सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
सौंदर्य लहरी २८७
( ८० )
कुचौ सद्यः स्विद्यत्तट घटित कूर्पासभिदुरौ
कपन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयतः ।
तव त्रातुं भङ्गादलमिति वलग्नं तनुभुवा
त्रिधानद्धं देवि त्रिवलिलवल्लीवल्लिभिरिव ॥
कठिन शब्द:— कूर्पास=अंगिया, चोली। दोर्मूल=कांख, बगल,
बलग्नं=जुडासा जोड, तनुभू=काम देव ।
हे देवि ! कांखों की रगड से झट २ पसीना आने के कारण जिनके किनारे पर से अंगिया फट गई है सुवर्ण कलश की आभा-युक्त तेरे कुच द्वय के हिलने से टूटने से बचाने के लिये अलम् अर्थात् पर्याप्त हैं इतना मात्र जुडा हुआ तेरा ( कटि प्रदेश ) मानो काम देव ने लवली वल्लि ( एक प्रकार की बेल ) से वलियों से तीन बार बांध रखा है ।
भाव यह है कि छाती का भाग भारी है और नीचे कटि प्रदेश इतना पतला है कि हिलने मात्र से टूट सकता है, परन्तु पेट की तीन बलियां ऐसी प्रतीत हो रही हैं मानो काम देव ने उसके सौन्दर्य की रक्षा करने के लिये लवली की बेल से तीन बार लपेट कर बांध रखा है । नहीं तो टूटने में कोई कसर नहीं जान पडती थी ।
२८८ | सौंदर्य लहरी
नितंब का ध्यान:—
( ८१ )
गुरुत्वं विस्तारं क्षितिधरपतिः पार्वति निजात्
नितम्बादाच्छिद्य त्वयि हरणरूपेण निदधे ।
अतस्ते विस्तीर्णो गुरुरयमशेषां वसुमतीं
नितम्बप्राग्भारः स्थगयति लघुत्वं नयति च ॥
कठिन शब्द:— हरणरुपेणं = दहेज,
अर्थ:— हे पार्वति ! पर्वतराज हिमालय ने अपने नितंबों से काटकर अपना भारीपन और विस्तार तुझको दहेज में दिये थे, इसीलिये तेरे नितंब इतने विस्तीर्ण और भारी हैं, कि तेरे नितंब के भार से सारी पृथिवी की गति रुक गई है और तेरे विस्तार की अपेक्षा से पृथिवी छोटी दिखने लगी है।
यदि पृथिवी को स्थिर मानें तो भगवती के उसपर बैठ जाने से उसकी गति रुक गई है और यदि उसे चल माने तो उसकी गति स्थगित होकर नियम बद्ध हो गई है । भाव यह हैं कि प्रकृति देवी ने पृथिवी को अपना आसन बना रखा है । और भूमि पर जो भी शोभा फैली हुई है, उसका सारा श्रेय पर्वतों को ही है, जिनकी देन रूपी स्रोत सारी पृथिवी को हरा भरा ही नहीं कर रहे, वरन् बडे २ देश उनके नितंबों से काटकर लाई हुई मिट्टी की ही कृपा है । अर्थात् भूमि की प्राकृतिक शोभा हिमाच्छादित पर्वतराज की ही तनुजा है।
सौंदर्य लहरी २८९
उरुयुग्मका ध्यानः—
( ८२ )
करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली-
मुभाभ्यामुरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवती ।
सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते
विजिग्ये जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमपि ॥
**कठिन शब्दः—**पटली=पटं विस्तारं त्याति आददाति,
**अर्थः—**हे गिरि सुते ! आप अपने दोनों उरुओं मे गजेन्द्रों के सूंडों को और सुवर्ण के बने हुए केले के लंबे स्तंभों को जीतकर, पति को प्रणाम करते २ कठिन हो गये हैं ऐसे दोनों सुन्दरगोल घुटनो से बुद्धिमान हाथीके दोनों (मस्तक के) कुंभों को भी पराजित कर रही हैं !
