सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 323, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौन्दर्य लहरी २७३
( ६८ )
ग्रीवा का ध्यान
भुजाश्लेषान्नित्य पुरदमयितुः कण्टकवती
तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम् ।
स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना
मृणालीलालित्यं वहति यदधो हारलतिका ॥
कठिन शब्द— कालागरु=अगर, एक सुगंधित द्रव्य, जम्बाल=कीचड, लेप ।
अर्थ — तेरी ग्रीवा जो पुरारि की भुजा के नित्य स्पर्श से खरदरी हो रही है, तेरे मुखकमल को धारण करती हुई कमलनाल ( मृणाली ) जैसी सुन्दर लगती है, जो स्वतः तो गौर वर्ण है परन्तु अधिक समय तक अगरु के गाढे लेप से कीचड में सनी हुई सी मलीन दिखती है, और जिसके नीचे हार पहना हुआ है ।
गले का ध्यान
( ६९ )
गले रेखास्तिस्रो गतिगमकगीतैकनिपुणे
विवाहव्यानद्धप्रगुणगुणसंख्याप्रतिभुवः ।
विराजन्ते नानाविधमधुररागाकरभुवां
त्रयाणां ग्रामाणां स्थितिनियमसीमान इव ते ॥
अर्थ:— हे गति, गमक और गीत में निपुणे ! तेरे गले में पडी हुई तीन रेखायें जो विवाह के समय बांधी गई तीन