भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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२५८ सौंदर्य लहरी


( ५५ )

निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती
तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये ।
त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः
परित्रातुं शंके परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥

अर्थ:— हे धरणिधर राजन्य हिमाचल की पुत्री ! सन्तों का कहना है कि तेरे निमेष (नेत्र बंद करने) से जगत् का प्रलय और उन्मेष अर्थात् नेत्र खोलने से उद्भव अर्थात् सृष्टि होती है । यह सारा जगत् प्रलय के पश्चात् तेरे उन्मेष से उत्पन्न हुआ है, उसकी रक्षा करने के लिये ही मुझे शंका होती है, कि तेरी आंखों ने झपकना बंद कर रखा है ।

आंखों का झपकना इस लिये बन्द कर रखा है कि कहीं झपकने के साथ तुरन्त प्रलय न हो जाय । देवताओं के नेत्रों में झपकियां नहीं पडतीं; इस लिये भगवती के नेत्र भी सदा निमेषोन्मेषरहित रहते हैं, यह बात इस श्लोक में कही गई है । यदि कहो कि कमल खिला रहता है और मछलियों के नेत्र भी नहीं झपकते, तो अगला श्लोक लिखते हैं कि:—