाने वाले दलयुक्त कुमुदिनी को छोड़ जाती है, और रात्रि को उन्हें खोल कर प्रवेश करती है ।
भाव यह है कि भगवती के निमेषोन्मेषवर्जित नेत्रों की प्रतिद्वंद्वी एक तो मछलियां हैं, दूसरी कुमुदिनी हैं । मछली तो पानी में छुपी रहती है, और कुमुदिनी रात्रि को ही खिलती है और दिन में बंद होकर श्री (कांति) हीन हो जाती है ।
२६० सौंदर्य लहरी
[ ५७ ]
दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा
दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे ।
अनेनायं धन्यो भवति न च हानिरियता
वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ॥
**अर्थ:—**हे शिवे ! किंचित् विकसित् नीलोत्पल की शोभा से युक्त दूर तक पहुंचने वाली अपनी दृष्टि से कृपया दूरस्थित मुझ दीन को भी स्नान करा दे । उससे यह धन्य हो जायगा, और ऐसा करने से तेरी कोई हानि नहीं है, क्योंकि चन्द्रमा की किरणें वन में और महलों में समान रूप से पडती हैं ।
कनपटियों का ध्यान:—
[ ५८ ]
अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये
न केषामाधत्ते कुसुमशरकोदंडकुतुकम्
तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लंघ्य विलस—
न्नपांगव्यासंगो दिशति शरसंधानधिषणाम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— अरालं=वक्र; पाली=कनपटीकोण; अग=पर्वत; अपांग=कटाक्ष ।
सौंदर्य लहरी २६१
**अर्थ:—**हे पर्वत राज की पुत्रि तेरी दोनों वक्र कनपटियां किसकी बुद्धि में पुष्पवाण धारण करने वाले धनुष के कोणों का कौतुहल न करेंगी। जहां श्रवणपथ का उल्लंघन करके तेरा तिरछा कटाक्ष कनपटी को लांघकर कान तक पहुंचा हुआ बाण सदृश दिखता है. जो दोनों भौंहों के धनुष पर चढ़ा हुआ है. कनपटियां धनुष के कोण हैं। भगवती की त्योरी रूपी धनुष पर चढ़े हुए कटाक्ष रूपी बाण से समस्त बाधाओं का नाश होता है।
मुख का ध्यान:—
[ ५९ ]
स्फुरद्गण्डाभोगप्रतिफलितताटंकयुगलं
चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथम् ।
यमारुह्य (यमाश्रित्य) द्रुह्यत्यवनिरथमर्केन्दुचरणं
महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— ताटंक=कर्णफूल।
**अर्थ:—**तेरे चमकते हुए कपोलों पर प्रतिबिंबित दोनों कर्णफूलों युक्त तेरा मुख मुझे चार पहियों वाला कामदेव का रथ जंचता है, जिस पर चढ़ कर अथवा जिसका आश्रय लेकर महावीर कामदेव, सूर्य और चन्द्रमा दो पहियों वाले पृथिवी रूपी रथ पर युद्धार्थ सुसज्जित शंकर के विरुद्ध अड़ा है।
२६२ सौंदर्य लहरी
मुख रथ है, उसके चार पहिये कानों में लटकते हुए दो कर्ण फूल हैं, और दो उनके कपोलों पर प्रतिबिंब हैं । शंकर का रथ पृथ्वी है, जिसके सूर्य और चन्द्रमा दो पहिये हैं, जिसपर चढकर शंकर ने त्रिपुरों को हराया था । परन्तु यहां देवी के मुख रूपी रथ का आश्रय लेने के कारण कामदेव शंकर के समक्ष युद्ध करने का साहस करता है ।
[ ६० ]
सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः
पिबंत्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलम् ।
चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो
झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:- तार=ॐ कार. प्रति वचन=स्वीकृति सूचक हुंकार कहना ।
अर्थ:- हे शर्वाणि ! सरस्वती की सुन्दर युक्ति को जो अमृत की लहरी के कौशल को हरती है श्रवण रूपी चुल्लुओं द्वारा अविरल पान करते समय तेरे कुंडलगण चमत्कार पूर्ण उक्तियों की श्लाघा सूचक सिर हिलाते समय, झण २ बजकर मानों ॐकार का उच्चारण सदृश हुंकार द्वारा उत्तर दे रहे हैं ।