जंघाओं का ध्यानः—
( ८३ )
पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते
निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत ।
यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली-
नखाग्रच्छद्मानः सुरमुकुटशाणैकनिशिताः ॥
**कठिन शब्दः—**निषङ्ग=तरकस, विशिखः=शर, बाण; विषम विशिखः=कामदेव
२९० | सौंदर्य लहरी
**अर्थ:—**हे गिरि सुते ! तेरी दोनों पिंडलियां रुद्र को जीतने के लिये दुगुने बाणों से भरे कामदेव के दो तरकसों के समान हैं। जिनके अग्रफल पैरों की १० अंगुलियों के नखों के अग्र भाग के रूप में दस दिख रहे हैं, जो देवताओं के मुकुट रुपी सान पर पैनाए गये हैं।
भाव यह है कि कामदेव के तरकस में केवल ५ पुष्प बाण हैं, उनसे वह शंकर को नहीं जीत सका, इसलिये उसने भगवती के चरणों की अंगुलियों के नख रुपी फल वाले १० और बाण अपनी सहायता के लिये लेलिये हैं, जो दोनों पिंडलियों रुपी तरकसों में पांच २ रखे हैं। इन बाणों के फल वत् नखों के अग्रभाग देवताओं के प्रणाम करते २ उनके मुकुट रुपी सान पर घिसर कर पैने हो गये हैं।
कामदेव के ५ बाण शब्द स्पर्श रूप रस गंध ५ विषय हैं। भगवती के चरणों में ५ सामान्य और ५ दिव्य शब्द स्पर्श रूप रस गंध सहित १० बाण हैं। योगदर्शन में दिव्य विषयों का वर्णन (१-३५) सूत्र में मिलता है। ‘विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थिति निबंधिनी’। (१-३५) विषयों की दिव्य प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर मन की स्थिरता का उदय होता है। इसलिये भगवती के चरणों के नखों का ध्यान योगी को सामान्य और दिव्य भोग देकर चित्त को एकाग्रता प्रदान करता है। मानों कामदेव के ५ बाणों के स्थान पर भगवती के चरणों की शरण लेकर दस बाणों से शंकर को जीतना चाहता है, परन्तु मन की एकाग्रता हो जाने से मनुष्य स्वयं शिवस्वरूप हो जाता है।
सौंदर्य लहरी | २२१
इसलिये—
( ८४ )
श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया
ममाप्येतौ मात: शिरसि दयया धेहि चरणौ ।
ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी
ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूडामणिरुचिः ॥
कठिन शब्द— पाथ=जल, तटिनी=नदी, चूड़ा=केश, शेखर=चोटी, रुचि=कान्ति ।
अर्थ— हे मां ! तेरे चरण जो श्रुतियों की मूर्धा पर शिखरवत् रखे हैं, दया करके उनको मेरे शिर भी रख दे, जिनका चरणोदक शंकर की जटाजूट से निकली हुई गंगा है, और जिनके तलवों में लगी लाक्षा की कान्ति हरि के चूड़ा में (केशों में) धारण की हुई अरुण मणि की कान्ति के सदृश है ।
( ८५ )
नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो—
स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते ।
असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते
पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे ॥
कठिन शब्द— अलक्तक=लाक्षा, कङ्केलि=अशोक, असूयति=ईर्ष्या करते हैं ।
| २९२ | सौंदर्य लहरी |
|---|
