सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी २५७
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पवित्री कर्तुं नः पशुपतिपराधीनहृदये दयामित्रै र्नेत्रैररुणधवलश्यामरुचिभिः । नदः शोणो गङ्गा तपनतनयेति ध्रुवममु ( मयं ) त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि संभेदमन्वम् ॥
**अर्थः—**पशुपति शंकर भगवान की पराधीनता में हृदय समर्पण करने वाली हे भगवती ! अरुण, शुक्ल, और श्याम वर्णों की शोभा से युक्त दयापूर्ण अपने नेत्रों से शोणनदी, गंगा और सूर्यतनया ( जमुना ) इन तीनों तीर्थों के सदृश निश्चय ही हम लोगों को पवित्र करने के लिये तू पवित्र संगम बना रही है ।
गंगा और यमुना का संगम प्रयाग में है जो दोनों नेत्रों के बीच है, वह भ्रू मध्य भाग काशी है । उसके ऊपर तीसरा नेत्र शोणनदी है । ज्ञाननेत्र में तीनों का एकीकरण होता है । शोणनदी काशी से कुछ आगे चल कर गंगाजी से मिलती है । नासिका के अग्रभाग पर, भ्रूमध्य में और ललाट प्रदेश में ध्यान करने की विधि योग धारणा के प्रधान साधन हैं । उन स्थानों पर धारणा करके वहां चित्त को ध्यान मग्न कर देना ही उक्त तीर्थों में स्नान करना है ।