भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 325

सौंदर्य लहरी


चारों भुजाओं का ध्यान

( ७० )

मृणालो मृद्वीनां तव भुजलतानांच तसृणां
चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः ।
नखेभ्यः संत्रस्यन्प्रथममथनादन्धकरिपो-
श्चतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया ॥

कठिन शब्द—अन्धकरिपु=शिवजी ।

अर्थ—शिवजी के नखों के द्वारा पहिले पुराकाल में कभी (पांचवां शिर) मथन किया जाने की स्मृति से संत्रस्त होकर, चारों शिरों की एक समान रक्षा के लिये, तेरे अभयदान देने वाले हाथ की शरण में समर्पण बुद्धि रखकर, मृणाली सदृश कोमल तेरी चारों लता जैसी भुजाओं के सौंदर्य की, ब्रह्मा चारों मुखों से स्तुति किया करते हैं ।

पौराणिक एक गाथा के अनुसार ब्रह्मा के भी ५ शिर थे, जिससे उन्हें बडा अभिमान था, इसलिये शिवजी ने रुष्ट होकर उनका एक शिर अपने नखों से तोड डाला था । उस समय की स्मृति से वे सदा भगवती के चारों हाथों की चारों मुखों से स्तुति किया करते हैं । इस आख्यायिका का अभिप्राय यह प्रतीत होता