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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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२७४ सौंदर्य लहरी

सौभाग्यसूत्रों की लड़ियों से पड़ गई हैं, ऐसी प्रतीत हो रही हैं मानो वे नानाविध मधुर राग रागिनियों के तीनों ग्रामों पर गाने से उनके स्थिति नियम की सीमा के चिन्ह हों।

गान विद्या के अनुसार प्रत्येक राग में गति, गमक और गीत तीन अंग होते हैं। गतिचाल को कहते है, गमक सुरों के आरोह अवरोह को कहते हैं और गीत तीनों सप्तकों के सुरों के क्रम को कहते हैं। संगीत तीन ग्रामों वाला होता है, उनके नाम षडज, मध्यम और गांधार ग्राम हैं। जिस ग्राम पर कोई राग गाया जाता है, उसका आरम्भ और अन्त उस ही ग्राम के सुर से होता है। अर्थात् षडज ग्राम पर गाने वाला अपने राग का आरम्भ षडज से करेगा और षडज पर ही समाप्त करेगा, इसी तरह मध्यम और गांधार ग्रामों पर गाने वाले के राग मध्यम अथवा गांधार सुर से ही उठाये जाकर उस ही सुर पर समाप्त किये जायेंगे। प्रचलित पद्धति में केवल षडज ग्राम पर ही सब गाने गाये जाते हैं, और अन्य दो ग्रामों का प्रचलन नहीं रहा। इसलिये उनका संगीत शास्त्र में उल्लेख मात्र मिलता है। प्राचीन काल में उनका प्रचलन होगा। भगवती तीनों ग्रामों पर गा सकती है, इसलिये उनके गले की तीन रेखाएँ ऐसी प्रतीत होती हैं, मानों प्रत्येक ग्राम पर गाने से उनके सुरों की पृथक २ सीमा बन गई है।