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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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सौंदर्य लहरी २६५

कामना की पूर्ति के लिये किया जाता है। शंकर भगवत्पाद एक संन्यासी होने के नाते त्यक्त काम थे, जो दारैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा सब ही इच्छाओं से विनिर्मुक्त थे, उन को उचित फल की इच्छा परोपकारार्थ और संसारी जीवों की मुमुक्षा के अतिरिक्त क्या हो सकती थी। अपिच वे स्वयं नासिका के बाहर लगे हुए नथ के मोती के सदृश स्वयं एक मुक्त पुरुष थे, इस लिये उनकी प्रार्थना का भाव यह ही था, कि भगवती की उपासक परंपरा में सदा जीवन्मुक्तों की समृद्धि होती रहे।

हिमगिरी कन्या का निश्वास भी हिमवत् शीतल होना चाहिये, जिस के स्पर्श से तुरन्त ओसकण जमकर मुक्तामणियों के सदृश जमजाते हैं। तद्वत् मानो चन्द्र अथवा ईडा नाडी के वाम नासापुट से जिस पर नथ पहिनी जाती है, टपकने वाले जल कण जमकर मोती बन गए हैं, जो नथ पर दृष्टिगोचर होरहे हैं, यद्यपि नासा वंश में निहित न जाने कितने मुक्ता होसकते हैं। शीतल निश्वास से परम शान्ति का भी अभिप्राय है, जिसके स्पर्श मात्र से मनुष्य जीवन मुक्त हो जाता है।

कर्ण फूलों की प्रणव रूपी झंकार से अन्तर्नाद का भी अभिप्राय होसकता है, जो सरस्वती के शिवस्तवन की एक प्रति ध्वनि कही जा सकती है।

हिन्दी की एक उक्ति है कि केला बिच्छु बांस अपने फले नाश, अर्थात् केला बिच्छु और बांस को फल लगने से वे नष्ट होजाते हैं। इसलिये भगवती के नासावंश में फल न लगाकर,