**अर्थ—**हम तेरे इन दोनों चरणों को प्रणाम कहते हैं, जो नयनों को रमणीय हैं, और जिन पर लाक्षा की तीव्र कान्ति चमक रही है। जिनके अभिहनन की स्पृहा से पशुपति तेरे प्रमदावन के अशोक वृक्ष से अनन्य असूया रखते हैं।
ऐसा कहते हैं कि पद्मिनी स्त्री के पद प्रहार से अशोक वृक्ष प्रसन्न होता है। इस श्लोक में यह भाव है कि भगवती की वाटिका के अशोक वृक्ष को भगवती के पद प्रहार का सौभाग्य सदा प्राप्त है, इसलिये पशुपति उससे ईर्ष्या रखते हैं, क्योंकि उनको भी भगवती के चरण प्रहार की स्पृहा है। अशोक का अर्थ वीत शोक अथवा शोक रहित है। और पशुपति भी वीतशोक होने के कारण अशोक है। जीवों को पशु कहते हैं, क्योंकि वे संसार की आसक्ति स्वरूप राग पाश में बंधे हैं। शिव को इसी अभिप्राय से पशुपति कहा जाता है।
पाशबद्धस्तथा जीवः पाशमुक्तः सदाशिवः।
पाशबद्धः पशुप्रोक्तः पाशमुक्तः पशुपतिः ॥
प्रत्येक मनुष्य में जीव भाव और शिव भाव साथ २ रहते हैं। जैसा कि भगवान गीता में कहते हैं—
उपद्रष्टानुमन्ताच भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेतिचाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥
वेदानुवचन भी हैं 'द्वासुपर्णा सयुजा सखाया' 'असंगोयमात्मा' इत्यादि।
सौंदर्य लहरी २९३
इसलिये बद्धजीव का अन्तरात्मा रूपी शिव सदा असंग होने पर भी भगवती के पद प्रहार से अपने को शोक रहित अनुभव करने की सदा स्पृहा किया करता है ।
( ८६ )
मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं
ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते ।
चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता
तुलाकोटिक्वाणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा ॥
कठिन शब्द— मृषाकृत्वा=झूठा करके, गोत्र=वंश, पहाड, नाम, अथवा गां इन्द्रियं त्रायते इति गोत्र । स्खलन=गिरावट, फिसलना । वैलक्ष्य=लज्जा, स्वभाव का परिवर्तन, लक्ष्य से हटना । शल्यं=बाण, अन्तर्दाह । उन्मूलितवता=जड़ से उखाड़ता हुआ, सर्वथा नष्ट करता हुआ । तुलाकोटि=मंजीरा, नूपुर, तराजू के पल्ड़ों की आकृति वाला । क्वाणैंकिलिरतं=घंटियां, मंजीरों, अथवा नूपुरों के बजने का शब्द । ईशानरिपु=शिव का शत्रु, काम । भर्ता=पालने वाला, पति ।
**सामान्य अर्थ—**तेरे गोत्र का अपमान करने से लज्जित नीचे नेत्र किये हुए भर्त्तार के ललाट पर तेरे चरण कमलों का ताडन होने पर ईशानरिपु ( कामदेव ) ने जिसको चिरकाल से जलाया जाने के कारण अन्तर्दाह था उसे निकालते हुए अपना बदला देखकर, तेरे नूपुरों के बजने के क्वणत्कार की किल-किलाहट रूपी हर्ष ध्वनि की ।
२९४ सौंदर्य लहरी
पूर्व श्लोक में शिवजी को भगवती के चरणों के ताडन की स्पृहा दिखाकर, इस श्लोक में यह दिखाया गया है कि भगवती ने भर्त्तार के ललाट पर चरण कमलों से लात मारकर उनकी इच्छा पूरी की । इसका सामान्य अर्थ शृंगार रस पूर्ण है और शृंगार रस के प्रेमी जन प्रेयसी के चरणस्पर्श करना, अथवा उसके पदप्रहारों से प्रसन्न होना शृंगार-रस की विशेषता मानते हैं । श्रीकृष्ण भगवान से भी राधिका के भक्त गण उनके चरण पलोटन कराने में अपनी उपासना की उत्कृष्टता समझते हैं । परन्तु आपत्ति जनक विषय तो यह है कि क्या ९७ श्लोकोक्त सतीत्व की चरम सीमा पति के ललाट पर पद प्रहार करने में होती है । ऐसे विरुद्ध भावों का समन्वय कैसे किया जा सकता है ? इसलिये हम इसका कूटार्थ योगपर दिखाने का नीचे यत्न करते हैं । सामान्य भाव तो यह ही है कि शंकर जिन्होंने काम को भस्म कर दिया, वह भी पत्नि की लातें खाकर काम के उपहास्यास्पद बनते हैं ।