प्राचीन काल में अनुज्ञा सूचक शब्द के स्थान पर ॐ कहते थे, जैसे आजकल हां अथवा हुं कहकर अनुज्ञा प्रकट की जाती है । देखें छान्दोग्योपनिषत् ( १. १. ८)
सौन्दर्य लहरी २६३
तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धिाकिंचानुजानाति ॐ इत्येव तदा हैषा एव समृद्धैर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति यस्तदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ।
यहां भगवती जब अनुज्ञा सूचक सिर हिलाती हैं, तो उनके कानों के कुंडल मानो 'ॐ' का उच्चारण कर के अनुज्ञा प्रकट करते हैं, क्योंकि सरस्वती की सुन्दर वाणी रूपी अमृत का पान कर्ण ही करते हैं, यदि जिह्वा पान करती होतो तो जिह्वा वाणी द्वारा अनुज्ञा प्रकट करती, परन्तु यहां कान पान करते हैं, इसलिये जिह्वा मौन है और कान बोल नहीं सकते, इसलिये कानों के बदले कानों के कुण्डल बज बज कर झणत्कार रूपी ॐ ॐ कहकह कर अनुज्ञा प्रकट कर रहे हैं। कुण्डलों की झंकार रूपी ॐकार की ध्वनि युक्त उद्गीथ उपासना का फल समृद्धि होना चाहिये, जैसा कि उपरोक्त छान्दोग्य श्रुति में कहा गया है, उस समृद्धि का वर्णन अगले श्लोक में है।
<u>नासिका ध्यान</u>
[ ६१ ]
असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि ( पटे )
त्वदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचितम् ।
वहन्नन्तर्मुक्ताः शिशिरतर निश्वास घटिताः ( गलिताः )
समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:— तुहिन=हिम. नेदीयस्=अति निकट शीघ्र, तुरन्त।
२६४ सौंदर्य लहरी
अर्थः— हे तुहिन गिरि अर्थात् हिमाचल के वंश की ध्वजा की पताके। तेरे नाक का यह बांस हमको शीघ्र उचित फल का देने वाला हो। अथवा उसपर हमारे लिये उचित फल लगें। क्योंकि उसके भीतर तेरे अति शीतल निश्वासों से मोती बन रहे हैं, और उनकी वांयें नथने में इतनी समृद्धि है कि एक मुक्तामणि बाहर भी दिखा रहा है। यहां नथ के मोती से अभिप्राय है जो बाँयें नाक में पहनी जाती है।
वंश द्व्यर्थवाचक शब्द है बांस और कुल। हिमाचल पर लगे हुए बांस पर ध्वजा फहराई जाय, तो उसकी पताका के सदृश भगवती की उपमा है, दूसरे अर्थ में भगवती को हिमालय के कुल की ध्वजपताका सदृश कहा गया है। बांस में फल नहीं लगते, परन्तु उसके अन्दर मोतियों की उत्पत्ति कही जाती है। ‘मुक्ता’ शब्द भी द्व्यर्थवाचक है, मोती को मुक्ता कहते हैं और जीवन मुक्त पुरुष भी मुक्त कहलाते हैं। बांस में मोती होते हैं और कुल में मुक्त पुरुष उत्पन्न होते हैं। शंकर भगवत्पाद प्रार्थना करते हैं के तेरी नासिका रूपी बांस में हमारे लिये उचित फल लगें और उनकी समृद्धि भी हो। परन्तु जैसे बांस में फल नहीं लगते, और उसके भीतर पोल में मोतियों का उत्पन्न होना सुना जाता है, उसी प्रकार भगवती की नासिका वत् श्रेष्ठ कुल में अर्थात् भगवती के उपासक संप्रदाय में मुक्त पुरुषों की उत्पत्ती होती है, जिसका उचित फल मुक्ति है। और भगवती के कर्ण फूलों (ताटंको) की झंकार रूपी प्रणवोपासना से उनकी समृद्धि होती है। फल का अर्थ
सौंदर्य लहरी २६५
