सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
२६० सौंदर्य लहरी
[ ५७ ]
दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा
दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे ।
अनेनायं धन्यो भवति न च हानिरियता
वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ॥
**अर्थ:—**हे शिवे ! किंचित् विकसित् नीलोत्पल की शोभा से युक्त दूर तक पहुंचने वाली अपनी दृष्टि से कृपया दूरस्थित मुझ दीन को भी स्नान करा दे । उससे यह धन्य हो जायगा, और ऐसा करने से तेरी कोई हानि नहीं है, क्योंकि चन्द्रमा की किरणें वन में और महलों में समान रूप से पडती हैं ।
कनपटियों का ध्यान:—
[ ५८ ]
अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये
न केषामाधत्ते कुसुमशरकोदंडकुतुकम्
तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लंघ्य विलस—
न्नपांगव्यासंगो दिशति शरसंधानधिषणाम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— अरालं=वक्र; पाली=कनपटीकोण; अग=पर्वत; अपांग=कटाक्ष ।
सौंदर्य लहरी २६१
**अर्थ:—**हे पर्वत राज की पुत्रि तेरी दोनों वक्र कनपटियां किसकी बुद्धि में पुष्पवाण धारण करने वाले धनुष के कोणों का कौतुहल न करेंगी। जहां श्रवणपथ का उल्लंघन करके तेरा तिरछा कटाक्ष कनपटी को लांघकर कान तक पहुंचा हुआ बाण सदृश दिखता है. जो दोनों भौंहों के धनुष पर चढ़ा हुआ है. कनपटियां धनुष के कोण हैं। भगवती की त्योरी रूपी धनुष पर चढ़े हुए कटाक्ष रूपी बाण से समस्त बाधाओं का नाश होता है।
मुख का ध्यान:—
[ ५९ ]
स्फुरद्गण्डाभोगप्रतिफलितताटंकयुगलं
चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथम् ।
यमारुह्य (यमाश्रित्य) द्रुह्यत्यवनिरथमर्केन्दुचरणं
महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— ताटंक=कर्णफूल।
**अर्थ:—**तेरे चमकते हुए कपोलों पर प्रतिबिंबित दोनों कर्णफूलों युक्त तेरा मुख मुझे चार पहियों वाला कामदेव का रथ जंचता है, जिस पर चढ़ कर अथवा जिसका आश्रय लेकर महावीर कामदेव, सूर्य और चन्द्रमा दो पहियों वाले पृथिवी रूपी रथ पर युद्धार्थ सुसज्जित शंकर के विरुद्ध अड़ा है।
२६२ सौंदर्य लहरी
मुख रथ है, उसके चार पहिये कानों में लटकते हुए दो कर्ण फूल हैं, और दो उनके कपोलों पर प्रतिबिंब हैं । शंकर का रथ पृथ्वी है, जिसके सूर्य और चन्द्रमा दो पहिये हैं, जिसपर चढकर शंकर ने त्रिपुरों को हराया था । परन्तु यहां देवी के मुख रूपी रथ का आश्रय लेने के कारण कामदेव शंकर के समक्ष युद्ध करने का साहस करता है ।
[ ६० ]
सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः
पिबंत्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलम् ।
चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो
झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:- तार=ॐ कार. प्रति वचन=स्वीकृति सूचक हुंकार कहना ।
अर्थ:- हे शर्वाणि ! सरस्वती की सुन्दर युक्ति को जो अमृत की लहरी के कौशल को हरती है श्रवण रूपी चुल्लुओं द्वारा अविरल पान करते समय तेरे कुंडलगण चमत्कार पूर्ण उक्तियों की श्लाघा सूचक सिर हिलाते समय, झण २ बजकर मानों ॐकार का उच्चारण सदृश हुंकार द्वारा उत्तर दे रहे हैं ।
