भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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२५२ सौंदर्य लहरी


भोगों को देती है, इसलिये भोगवतिका है। सबकी रक्षा करती है, इसलिये अवन्तिका है। और तेरे पराक्रम को कोई नहीं पा सकता, इसलिये विजया है। उक्त आठ प्रकार के भाव युक्त भगवती की दृष्टि है, पंडित सुब्रह्मण्य शास्त्री और श्री निवास अयंगर की अंग्रेजी पुस्तक में इन दृष्टियों के स्वरूप इस प्रकार बताये गये हैं। अन्तर्विकसित दृष्टि विशाला कहलाती है, आश्चर्ययुक्त दृष्टि कल्याणी है, जिसमें पुतलियां फैल जायें वह अयोध्या, आलस्य युक्त दृष्टि धारा, नेत्रों के किंचित् चक्कर खाने पर मधुरा, मैत्री के भावयुक्त भोगवती, निष्पाप दृष्टि जिसमें भोलापन टपक अवन्ती, और तिरछी निगाह विजया कहलाती है। इन दृष्टियों का प्रभाव क्रमशः उच्चाटन, आकर्षण, द्रवीकरण, संमोहन, वशीकरण, ताडन, विद्रावण और मारण है।

उक्त आठों भाव अग्नि में पाये जाते हैं, इसलिये यह दृष्टि तीसरे नेत्र से विशेषेण संबंधित है।

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कवीनां संदर्भस्तवकमकरन्दैकरसिकं
कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौ कर्णयुगलम् ।
अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला-
वसूयासंसर्गादलिकनयनं किञ्चिदरुणम् ॥

कठिन शब्दों का अर्थ:—संदर्भ=कविता; अलिकनयनं=माथे का तीसरा नयन; अलिक=ललाट ।