भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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२७० | सौंदर्य लहरी


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रणे जित्वा दैत्यानपहृतशिरस्त्रैः कवचिभि—
निवृत्तैश्चण्डांशत्रिपुरहरनिर्माल्यविमुखैः ।
विशाखेन्द्रोपेन्द्रैः शशिविशदकर्पूरशकला
विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूलकवलाः ॥

कठिन शब्द:— शिरस्त्र=शिर कवच, विशाख=षडानन

अर्थ:-- हे मां ! दैत्यों को रण में जीतकर अपहृत शिरस्त्र और कवचों को उतारकर, शिवजी के निर्माल्य से विमुख जो चंड का भाग होता है, स्कन्द, इन्द्र और उपेन्द्र तीनों तेरे मुख के पान के ग्रास को, जिसमें चन्द्रमा जैसे स्वच्छ कपूर के टुकडे पडे हैं, ग्रहण करते हैं ।

जैसे मां अपने छोटे २ बालकों को अपने मुख से निकालकर बडे प्रेम से आधे चबे पान के टुकडे खिलाया करती है, वैसे ही भगवती स्कन्द, इन्द्र और उपेन्द्र को, जो उसके बालक हैं, दैत्यों पर जय प्राप्त करने पर प्रसन्न होकर पुरस्कार स्वरूप अपने मुख से निकालकर तांबूल के टुकडे खिलाती है । चण्ड शंकर के एक गण का नाम है, उसका स्थान नन्दी के दक्षिण हाथ की ओर उसके और जलहरी के बीच में होता है । शंकर का निर्माल्य चंड का ही भाग होता है, दूसरा उसे ग्रहण नहीं कर सकता । इसलिये चण्ड के पास खडे होकर शंकर की पूजा नहीं की जाती, वह सब निष्फल