सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २८६ | सौंदर्य लहरी |
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( १ ) गंगा का स्थिर भंवर, ( २ ) तेरे स्तन रूपी विकसित पुष्पों को धारण करने वाली रोमावलि रूपी लता के उगने का गमला, ( ३ ) काम देव के तेज रूपी अग्नि को धारण करने वाला हवन कुंड, ( ४ ) रति का क्रीडा स्थल, अथवा ( ५ ) गिरीश शंकर के नयनों को सिद्धि प्राप्त करने के लिये तप करने की गुफ़ा का द्वार ।
( ७९ )
निसर्गक्षीणस्य स्तनतटभरेण क्लमजुषो
नमन्मूर्तेर्नाभौश्चव लघु च शनैस्त्रुट्यत इव ।
चिरंते मध्यस्य त्रुटिततटिनीतीगतरुणा
समावस्थास्थेम्नो भवतु कुशलं शैलतनये ॥
पाठान्तर— नारीतिलकशनकै स्त्रुट्यत इव ।
तिलक=तिलक और एक वृक्ष विशेष का नाम । शनकैः=शनै;
अर्थ:— हे शैल तनये ! तेरे मध्य भाग की सम अवस्था चिर कुशल रहे, जो स्वाभाविक ही क्षीण है और स्तन रूपी तट के भार से क्लान्त होने के कारण झुकी हुई तेरी मूर्ति के नाभि देश पर पडने वाली वलियों पर शनैः २ नदी के तट के वृक्ष के सदृश टूटता सा प्रतीत होता है ।
यहां कटि का बहुत पतला होना और स्तनों का भारी होना दिखा गया है । ये दोनों स्त्रियों के सौन्दर्य के चिन्ह हैं ।