इस श्लोक का दूसरा अर्थ इस प्रकार किया जा सकता है । गोत्र का अर्थ इन्द्रिय संयम किया जा सकता है, अर्थात् 'गां त्रायते इति गोत्रम्' इसलिये गोत्रस्खलनं से इन्द्रिय संयम की गिरावट अथवा इन्द्रिय संयम से च्युत होना है, उसको मृषाकृत्वा अर्थात् झूटा करने से इन्द्रिय संयम की कमी को पूरा करने का अभिप्राय है वैलक्ष्यनमितं उस दृष्टि को कहते हैं, जिसमें लक्ष्य रहित दृष्टि नीचे को झुकी होती है । शांभवी मुद्रा में भी नेत्रों की मुद्रा ऐसी ही रहती है । जिसमें अन्तर्लक्ष्य बहिर्दृष्टि होने से दृष्टि लक्ष्य रहित हो जाती है, और नेत्र अर्धोन्मीलित से खुले रहते हैं, जालंधर
सौंदर्य लहरी २९५
बंध लग जाने से शिर भी आगे को झुक जाता है और चिबुक कंठ कूप पर जा लगती है, उस समय दृष्टि नीचे की ओर झुक जाती है और उसे वैलक्ष्य नमित कह सकते हैं। इन्द्रिय संयम युक्त जालंधर बन्ध लगने पर शांभवी मुद्रा का फल यह होता है कि शक्ति का उत्थान होकर वह झट आज्ञा चक्र के ऊपर चढ जाती है, अर्थात् आज्ञा चक्रस्थ शिव के ललाट पर पदार्पण करती हुई सहस्रार में प्रवेश करने को उतावली हो उठती है। भर्त्तार पद से देहाभिमानी देह का पोषण करने वाला भर्ता ही महेश्वर है।
उपद्रष्टानुमन्ताच भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन्पुरुषः परः ॥ गीता
क्योंकि आज्ञा चक्र तक ही देहाभिमान रहता है, उसके ऊपर चित्त की अवस्था उन्मुन्याभिमुखी होने लगती है और देहाभिमान शिथिल होने पर भर्ता शब्द की उपयुक्तता कम होने लगती है।
शंकर भगवत्पाद ने स्थान २ पर भगवती के अंग प्रत्यंग की सुन्दरता का वर्णन करते समय उसके हावभावों में कामदेव का सहयोग दिखाया है, मानो कामदेव सदा भगवती का आश्रय लेकर अपना कार्य करता रहता है, और ऐसा प्रतीत होता है कि मानो भगवती कामदेव की ही प्रति मूर्ति है। कादि विद्या का प्रथम अक्षर ककार है, जिससे ब्रह्म की आदि काम रूपा शक्ति अभिप्रेत है। उसकी त्रिपुरतापिन्युपनिषद में इस प्रकार व्याख्या मिलती है।
स एको देवः शिव रूपी दृश्यत्वेन विकासते, यतिषु, यज्ञेषु, योगिषु कामयते । कामं जायते । स एष निरंजनोऽका-
२९६ || सौंदर्य लहरी
मत्वेनोज्जृम्भते, अक्रचटतपयशान् सृजते । तस्मादीश्वरः कामोऽभिधीयते, तत्परिभाषया कामः ककारं व्याप्नोति ।
**अर्थः—**वह एक शिव रूपी देव दृश्य के रूप में विकसित होता है । यतियों में, यज्ञों में, योगियों में कामना करता है । इस प्रकार काम उत्पन्न होता है । वह निरंजन कामना रहित ब्रह्म जंभुहाई लेता है (विकसित होता है ।) अ वर्ग, क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग और श वर्गों की सृष्टि करता है । इसलिये ईश्वर को काम कहते हैं । उसकी परिभाषा करने से काम ककार में व्यापक माना जाता है ।
