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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 415 में से

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पृष्ठ 330
२८०सौंदर्य लहरी

इस प्रकार हार में दोनों का मिश्रण हो रहा है। कविलोग प्रताप को लालरंग से और कीर्ति को स्वच्छरंग से उपमित किया करते हैं। यहां मणियां स्वच्छ होने के कारण कीर्ति की प्रतीक हैं और उनपर चमकने वाला लालरंग प्रताप का प्रतीक है। यहां गजासुर का वध रूपी प्रताप शंकर की शक्ति का प्रताप है और मणियां उस प्रताप की कीर्ति के चिन्ह हैं। भगवती स्वयं शंकर की शक्ति है। श्लोक का अन्तिम पद 'ते' 'कुचाभागो' पद के लिये सर्वनाम है, प्रथम पंक्ति में क्रियापद 'वहति' को 'कीर्तिमिवहारलतिकां वहति' इस क्रम से पढना चाहिये, 'कुचाभागो' 'वहति' का कर्ता है।

( ७५ )

तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः
पयः पारावारः परिवहति सारस्वतमिव ।
दयावत्यादत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत्
कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता ॥

**अर्थः—**हे धरणिधर कन्ये ! मैं ऐसा समझता हूं कि तेरे स्तनों के दूध का पारावार तेरे हृदय से बहने वाला सारस्वतं ज्ञान सदृश है। जिसे पीकर, दयावती होकर तेरे स्तनपान कराने पर द्रविडशिशु ने प्रौढकवियों के सदृश कमनीय कविता की रचना की थी।

द्रविडशिशु कौन था, जिसका संकेत इस श्लोक में है, इसपर विद्वानों का मतभेद है। कुछ विद्वानों का मत है कि शंकर भगवत्पाद ने यहां अपने लिये ही संकेत किया है।