प्राचीन काल में अनुज्ञा सूचक शब्द के स्थान पर ॐ कहते थे, जैसे आजकल हां अथवा हुं कहकर अनुज्ञा प्रकट की जाती है । देखें छान्दोग्योपनिषत् ( १. १. ८)
सौन्दर्य लहरी २६३
तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धिाकिंचानुजानाति ॐ इत्येव तदा हैषा एव समृद्धैर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति यस्तदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ।
यहां भगवती जब अनुज्ञा सूचक सिर हिलाती हैं, तो उनके कानों के कुंडल मानो 'ॐ' का उच्चारण कर के अनुज्ञा प्रकट करते हैं, क्योंकि सरस्वती की सुन्दर वाणी रूपी अमृत का पान कर्ण ही करते हैं, यदि जिह्वा पान करती होतो तो जिह्वा वाणी द्वारा अनुज्ञा प्रकट करती, परन्तु यहां कान पान करते हैं, इसलिये जिह्वा मौन है और कान बोल नहीं सकते, इसलिये कानों के बदले कानों के कुण्डल बज बज कर झणत्कार रूपी ॐ ॐ कहकह कर अनुज्ञा प्रकट कर रहे हैं। कुण्डलों की झंकार रूपी ॐकार की ध्वनि युक्त उद्गीथ उपासना का फल समृद्धि होना चाहिये, जैसा कि उपरोक्त छान्दोग्य श्रुति में कहा गया है, उस समृद्धि का वर्णन अगले श्लोक में है।
<u>नासिका ध्यान</u>
[ ६१ ]
असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि ( पटे )
त्वदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचितम् ।
वहन्नन्तर्मुक्ताः शिशिरतर निश्वास घटिताः ( गलिताः )
समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:— तुहिन=हिम. नेदीयस्=अति निकट शीघ्र, तुरन्त।
२६४ सौंदर्य लहरी
अर्थः— हे तुहिन गिरि अर्थात् हिमाचल के वंश की ध्वजा की पताके। तेरे नाक का यह बांस हमको शीघ्र उचित फल का देने वाला हो। अथवा उसपर हमारे लिये उचित फल लगें। क्योंकि उसके भीतर तेरे अति शीतल निश्वासों से मोती बन रहे हैं, और उनकी वांयें नथने में इतनी समृद्धि है कि एक मुक्तामणि बाहर भी दिखा रहा है। यहां नथ के मोती से अभिप्राय है जो बाँयें नाक में पहनी जाती है।
वंश द्व्यर्थवाचक शब्द है बांस और कुल। हिमाचल पर लगे हुए बांस पर ध्वजा फहराई जाय, तो उसकी पताका के सदृश भगवती की उपमा है, दूसरे अर्थ में भगवती को हिमालय के कुल की ध्वजपताका सदृश कहा गया है। बांस में फल नहीं लगते, परन्तु उसके अन्दर मोतियों की उत्पत्ति कही जाती है। ‘मुक्ता’ शब्द भी द्व्यर्थवाचक है, मोती को मुक्ता कहते हैं और जीवन मुक्त पुरुष भी मुक्त कहलाते हैं। बांस में मोती होते हैं और कुल में मुक्त पुरुष उत्पन्न होते हैं। शंकर भगवत्पाद प्रार्थना करते हैं के तेरी नासिका रूपी बांस में हमारे लिये उचित फल लगें और उनकी समृद्धि भी हो। परन्तु जैसे बांस में फल नहीं लगते, और उसके भीतर पोल में मोतियों का उत्पन्न होना सुना जाता है, उसी प्रकार भगवती की नासिका वत् श्रेष्ठ कुल में अर्थात् भगवती के उपासक संप्रदाय में मुक्त पुरुषों की उत्पत्ती होती है, जिसका उचित फल मुक्ति है। और भगवती के कर्ण फूलों (ताटंको) की झंकार रूपी प्रणवोपासना से उनकी समृद्धि होती है। फल का अर्थ
सौंदर्य लहरी २६५
कामना की पूर्ति के लिये किया जाता है। शंकर भगवत्पाद एक संन्यासी होने के नाते त्यक्त काम थे, जो दारैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा सब ही इच्छाओं से विनिर्मुक्त थे, उन को उचित फल की इच्छा परोपकारार्थ और संसारी जीवों की मुमुक्षा के अतिरिक्त क्या हो सकती थी। अपिच वे स्वयं नासिका के बाहर लगे हुए नथ के मोती के सदृश स्वयं एक मुक्त पुरुष थे, इस लिये उनकी प्रार्थना का भाव यह ही था, कि भगवती की उपासक परंपरा में सदा जीवन्मुक्तों की समृद्धि होती रहे।
