भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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२७८ सौंदर्य लहरी


( ७३ )

अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ (कलशौ)
न संदेहस्पन्दं नगपतिपताके मनसि नः ।
पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसंगमरसौ
कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौञ्चदलनौ ॥

कठिन शब्दः—वक्षोज=स्तन, कुतुप=कुप्पा, नग=पर्वत, द्विरद=हाथी

अर्थः —हे हिमाचल पर्वतराज की पताका सदृश्य पुत्रि ! अमृत रस से भरे माणिक्य के बने कुप्पों अथवा कलशों के सदृश तेरे स्तनों को देखकर हमारे मन में संदेह का स्पन्द भी नहीं होता ( जैसा कि स्त्रियों के स्तनों से होना संभव हैं ) क्योंकि ( उनका ऐसा प्रभाव है कि ) उनके दुग्ध पान करने से गणेशजी और स्कन्द दोनों आज भी कुमार ही हैं और उनको स्त्री संगम का रस विदित नहीं है ।

दोनों के पास पत्नियां होते हुए भी वे श्रृंगार रस से परिचित नहीं हैं, यह भगवती के स्तन पाने का फल है । गणेशजी के साथ ऋद्धि सिद्धि दोनों पत्नियों के समान हैं और देवताओं के सेनापति स्कन्द के पास देवताओं की सेना (देवसेना) रूपी पत्नि है । अर्थात् ऋद्धि सिद्धि और देवसेना स्त्रीवाचक शब्द मात्र हैं, और वे शक्तियां हैं न कि पत्नियां, परन्तु तो भी उनको ऋद्धि सिद्धियों