सृजन शक्ति आद्योपान्त काम शक्ति ही है, सामान्य इच्छा के रूप में उसे कामना कहते हैं और प्रजनन वासना को काम वासना कहते हैं । वह शिव की प्रभवाभिमुखी शक्ति है । परन्तु जब वह प्रति प्रसव रूपा होती है, तब उसे शिवा कहते हैं । प्रभव और लय क्रम दोनों उसके विपरित भाव होने के कारण एक दूसरे के प्रति-बन्ध और शत्रु हैं । समाधि काल में काम शिव का शत्रु हैं, परन्तु सृष्टिकाल में वह ही शक्ति के रूप में शिव की अर्धांगिनी का सहयोगी बन जाता है । समाधि काल में जिस काम को शंकर अपने तीसरे नेत्र को खोलकर भस्म कर देते हैं, वह ही उनके प्रभवाभिमुख होने पर मानो उनका उपहास करता है । भगवती के नूपुरों के श्रृंगार रस परिपूर्ण क्वण २ शब्द की ध्वनि में मानों कामदेव के उक्त उपहास का व्यंग व्यक्त हो रहा है । नृत्य के समय नूपुर ध्वनि अथवा गान वाद्य के साथ मंजीरों का
सौंदर्य लहरी २९७
बजना, जो ध्यान समाधि के प्रतिपक्षी हैं, कामदेव की प्रसन्नता को व्यक्त करने वाले हास्य की खिलखिलाहट सदृश्य हैं।
मन के लय और व्युत्थान का स्थान आज्ञा चक्र के ऊपर है। अनाहत् में ईश्वर, विशुद्ध में सदाशिव और आज्ञा में शिव का स्थान है। शांभवी मुद्रा को समाधि का दृागोद्घाटन कहना चाहिये। व्युत्थान के समय जब शक्ति नीचे उतरती है, तब मानो शिव के ललाट पर पद प्रहार करती हुई नीचे उतरती है, और उसके नूपुरों के शब्द में कामदेव के हास्य की प्रति ध्वनि बताई गई है। शांभवी मुद्रा के अभ्यासी को काम वासना रूपी अन्तर्दाह का उन्मूलन हो जाता है।
(८७)
हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवसैकचतुरौ
निश्यायां निद्राणं निशि च पर भागे च विशदौ।
परं लक्ष्मी पात्रं श्रियमनिसृजन्तौ समयिनां
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥
**अर्थ—**हे जननि ! तेरे दोनों चरण कमल पर जय प्राप्त कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य क्या है ? क्योंकि कमल बर्फ से मर जाता, तेरे चरण हिमगिरि पर निवास करने में कुशल हैं। कमल रात को सो जाता है, तेरे चरण दिन रात विशद रहते
| २६८ | सौंदर्य लहरी |
|---|
हैं; वह दिन में लक्ष्मी का पात्र रहता है और तेरे चरण समयाचार के उपासकों को खूब लक्ष्मी देते हैं ।
अर्थात् तेरे चरणों को कमल की उपमा कैसे दी जा सकती है ? कदापि नहीं दी जा सकती ।
( ८८ )
पदं ते कीर्त्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीखर्परतुलाम् ।
कथंचिद्वाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ॥
**अर्थ—**हे देवि ! तेरा पद कीर्त्तियों का प्रपद (स्थान) है और विपदाओं का अपद है । न जाने सत्पुरुषों ने उसकी तुलना कछुवे की कठिन खोपरी से कैसे की है, वह इतना कोमल है कि विवाह के समय पुरारि ने दयार्द्र मन से किसी प्रकार (अर्थात् बडी हिचकिचाहट और बडे संकोच के साथ) दोनों हाथों से उठाकर उसे पत्थर पर रखा था ।
विवाह में फेरों या भांवरों के समय वर वधू के एक चरण को अपने हाथों से उठाकर पत्थर पर रखकर कहता है, कि हे देवि ! तू धर्म पालनार्थ अपना चित्त इतना दृढ रखना जैसा यह पत्थर है ।
सौंदर्य लहरी २९९
कैवल्यशर्मा का मत है कि यह श्लोक मद्रास की भाषाओं की प्रतियों में नहीं मिलता, इसलिये क्षेपक है।
( ८९ )
नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसंकोचशशिभि-
स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमहायददतौ ॥
कठिन शब्द— नाक=स्वर्ग, किसलय=पत्र, पल्लव, अहाय=तुरन्त, स्वःस्थ=स्वावलंबी, स्वर्ग निवासी, अनिशं=निरन्तर ।
