भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 337

सौंदर्य लहरी २८७


( ८० )

कुचौ सद्यः स्विद्यत्तट घटित कूर्पासभिदुरौ
कपन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयतः ।
तव त्रातुं भङ्गादलमिति वलग्नं तनुभुवा
त्रिधानद्धं देवि त्रिवलिलवल्लीवल्लिभिरिव ॥

कठिन शब्द:— कूर्पास=अंगिया, चोली। दोर्मूल=कांख, बगल,
बलग्नं=जुडासा जोड, तनुभू=काम देव ।

हे देवि ! कांखों की रगड से झट २ पसीना आने के कारण जिनके किनारे पर से अंगिया फट गई है सुवर्ण कलश की आभा-युक्त तेरे कुच द्वय के हिलने से टूटने से बचाने के लिये अलम् अर्थात् पर्याप्त हैं इतना मात्र जुडा हुआ तेरा ( कटि प्रदेश ) मानो काम देव ने लवली वल्लि ( एक प्रकार की बेल ) से वलियों से तीन बार बांध रखा है ।

भाव यह है कि छाती का भाग भारी है और नीचे कटि प्रदेश इतना पतला है कि हिलने मात्र से टूट सकता है, परन्तु पेट की तीन बलियां ऐसी प्रतीत हो रही हैं मानो काम देव ने उसके सौन्दर्य की रक्षा करने के लिये लवली की बेल से तीन बार लपेट कर बांध रखा है । नहीं तो टूटने में कोई कसर नहीं जान पडती थी ।