कामना की पूर्ति के लिये किया जाता है। शंकर भगवत्पाद एक संन्यासी होने के नाते त्यक्त काम थे, जो दारैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा सब ही इच्छाओं से विनिर्मुक्त थे, उन को उचित फल की इच्छा परोपकारार्थ और संसारी जीवों की मुमुक्षा के अतिरिक्त क्या हो सकती थी। अपिच वे स्वयं नासिका के बाहर लगे हुए नथ के मोती के सदृश स्वयं एक मुक्त पुरुष थे, इस लिये उनकी प्रार्थना का भाव यह ही था, कि भगवती की उपासक परंपरा में सदा जीवन्मुक्तों की समृद्धि होती रहे।
हिमगिरी कन्या का निश्वास भी हिमवत् शीतल होना चाहिये, जिस के स्पर्श से तुरन्त ओसकण जमकर मुक्तामणियों के सदृश जमजाते हैं। तद्वत् मानो चन्द्र अथवा ईडा नाडी के वाम नासापुट से जिस पर नथ पहिनी जाती है, टपकने वाले जल कण जमकर मोती बन गए हैं, जो नथ पर दृष्टिगोचर होरहे हैं, यद्यपि नासा वंश में निहित न जाने कितने मुक्ता होसकते हैं। शीतल निश्वास से परम शान्ति का भी अभिप्राय है, जिसके स्पर्श मात्र से मनुष्य जीवन मुक्त हो जाता है।
कर्ण फूलों की प्रणव रूपी झंकार से अन्तर्नाद का भी अभिप्राय होसकता है, जो सरस्वती के शिवस्तवन की एक प्रति ध्वनि कही जा सकती है।
हिन्दी की एक उक्ति है कि केला बिच्छु बांस अपने फले नाश, अर्थात् केला बिच्छु और बांस को फल लगने से वे नष्ट होजाते हैं। इसलिये भगवती के नासावंश में फल न लगाकर,
२६६ सौंदर्य लहरी
उसके भीतर मोतियों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है, जिन की सदा समृद्धि होती रहती है और वह वंश अनादि अनन्त नित्य परंपरा वाला है।
भीतर से बाहर निकलने वाला श्वास निश्वास कहलाता है, और वह उष्ण होता है। यदि किसी मनुष्य का निश्वास शीतल चलने लगे, तो वह उसकी निकटस्थ मृत्यु का अरिष्टसूचक होता है। यहां भगवती का निश्वास शिशिरतर कहागया है, भगवती के परम शान्तिमय अन्तर्हृदय का यह पराक्रम है, जिस से मृत्यु को भी भय लगता है, और उसके परम शान्तिप्रद निश्वास के स्पर्श मात्र से उपासक शीघ्र जीवन मुक्ति का परमानन्द प्राप्त कर लेते हैं।
नासावंशः का अर्थ नासोपम वंशः भी किया जासकता है। किसी मनुष्य की यशः श्लाघा करते समय कहा करते हैं कि वह मनुष्य तो अपने कुल, जाति, वंश अथवा देश की नाक है, इसी प्रकार भगवती के उपासकों का वंश प्रकृति देवी की नाक है, ऐसा कहने से भगवती के उपासकों की सर्वोपरि गणना समझी जानी चाहिये जिन की वंशावलि में जीवन मुक्त महान पुरुषों की सदा समृद्धि होती रहती है। जिन में से कोई कोई प्रकाशित भी होजाते हैं, परन्तु गुप्त रूप से रहने वाले अनेक सन्तों के अस्तित्व की वे साक्षि देते रहते हैं। हिमगिरी के हिम शिखरों का शीतल शान्ति प्रद पवन ही मानो भगवती का कल्याणमय निश्वास है, जो श्रेय के जिज्ञासुओं को उत्तरोत्तर आवाहन करता रहता है।
सौंदर्य लहरी २६९
ओष्ठों का ध्यान:—
( ६२ )
प्रकृत्याऽऽरक्तायास्तव सुदति दन्तच्छदरुचेः
प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता ।
न बिम्बं तद्विम्बप्रतिफलनरागादरुणितं
तुलामध्यारोढुं कथमिव न लज्जेत कलया ॥
अर्थ:— हे सुन्दर दांतों वाली भगवति ! स्वाभाविक लाल-रंग के तेरे होठों की शोभा का सादृश्य करने वाले पदार्थों के नाम कहता हूं। मूंगे की लता में यदि फल आजायं, (तो उतने सुन्दर कहे जा सके हैं), परन्तु विंव फल तो नहीं, क्योंकि उनकी अरुणिमा तो तेरे बिम्ब की प्रतिबिंवित् अरुणिमा की झलक सदृश है, यदि उनमें किसी प्रकार तेरे होठों की तुलना भी की जाय, तो वे तेरे होठों की सुन्दरता की एक कला के बराबर भी सुन्दर न उतरने से क्या लज्जित नहीं होते ?