हिमगिरी कन्या का निश्वास भी हिमवत् शीतल होना चाहिये, जिस के स्पर्श से तुरन्त ओसकण जमकर मुक्तामणियों के सदृश जमजाते हैं। तद्वत् मानो चन्द्र अथवा ईडा नाडी के वाम नासापुट से जिस पर नथ पहिनी जाती है, टपकने वाले जल कण जमकर मोती बन गए हैं, जो नथ पर दृष्टिगोचर होरहे हैं, यद्यपि नासा वंश में निहित न जाने कितने मुक्ता होसकते हैं। शीतल निश्वास से परम शान्ति का भी अभिप्राय है, जिसके स्पर्श मात्र से मनुष्य जीवन मुक्त हो जाता है।
कर्ण फूलों की प्रणव रूपी झंकार से अन्तर्नाद का भी अभिप्राय होसकता है, जो सरस्वती के शिवस्तवन की एक प्रति ध्वनि कही जा सकती है।
हिन्दी की एक उक्ति है कि केला बिच्छु बांस अपने फले नाश, अर्थात् केला बिच्छु और बांस को फल लगने से वे नष्ट होजाते हैं। इसलिये भगवती के नासावंश में फल न लगाकर,
२६६ सौंदर्य लहरी
उसके भीतर मोतियों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है, जिन की सदा समृद्धि होती रहती है और वह वंश अनादि अनन्त नित्य परंपरा वाला है।
भीतर से बाहर निकलने वाला श्वास निश्वास कहलाता है, और वह उष्ण होता है। यदि किसी मनुष्य का निश्वास शीतल चलने लगे, तो वह उसकी निकटस्थ मृत्यु का अरिष्टसूचक होता है। यहां भगवती का निश्वास शिशिरतर कहागया है, भगवती के परम शान्तिमय अन्तर्हृदय का यह पराक्रम है, जिस से मृत्यु को भी भय लगता है, और उसके परम शान्तिप्रद निश्वास के स्पर्श मात्र से उपासक शीघ्र जीवन मुक्ति का परमानन्द प्राप्त कर लेते हैं।
नासावंशः का अर्थ नासोपम वंशः भी किया जासकता है। किसी मनुष्य की यशः श्लाघा करते समय कहा करते हैं कि वह मनुष्य तो अपने कुल, जाति, वंश अथवा देश की नाक है, इसी प्रकार भगवती के उपासकों का वंश प्रकृति देवी की नाक है, ऐसा कहने से भगवती के उपासकों की सर्वोपरि गणना समझी जानी चाहिये जिन की वंशावलि में जीवन मुक्त महान पुरुषों की सदा समृद्धि होती रहती है। जिन में से कोई कोई प्रकाशित भी होजाते हैं, परन्तु गुप्त रूप से रहने वाले अनेक सन्तों के अस्तित्व की वे साक्षि देते रहते हैं। हिमगिरी के हिम शिखरों का शीतल शान्ति प्रद पवन ही मानो भगवती का कल्याणमय निश्वास है, जो श्रेय के जिज्ञासुओं को उत्तरोत्तर आवाहन करता रहता है।
सौंदर्य लहरी २६९
ओष्ठों का ध्यान:—
( ६२ )
प्रकृत्याऽऽरक्तायास्तव सुदति दन्तच्छदरुचेः
प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता ।
न बिम्बं तद्विम्बप्रतिफलनरागादरुणितं
तुलामध्यारोढुं कथमिव न लज्जेत कलया ॥
अर्थ:— हे सुन्दर दांतों वाली भगवति ! स्वाभाविक लाल-रंग के तेरे होठों की शोभा का सादृश्य करने वाले पदार्थों के नाम कहता हूं। मूंगे की लता में यदि फल आजायं, (तो उतने सुन्दर कहे जा सके हैं), परन्तु विंव फल तो नहीं, क्योंकि उनकी अरुणिमा तो तेरे बिम्ब की प्रतिबिंवित् अरुणिमा की झलक सदृश है, यदि उनमें किसी प्रकार तेरे होठों की तुलना भी की जाय, तो वे तेरे होठों की सुन्दरता की एक कला के बराबर भी सुन्दर न उतरने से क्या लज्जित नहीं होते ?
