सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौन्दर्य लहरी २७१
होती है। स्कन्द इन्द्र और उपेन्द्र तीनों, दैत्यों को हराकर जब शंकर के पास गये तो वहां पर कोई पुरस्कार नहीं मिल सका क्योंकि उनका निर्माल्य का अधिकारी चण्ड होता है इसलिये वे भगवती के पास गये; और मां का सब से ऊंचा पुरस्कार उसका वात्सल्य प्रेम प्रकट करने में ही होता है।
वाणी की प्रशंसा:—
( ६६ )
विपञ्च्या गायन्ती विविधमपदानं पशुपते-
स्त्वयाऽऽरब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने ।
तदीयैर्माधुर्यैरपलपिततन्त्रीकलरवां
निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥
कठिन शब्द:— विपञ्ची=वीणा, अपदान=भूले हुए लोकोपकार
अर्थ:-- पशुपति के विविध अपदानों को वीणा पर गाते समय, तेरे शिर हिलाकर सरस्वती की श्लाघा के वचन कहना आरंभ करने पर, जो अपनी मधुरता से वीणा के कलरव को फीका करते हैं, सरस्वती अपने वीणा को कपडे में लपेट कर रख देती है ।
अर्थात् भगवती की वाणी के माधुर्य के सामने सरस्वती के वीणा के सुर भी फीके पड जाते हैं।