प्रवाल लता में फल नहीं लगते, क्योंकि वे जड होती हैं। परन्तु यदि उनमें फल लगने लगें, तो संभव है कि भगवती के होठों की उनसे उपमा दी जा सके। और बिंब फल की अरुणिमा तो सामान्य अरुणिमा है, और उसे प्रकृति देवी की आंशिकदेन ही समझना चाहिये, मानो असली रंग की छाया मात्र है। बिंब फलों
२६८ सौन्दर्य लहरी
से कविजन सामान्य स्त्रियों के होठों की उपमा दिया करते हैं परन्तु भगवती के होठों से उनकी उपमा देना उचित नहीं है, क्योंकि उनका सौंदर्य अनुपम है ।
<u>मुस्कान का ध्यान:—</u>
( ६३ )
स्मितज्योत्स्नाजालं तव वदनचन्द्रस्य पिवतां
चकोराणामासीदतिरसतया चञ्चुजडिमा ।
अतस्ते शीतांशोरमृतलहरीमाम्लरुचयः
पिवन्ति स्वच्छन्दं निशिनिशि भृशं काञ्जिकधिया ॥
अर्थ:— तेरे चन्द्रवदन की मुस्कान रूपी ज्योत्स्ना (चांदनी) की प्रचुरता को पीकर, अति मधुर होने के कारण चकोरों की चंचु अति रसास्वाद से जड हो गई है अर्थात् हट गई है । इसलिये वे खट्टे रस के इच्छुक चन्द्रमा के अमृत की लहरी को कांजी सदृश समझ कर प्रतिरात्रि खूब स्वच्छन्द पीते रहते हैं ।
अर्थात् चांद की चांदनी प्रकृति की मुस्कराहट की मधुरता के सामने कांजीवत् खट्टी है ।
सौंदर्य लहरी २६२
जिह्वा का ध्यानः—
( ६४ )
अविश्रान्तं पत्युर्गुणगणकथाऽऽम्रेडनजपा
जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा ।
यदग्रासीनायाः स्फटिकदृषदच्छच्छविमयी
सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्यवपुषा ॥
कठिन शब्दः- आम्रेडन=बारंबार, दृषद=पत्थर, अच्छत=स्वच्छ ।
अर्थः— हे जननि ! बिना थके पति के गुणानुवाद का बारंबार जप करने वाली, तेरी जवाकुसुम की द्युति सदृश लाल जिह्वा की जय है । जिसके अग्र भाग पर आसीन स्फटिक पत्थर की जैसी शुद्ध कांतिमयी सरस्वती की मूर्ति के शरीर का वर्ण माणिक्य सदृश परिणत हो गया है ।
स्फटिक का धर्म है कि उसपर निकटस्थ पदार्थ का रंग झलकने लगता है अर्थात वह स्वयं उसके रंग में रंग जाता है । सरस्वती का निवास जिह्वा के अग्र भाग पर होता है, और उसका वर्ण स्फटिक वत् स्वच्छ होता है, परन्तु जिह्वा के रंग से लाल दिखने लगता है ।