**अर्थ—**हे चण्डि ! तेरे दोनों चरण अपने नखों ने कल्पवृक्षों का परिहास सा कर रहे हैं, जो नख देवांगनाओं के कर रूपी कमलों को (हाथ जोडने समय) बंद करने के लिये संख्या में १० चन्द्रमा सदृश हैं। कल्पवृक्ष तो स्वर्ग में रहने वाले स्वावलंबी देवताओ को अपने पल्लव रूपी कराग्रों से फल देते हैं, परन्तु तेरे चरण दरिद्रियों को निरन्तर, तुरन्त और बहुत धन देते रहते हैं।
कल्पवृक्ष से स्वर्ग निवासियों को ही लाभ है, यहां के दरिद्रियों को कुछ नहीं।
३०० | सौन्दर्य लहरी
( ९० )
ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशाऽनुसदृशी-
ममन्दं सौन्दर्यप्रकरमकरन्दं विकिरति ।
तवास्मिन्मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे
निमज्जन्मज्जीवः करणचरणः षट्चरणताम् ॥
कठिन शब्द— करण चरणः=इन्द्रियां रूपी चरण वाला,
षट्चरण=भौँरा, मधुकर ।
**अर्थ:—**इस तेरे चरण में जो मंदार वृक्ष के पुष्पों के स्तबक जैसा सुन्दर है, मेरा ५ ज्ञानेन्द्रिय और १ अन्तः करण रूपी ६ चरण वाला यह जीव छः चरणों वाला मधुकर बनकर डूबा रहे । तेरा चरण जो दीनों को उनकी आशा के अनुसार निरन्तर लक्ष्मी देता रहता है, और सौन्दर्य राशि के मकरन्द को खूब फैलाता रहता है और मन्दार के पुष्पों के स्तबक सदृश सुभग है ।
अर्थात् मैं भौंर की तरह तेरे चरण कमल पर अपना सर्वस्व मनसा, वाचा कर्मणा सब इन्द्रियों और मनके व्यापारों को समर्पण करदूं ।
सौंदर्य लहरी ३०१
चरणों की गति का ध्यान:-
( ९१ )
पदन्यासक्रीडापरिचयमिवाऽब्धुमनम- श्रन्तस्ते (स्खलन्तस्ते) खेलं भवनकलहंसा न जहति । अतस्तेषां (स्वविक्षेपे) शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित- च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥
कठिन शब्दः—आचक्षाणः=बातें करता हुआ
अर्थः— हे चारु चरिते ! ऐसा प्रतीत होता है कि तेरे भवन के राजहंस चलते समय तेरे पदन्यास क्रीडा (चाल) का परिचय प्राप्त करने को तेरे खेल का त्याग नहीं करते । (अर्थात तेरे पीछे २ तेरी तरह कदम उठाकर चलते हैं, और वे इस खेल का त्याग नहीं करते, और तेरे चलते समय चरण कमलों में लगी मणियों युक्त नूपुरों की झङ्कार का शब्द मानो उनको चलने की शिक्षा का उपदेश कर रहा है ।
स्त्रियों की चाल की हंसगति से उपमा दी जाया करती है, परन्तु भगवती की चाल से हंस स्वयं चलने की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं । दूसरा भाव यह भी है कि परमहंस महापुरुषों की उन्मत्त गतिविधि में शक्ति की क्रीडा युक्त मस्तीभरी चाल का आभास रहता है । जीवनमुक्त परम हंस ही भगवती के भवन के राजहंस हैं ।
३०२ सौन्दर्य लहरी
पलंग का ध्यान:—
(९२)
गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः
शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।
त्वदीयानां भासां प्रतिफलनरागारुणतया
शरीरी शृङ्गारो रसइव दृशांदोग्धि कुतुकम् ॥
कठिन शब्द:—प्रच्छदपट=चादर, दृशां=दृष्टि को, दोग्धि=दुहता है, कुतुकं=कौतुहल