प्रवाल लता में फल नहीं लगते, क्योंकि वे जड होती हैं। परन्तु यदि उनमें फल लगने लगें, तो संभव है कि भगवती के होठों की उनसे उपमा दी जा सके। और बिंब फल की अरुणिमा तो सामान्य अरुणिमा है, और उसे प्रकृति देवी की आंशिकदेन ही समझना चाहिये, मानो असली रंग की छाया मात्र है। बिंब फलों
२६८ सौन्दर्य लहरी
से कविजन सामान्य स्त्रियों के होठों की उपमा दिया करते हैं परन्तु भगवती के होठों से उनकी उपमा देना उचित नहीं है, क्योंकि उनका सौंदर्य अनुपम है ।
<u>मुस्कान का ध्यान:—</u>
( ६३ )
स्मितज्योत्स्नाजालं तव वदनचन्द्रस्य पिवतां
चकोराणामासीदतिरसतया चञ्चुजडिमा ।
अतस्ते शीतांशोरमृतलहरीमाम्लरुचयः
पिवन्ति स्वच्छन्दं निशिनिशि भृशं काञ्जिकधिया ॥
अर्थ:— तेरे चन्द्रवदन की मुस्कान रूपी ज्योत्स्ना (चांदनी) की प्रचुरता को पीकर, अति मधुर होने के कारण चकोरों की चंचु अति रसास्वाद से जड हो गई है अर्थात् हट गई है । इसलिये वे खट्टे रस के इच्छुक चन्द्रमा के अमृत की लहरी को कांजी सदृश समझ कर प्रतिरात्रि खूब स्वच्छन्द पीते रहते हैं ।
अर्थात् चांद की चांदनी प्रकृति की मुस्कराहट की मधुरता के सामने कांजीवत् खट्टी है ।
सौंदर्य लहरी २६२
जिह्वा का ध्यानः—
( ६४ )
अविश्रान्तं पत्युर्गुणगणकथाऽऽम्रेडनजपा
जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा ।
यदग्रासीनायाः स्फटिकदृषदच्छच्छविमयी
सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्यवपुषा ॥
कठिन शब्दः- आम्रेडन=बारंबार, दृषद=पत्थर, अच्छत=स्वच्छ ।
अर्थः— हे जननि ! बिना थके पति के गुणानुवाद का बारंबार जप करने वाली, तेरी जवाकुसुम की द्युति सदृश लाल जिह्वा की जय है । जिसके अग्र भाग पर आसीन स्फटिक पत्थर की जैसी शुद्ध कांतिमयी सरस्वती की मूर्ति के शरीर का वर्ण माणिक्य सदृश परिणत हो गया है ।
स्फटिक का धर्म है कि उसपर निकटस्थ पदार्थ का रंग झलकने लगता है अर्थात वह स्वयं उसके रंग में रंग जाता है । सरस्वती का निवास जिह्वा के अग्र भाग पर होता है, और उसका वर्ण स्फटिक वत् स्वच्छ होता है, परन्तु जिह्वा के रंग से लाल दिखने लगता है ।
२७० | सौंदर्य लहरी
( ६५ )
रणे जित्वा दैत्यानपहृतशिरस्त्रैः कवचिभि—
निवृत्तैश्चण्डांशत्रिपुरहरनिर्माल्यविमुखैः ।
विशाखेन्द्रोपेन्द्रैः शशिविशदकर्पूरशकला
विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूलकवलाः ॥
कठिन शब्द:— शिरस्त्र=शिर कवच, विशाख=षडानन
अर्थ:-- हे मां ! दैत्यों को रण में जीतकर अपहृत शिरस्त्र और कवचों को उतारकर, शिवजी के निर्माल्य से विमुख जो चंड का भाग होता है, स्कन्द, इन्द्र और उपेन्द्र तीनों तेरे मुख के पान के ग्रास को, जिसमें चन्द्रमा जैसे स्वच्छ कपूर के टुकडे पडे हैं, ग्रहण करते हैं ।
जैसे मां अपने छोटे २ बालकों को अपने मुख से निकालकर बडे प्रेम से आधे चबे पान के टुकडे खिलाया करती है, वैसे ही भगवती स्कन्द, इन्द्र और उपेन्द्र को, जो उसके बालक हैं, दैत्यों पर जय प्राप्त करने पर प्रसन्न होकर पुरस्कार स्वरूप अपने मुख से निकालकर तांबूल के टुकडे खिलाती है । चण्ड शंकर के एक गण का नाम है, उसका स्थान नन्दी के दक्षिण हाथ की ओर उसके और जलहरी के बीच में होता है । शंकर का निर्माल्य चंड का ही भाग होता है, दूसरा उसे ग्रहण नहीं कर सकता । इसलिये चण्ड के पास खडे होकर शंकर की पूजा नहीं की जाती, वह सब निष्फल
