सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० सौंदर्य लहरी
[ ५७ ]
दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा
दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे ।
अनेनायं धन्यो भवति न च हानिरियता
वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ॥
**अर्थ:—**हे शिवे ! किंचित् विकसित् नीलोत्पल की शोभा से युक्त दूर तक पहुंचने वाली अपनी दृष्टि से कृपया दूरस्थित मुझ दीन को भी स्नान करा दे । उससे यह धन्य हो जायगा, और ऐसा करने से तेरी कोई हानि नहीं है, क्योंकि चन्द्रमा की किरणें वन में और महलों में समान रूप से पडती हैं ।
कनपटियों का ध्यान:—
[ ५८ ]
अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये
न केषामाधत्ते कुसुमशरकोदंडकुतुकम्
तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लंघ्य विलस—
न्नपांगव्यासंगो दिशति शरसंधानधिषणाम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— अरालं=वक्र; पाली=कनपटीकोण; अग=पर्वत; अपांग=कटाक्ष ।