**अर्थ:—**ब्रह्मा हरि रुद्र और ईश्वर द्वारा रक्षा किये जाने वाले (क्रमशः मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर और अनाहत् चक्र ) तेरे मंच के चार पाये हैं, अर्थात् चारों तेरा मंच बनाते हैं उसपर बिछी हुई स्वच्छ छाया की बनी हुई कपट रुपी माया की चादर शिव है, जो तेरी प्रभा के झलकने के कारण अरुण दिख पडने से एसी प्रतीत होती हैं कि मानो शृङ्गार रस शरीरी बनकर दृष्टि में कुतूहल उत्पन्न कर रहा है ।
शिव शक्त्यात्मक प्रथम स्पन्द आज्ञा चक्र में, सदारुय अर्थात् अर्धनारीश्वर शिव विशुद्ध में, ईश्वर, रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा क्रमशः नीचे के चारों चक्रों के आधिदेव हैं। रुद्र विष्णु और ब्रह्मा शुद्ध विद्या के अन्तर्गत है और जीव (पुरुष) माया के अन्तर्गत है और अन्य २४ तत्त्वों का संघात् रुपी देह अशुद्धविद्या के अन्तर्गत है।
सौंदर्य लहरी ३०३
अशुद्धविद्या के रूप को सुप्त कुण्डलिनी कहा जा सकता है। जागकर वह सब तत्त्वों की शुद्धि करती हुई विशुद्ध चक्र में अपने विशुद्ध रूप में विराजने लगती है। यह हम ऊपर भी एक स्थान पर कह आये हैं कि प्रसुप्त अवस्था में शक्ति का स्थान मूलाधार के पास सुषुम्ना से बाहर है और जागकर सुषुम्ना के भीतर स्वाधिष्ठान चक्र में, परन्तु विशुद्ध स्वरूप में वह विशुद्धिचक्र में रहती है। इस श्लोक में भगवती के इस रूप का ही वर्णन है।
इस श्लोक के साथ ३७ वें श्लोक को एक बार फिर पढ़ लेना चाहिये। व्योमेश्वर और व्योमेश्वरी का यहां चित्र खेंचा गया है। शिव को यदि स्वच्छ छाया घटित आकाशमयी मायावी चादर सदृश समझा जाय तो शक्ति को उसमें स्फटिकवत् झलकने वाली अरुणिमा समझना चाहिये।
श्री चक्र को भी भगवती का मंच कहा जा सकता है। ईशान् कोण में ईश्वर, अग्नि कोण में रुद्र, नैऋत्य कोण में विष्णु और वायव्य कोण में ब्रह्मा समझना चाहिये। अथवा पूर्व में ब्राह्मी (ईश्वरी) मातृ देवता, दक्षिण में रौद्री मातृ देवता पश्चिम में कौमारी मातृ देवता और उत्तर में वैष्णवी अर्थात् प्रत्येक की शक्ति को देव के वाम ओर में देखना चाहिये, जो चारों द्वारों पर स्थित हैं। श्री चक्र को आकाश रूपी स्फटिक का बना हुआ समझना चाहिये। उस पर शिव रूपी चादर है और अरुणिमा रूपी शक्ति है। बैन्दव स्थान पर शक्ति का आसन है। श्री चक्र की रश्मियां दसों दिशाओं में भुक्ति मुक्ति सहित अणिमादि सिद्धियों के रूपों में फैल रही हैं।
३०४ | सौंदर्य लहरी
यहां तक भगवती के अंगों का पृथक २ ध्यान बताया जाकर इस श्लोक में पूरे शरीर का ध्यान कहा गया है ।
( ९३ )
अराला केशेषु प्रकृतिसरला मन्दहसिते
शिरीषाभा ¹गात्रे दृषदिव कठोरा कुचतटे ।
भृशंतन्वी मध्ये ²पृथुरपिवरारोह विषये
जगत् त्रातुं शंभोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥
पाठान्तरः— १ चित्तेदृषदुपलशोभा, २ पृथुरुरसिजारोह
**कठिन शब्द—**अराला=कुटिल, पृथु=भारी, बडा, वरारोह=सुन्दर नितंब, उपल=रत्न, उरसिज=कुच, काचित्=कचते (प्रकाशित इति) काचित्, चमकती हुई अथवा काच के सदृश, अथवा कोई भी जिसको हम नहीं जान सकते । करुणा काचिदरुणा=करुणा का अर्थ काचित् अरुणा किया जाना चाहिये ।
**अर्थः—**शंभु की करुणा (अर्थात दया) की, जगत की रक्षा करने के लिये मानों जो काचित अरुणा है सर्वत्र जय हो रही है । जिसके अर्थात् अरुणा भगवती के केश स्वाभाविक सरलता लिये हुए घूंघराले अर्थात कुटिल हैं, मन्द २ हंसी मुख पर है, गात्र अथवा चित्त सिरस की आभा लिये हुए है, कुच पत्थर सदृश कठोर है (अथवा स्फटिक की शोभा युक्त हैं) मध्य में कटिभाग अति पतला है और नितंब भारी हैं (अथवा
सौंदर्य लहरी ३०५