सौन्दर्य लहरी २७१
होती है। स्कन्द इन्द्र और उपेन्द्र तीनों, दैत्यों को हराकर जब शंकर के पास गये तो वहां पर कोई पुरस्कार नहीं मिल सका क्योंकि उनका निर्माल्य का अधिकारी चण्ड होता है इसलिये वे भगवती के पास गये; और मां का सब से ऊंचा पुरस्कार उसका वात्सल्य प्रेम प्रकट करने में ही होता है।
वाणी की प्रशंसा:—
( ६६ )
विपञ्च्या गायन्ती विविधमपदानं पशुपते-
स्त्वयाऽऽरब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने ।
तदीयैर्माधुर्यैरपलपिततन्त्रीकलरवां
निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥
कठिन शब्द:— विपञ्ची=वीणा, अपदान=भूले हुए लोकोपकार
अर्थ:-- पशुपति के विविध अपदानों को वीणा पर गाते समय, तेरे शिर हिलाकर सरस्वती की श्लाघा के वचन कहना आरंभ करने पर, जो अपनी मधुरता से वीणा के कलरव को फीका करते हैं, सरस्वती अपने वीणा को कपडे में लपेट कर रख देती है ।
अर्थात् भगवती की वाणी के माधुर्य के सामने सरस्वती के वीणा के सुर भी फीके पड जाते हैं।
२७२ सौंदर्य लहरी
चिबुक का ध्यानः—
( ६७ )
कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया
गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया ।
करग्राह्यं शंभोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते
कथंकारं ब्रूमस्तव चिबुकमौपम्यरहितम् ॥
अर्थः-- हे गिरीसुते ! उपमारहित तेरी चिबुक ( ठोडी ) का वर्णन हम कैसे करें ? जिसे हिमाचल ने अर्थात तेरे पिता ने वात्सल्य प्रेम से अपनी अंगुलियों से स्पर्श किया है, और गिरीश ने अधरपान करने की आकुलता से बार २ उठाया है, और जो उस समय ऐसी प्रतीत होती है मानों वह शंभु के हाथ में मुख देखने के लिये उठाए हुए दर्पण का दस्ता हो ।
प्रकृति का मुख दर्पण सदृश है, जिसमें शंकर का मुख प्रतिभासित हो रहा है। यह भाव बिहारी सतसई में इस प्रकार दिखाया गया है।
मैं समझो निर्धार यह जग कांचों कांचसो ।
एक ही रूप अपार प्रतिबिंबित लखियत जगत ॥
सौन्दर्य लहरी २७३
( ६८ )
ग्रीवा का ध्यान
भुजाश्लेषान्नित्य पुरदमयितुः कण्टकवती
तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम् ।
स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना
मृणालीलालित्यं वहति यदधो हारलतिका ॥
कठिन शब्द— कालागरु=अगर, एक सुगंधित द्रव्य, जम्बाल=कीचड, लेप ।
अर्थ — तेरी ग्रीवा जो पुरारि की भुजा के नित्य स्पर्श से खरदरी हो रही है, तेरे मुखकमल को धारण करती हुई कमलनाल ( मृणाली ) जैसी सुन्दर लगती है, जो स्वतः तो गौर वर्ण है परन्तु अधिक समय तक अगरु के गाढे लेप से कीचड में सनी हुई सी मलीन दिखती है, और जिसके नीचे हार पहना हुआ है ।
गले का ध्यान
( ६९ )
गले रेखास्तिस्रो गतिगमकगीतैकनिपुणे
विवाहव्यानद्धप्रगुणगुणसंख्याप्रतिभुवः ।
विराजन्ते नानाविधमधुररागाकरभुवां
त्रयाणां ग्रामाणां स्थितिनियमसीमान इव ते ॥
अर्थ:— हे गति, गमक और गीत में निपुणे ! तेरे गले में पडी हुई तीन रेखायें जो विवाह के समय बांधी गई तीन
२७४ सौंदर्य लहरी
सौभाग्यसूत्रों की लड़ियों से पड़ गई हैं, ऐसी प्रतीत हो रही हैं मानो वे नानाविध मधुर राग रागिनियों के तीनों ग्रामों पर गाने से उनके स्थिति नियम की सीमा के चिन्ह हों।
गान विद्या के अनुसार प्रत्येक राग में गति, गमक और गीत तीन अंग होते हैं। गतिचाल को कहते है, गमक सुरों के आरोह अवरोह को कहते हैं और गीत तीनों सप्तकों के सुरों के क्रम को कहते हैं। संगीत तीन ग्रामों वाला होता है, उनके नाम षडज, मध्यम और गांधार ग्राम हैं। जिस ग्राम पर कोई राग गाया जाता है, उसका आरम्भ और अन्त उस ही ग्राम के सुर से होता है। अर्थात् षडज ग्राम पर गाने वाला अपने राग का आरम्भ षडज से करेगा और षडज पर ही समाप्त करेगा, इसी तरह मध्यम और गांधार ग्रामों पर गाने वाले के राग मध्यम अथवा गांधार सुर से ही उठाये जाकर उस ही सुर पर समाप्त किये जायेंगे। प्रचलित पद्धति में केवल षडज ग्राम पर ही सब गाने गाये जाते हैं, और अन्य दो ग्रामों का प्रचलन नहीं रहा। इसलिये उनका संगीत शास्त्र में उल्लेख मात्र मिलता है। प्राचीन काल में उनका प्रचलन होगा। भगवती तीनों ग्रामों पर गा सकती है, इसलिये उनके गले की तीन रेखाएँ ऐसी प्रतीत होती हैं, मानों प्रत्येक ग्राम पर गाने से उनके सुरों की पृथक २ सीमा बन गई है।
सौंदर्य लहरी
चारों भुजाओं का ध्यान
( ७० )
मृणालो मृद्वीनां तव भुजलतानांच तसृणां
चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः ।
नखेभ्यः संत्रस्यन्प्रथममथनादन्धकरिपो-
श्चतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया ॥
कठिन शब्द—अन्धकरिपु=शिवजी ।
अर्थ—शिवजी के नखों के द्वारा पहिले पुराकाल में कभी (पांचवां शिर) मथन किया जाने की स्मृति से संत्रस्त होकर, चारों शिरों की एक समान रक्षा के लिये, तेरे अभयदान देने वाले हाथ की शरण में समर्पण बुद्धि रखकर, मृणाली सदृश कोमल तेरी चारों लता जैसी भुजाओं के सौंदर्य की, ब्रह्मा चारों मुखों से स्तुति किया करते हैं ।
पौराणिक एक गाथा के अनुसार ब्रह्मा के भी ५ शिर थे, जिससे उन्हें बडा अभिमान था, इसलिये शिवजी ने रुष्ट होकर उनका एक शिर अपने नखों से तोड डाला था । उस समय की स्मृति से वे सदा भगवती के चारों हाथों की चारों मुखों से स्तुति किया करते हैं । इस आख्यायिका का अभिप्राय यह प्रतीत होता
२७६ सौंदर्य लहरी
है कि ब्रह्मा के चारों मुख चार वेदों से प्रकृति के हाथों की कृति का व्याख्यान करते हैं। ब्रह्मा को सृष्टि बनाने का जब अहंकार उत्पन्न हुआ तो उनका अहंकार शिवजी ने तोड दिया। वह अहंकार ही पांचवा शिर था।
हाथों का ध्यानः—
(७१)
नखानामुद्योतैर्नवनलिनरागं विहसतां
कराणां ते कान्ति कथय कथयामः कथमुमे ।
कयाचिद्वा साम्यं भवतु कलया हन्त कमलं
यदि क्रीडल्लक्ष्मी चरणतल लाक्षाऽरुण दलम् ॥
अर्थः— हे उमे ! तेरे हाथों की कांति का कहो कैसे वर्णन करूं, जिनके नखों की द्युति नवविकसित कमल की अरुणिमा का परिहास करती है। यदि किसी अंश में किसी प्रकार कमल के दलों की अरुणिमा से सामान्यता की जाय, तो अरे ! वह तो लक्ष्मी के क्रीडा करते समय चरणों में लगी लाक्षा के कारण है।
अर्थात् कमलों की अरुणिमा उनकी स्वाभाविक नहीं है, लक्ष्मी के चरणों में लगी लाख के कारण है, परन्तु भगवती के नखों की अरुणिमा स्वाभाविक है।
सौंदर्य लहरी २७७
दोनों स्तनों का ध्यान:—
( ७२ )