कुचों का उठाव भारी है ) पाठान्तर को ग्रहण करने मे शरीर के स्थान पर चित्त और नितंब के स्थान पर कुचों का दुबारा वर्णन हो जाता है । चित्त को स्फटिक मे उपमित तो किया जा सकता, परन्तु देह की शोभा का वर्णन किया जाना अधिक उपयुक्त दिखता है, और कुचों को दोबारा न बताकर नितंबों का भी वर्णन आना अत्यावश्यक है, इसलिये हमने पाठान्तरों को पृथक् दिखा दिया है ।
शंभु की करुणा और अरुणा दोनों एक ही हैं । अरुणा भगवती का एक नाम है और उसके अरुण वर्ण के कारण प्रसिद्ध है । करुणा भी ककार पूर्वक अरुणा ही है, इसलिये ककार से काचित् का भाव व्यक्त होता है । काचित् का अर्थ 'कोई' होने से करुणा को अरुणा का एक अंश समझना चाहिये । अर्थात् पराशक्ति अरुणा जिसको कोई नहीं जान सकता वह शंभु की करुणा के रूप में ही जानी जा सकती है । दूसरा भाव यह भी है कि शंभु के स्फटिक अथवा कांच सदृश स्वच्छ शरीर में प्रतिफलित होने वाली अरुणिमा ही भगवती अरुणा की छबी करुणा के स्वरूप में दिख रही है । कुटिलता, हिंसा, और कठोरता करुणा के विरोधी भाव होते हैं । दया का मन्द पड़ना भी एक कमी का लक्षण है, और किसी भाव का तनु होना उसके क्षीण होने का पूर्व रूप है । इसलिये शंभु की करुणा में कुटिलता हिंसा, कठोरता, मन्दपना और तनु का भाव नहीं होना चाहिये, क्योंकि शंभु की करुणा के रूप में जगत की रक्षा के लिये ही अरुणा ने यह रूप धारण किया है । अराल का अर्थ कुटिल होता है परन्तु कुटिलता भगवती के केशों की
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शोभा बढ़ा रही है। शंभु की करुणा कभी मन्द नहीं पडती, परन्तु मन्दपना हंसी में रहकर करुणा की वृद्धि करता है। शिरीष की व्युत्पत्ति 'शॄ' धातु से है (शॄ हिंसायां शृणाति शीर्य्यते वा इति शिरीषः) अर्थात् जो काटा जाता है, अथवा जो फैलता है वह शिरीष कहलाता है। शिरीष अथवा सिरस एक वृक्ष का नाम है जो कल्याण का सूचक है। अर्थात् भगवती में हिंसा का भाव ऐसा है जैसा कि सिरस में, क्योंकि भगवती का शरीर सिरस की आभायुक्त है जो सारे जगत का कल्याण करने को सदा तत्पर रहता है। जैसे कुटिलता को भगवती ने केशों में धारण कर के उनकी शोभा को बढाया है, और फिर भी पीठ पर पीछे की ओर फेंक दिया है, इसी प्रकार कठोरता भी दया का विरोधी भाव है, उसे भगवती ने अपने पयोधरों में धारण कर लिया है। दूध पिलाकर पोषण करने वाले स्तनों में कठोरता रहने पर भी वे दयार्द्रता से टपकते रहते हैं, क्योंकि भगवती का सारा शरीर शिरीष वृक्षवत् कल्याणवपुः है। शंभु की करुणा में कुटिलता, हिंसा और कठोरता के विरोधी भावों को स्थान कहां, वे इतने दयालु हैं कि उनकी करुणा में कभी कमी नहीं आती, वह सदा सर्वदा पूर्ण है, फिर तनु अथवा क्षीण होने की तो संभावना ही कैसे हो सकती है। इसलिये वह पृथु अर्थात् महती करुणा है। पृथु भाव भगवती ने नितंबों में धारण किया हुआ है। नीचे नितंब भाग का भारीपन स्थिरता का द्योतक है, अर्थात् शंभु की करुणा नित्य है। परन्तु भगवती का कटि प्रदेश अति तनु भी है, यद्यपि यह स्त्रियों की शोभा का एक लक्षण है, तो भी करुणा का मध्य भाग तनु होने से उसके क्षीण होने की संभावना की भ्रांति हो सकती है,