समं देवि स्कन्दद्विपवदनपीतं स्तनयुगं
तवेदं नः खेदं हरतु सततं प्रस्रुतमुखम् ।
यदालोक्याशंकाऽऽकुलितहृदयो हासजनकः
स्वकुम्भौ हेरम्बः परिमृशति हस्तेन झटिति ॥
कठिन शब्द:— द्विप=हाथी, हेरम्ब=गणेशजी
अर्थ: — हे देवि ! स्कन्द और गणेशजी के पान किये हुए तेरे दोनों स्तन, जिनके मुख से दूध टपक रहा है, सदा हमारे खेद का हरण करें पीते समय जिन स्तनों को देखकर गणेशजी शंका से आकुलित हृदय होकर झट अपने ही सिर के कुंभवत् भागों को टटोलकर हास्यजनक चेष्टा करते हैं ।
अर्थात् गणेशजी को अपने शिर के कुंभ सदृश उभरे हुए मस्तक और मां के स्तनों में भेद न दिखने के कारण शंका हो जाने से वे तुरन्त अपने सिर को टटोलने लगे । बालक दूध पीते समय माता के स्तनों को हाथ में थामकर दूध पीया करता है, परन्तु गणेशजी गलती से अपने ही सिर को पकडने लगे, जिसको देखकर मां हंस पडी ।
२७८ सौंदर्य लहरी
( ७३ )
अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ (कलशौ)
न संदेहस्पन्दं नगपतिपताके मनसि नः ।
पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसंगमरसौ
कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौञ्चदलनौ ॥
कठिन शब्दः—वक्षोज=स्तन, कुतुप=कुप्पा, नग=पर्वत, द्विरद=हाथी
अर्थः —हे हिमाचल पर्वतराज की पताका सदृश्य पुत्रि ! अमृत रस से भरे माणिक्य के बने कुप्पों अथवा कलशों के सदृश तेरे स्तनों को देखकर हमारे मन में संदेह का स्पन्द भी नहीं होता ( जैसा कि स्त्रियों के स्तनों से होना संभव हैं ) क्योंकि ( उनका ऐसा प्रभाव है कि ) उनके दुग्ध पान करने से गणेशजी और स्कन्द दोनों आज भी कुमार ही हैं और उनको स्त्री संगम का रस विदित नहीं है ।
दोनों के पास पत्नियां होते हुए भी वे श्रृंगार रस से परिचित नहीं हैं, यह भगवती के स्तन पाने का फल है । गणेशजी के साथ ऋद्धि सिद्धि दोनों पत्नियों के समान हैं और देवताओं के सेनापति स्कन्द के पास देवताओं की सेना (देवसेना) रूपी पत्नि है । अर्थात् ऋद्धि सिद्धि और देवसेना स्त्रीवाचक शब्द मात्र हैं, और वे शक्तियां हैं न कि पत्नियां, परन्तु तो भी उनको ऋद्धि सिद्धियों
सौंदर्य लहरी २७९
से युक्त गणपति और देवताओं के सेनापति कहने से, उनमें पति पत्नि का दाम्पत्य संबंध होने की भ्रान्ति मात्र होती है। वास्तव में दोनों नित्य नैष्ठिक ब्रह्मचारी ही हैं !
(७४)
वहत्यम्ब स्तम्बेरमदनुजकुम्भप्रकृतिभिः
समारब्धां मुक्तामणिभिरमलां हारलतिकाम् ।
कुचाभागो बिम्बाधररुचिभिरन्तः शबलितां
प्रतापव्यामिश्रां पुरदमयितुः कीर्तिमिव ते ॥
कठिन शब्दः—स्तम्बेरम=हाथी, दनुज=असुर, पुरदमयिता=पुरारि, शिवजी !
अर्थः—हे मां ! तेरा कुचभाग (छाती का भाग) जो गजासुर के मस्तक रूपी कुंभ से निकली हुई मुक्तामणियों की विमल माला पहने हुए है, उसपर तेरे बिंबसदृश लाल होठों की कान्ति पडने से अरुण छाया दिखती है, इसलिये वह हार शिवजी की प्रताप-मिश्रित-कीर्ति का प्रतीकवत् है ।
हाथी के मस्तक से गजमुक्ता का निकलना प्रसिद्ध है। इसलिये जो मुक्तामणियां गजासुर के मारे जाने पर शिवजी को मिली थीं, उनकी माला भगवती ने छाती पर पहिनी हुई है। और उनपर भगवती के होठों का लाल रंग चढा हुआ है, अर्थात् वे मणियां होठों की अरुण कान्ति की छाया से लाल दिखने लगी हैं।