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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सौन्दर्य लहरी ३०७

परन्तु यह बात नहीं है। कटि प्रदेश में मणिपूर चक्र रुद्र का स्थान होने से, भगवती में रुद्र का रौद्र भाव अर्थात् क्रोध अति तनु हो गया है, अर्थात् क्षीणवत् तनु है। मानो भगवती ने रुद्र के रौद्र भाव को मेखला सदृश कस रखा है।

अभिप्राय यह है कि भगवती का शरीर मानो शंभु की दया का अवतार है, जो जगत की रक्षा करने के लिये अवतीर्ण हुआ है।

इस श्लोक में यह भाव भी प्रतीत होता है कि सद्गुरू स्वरूप शिव के अनुग्रह से जो शक्ति की जागृति होती है, और उपरोक्त करुणा के स्वरूप में साधक गण उसे अपने अन्तर में अनुभव करते हैं, वह शंभु की करुणा है। अर्थात शिव स्वरुप गुरु का अनुग्रह शंभु का ही अनुग्रह है, जिससे शिष्य में शक्ति का उत्थान होता है। इसलिये गुरु कृपा, शक्ति की अभिव्यक्ति और शंभु की करुणा तीनों पर्यायवाची हैं।

भगवती के श्रृङ्गारार्थ दर्पण का ध्यान

[ ९४ ]

समानीतः पद्भ्यां मणिमुकुरतामम्बरमणि-
र्भयादास्यादन्तःस्तिमितकिरणश्रेणिमसृणः ।
दधातित्वद्वक्त्रप्रतिफलनमश्रान्तविकचं
निरातंकं चन्द्राब्जिजहृदयपंकेरुहमिव ॥

कठिन शब्दः—मसृणः=चिकना, स्वच्छः विकचं=प्रफुल्लित. विकसित्, खिला हुआः निरातंक=आतंकरहित, निडर, बिना भय के ।


* नोटः—देखें योग दर्शन सूत्र (२, ४) में ५ क्लेशों की प्रसूत, तनु, विच्छिन्न और उदार चार अवस्थायें।

३०८ सौंदर्य लहरी

अर्थः—अंबर मणि अर्थात् सूर्य तेरे चरणों के समीप होने पर मुकुर (दर्पण) का काम दे रहा है। तेरे मुख के भय से उसने अपनी किरणों के समूह को अन्दर छुपा लिया है, इसलिये वह स्वच्छ है और तेरे मुख का प्रतिबिंब उसके हृदय कमल के सदृश सदा विकसित है (क्योंकि तेरा मुख कमल सदा विकसित रहता है और वह उसका प्रतिबिंब है), और उसको चन्द्रमा का भय नहीं है। (कमल सूर्य को देख कर खिलता है और रात्रि में मुरझा जाता है मानों उसे चन्द्रमा से भय लगता है)।

यहां पर सूर्य को दर्पण से उपमा देकर, उसमें प्रतिबिंबित भगवती के मुख कमल को उसके विकसित हृदय कमल से उपमित किया गया है। अनाहत् चक्र का स्थान हृदय है, और वह सूर्य-मंडल का स्थान है। अनाहत् चक्र की १२ पंखडियां १२ आदित्य मानी जाती हैं। इसलिये हृदयस्थ सूर्य मंडल भगवती के चरणों के समीप मुकुरवत् रखा हुआ है। ९२ श्लोक में भगवती को जिस मंच पर बिठाया गया है, वह विशुद्ध चक्र है और हृदय चक्र उसके नीचे है और आज्ञा चक्रस्थ चंद्रमंडल ऊपर है। दर्पण स्वच्छ होना चाहिये, यदि सूर्य की किरणें उसको ढकलेती हैं तो वे मुकुर को मलीनवत् करके मुख के प्रतिबिंबित होने में बाधक होती हैं। परन्तु भगवती के मुख का तेज सूर्य के तेज से भी अधिक है अथवा उसका तेज भगवती के तेज से ही प्रकाश पाता है, इसलिये सूर्य ने भगवती के मुख के भय से अपनी किरणों को अन्तःस्तिमित् कर

सौंदर्य लहरी ३०२


लिया है। और भगवती का प्रफुल्लित मुख कमल उसमें दिखने लगा है।

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
(गीता १५, १२)

भगवती का मुख कमल के सदृश है, इसलिये उसका प्रतिबिम्ब सूर्य के हृदय कमलवत् जान पडता है। कमल रात्रि में संकुचित हो जाता है और दिन में ही खिलता है। इसलिये ऊपर आज्ञाचक्र में चन्द्र मंडल दिखने से उसके बंद हो जाने की यदि आशंका की जाय तो वह उचित नहीं है, क्योंकि भगवती के तेज से ही चन्द्र-मण्डल चमकता है और उसके प्रतिबिंब को चन्द्रमा से कोई भय नहीं हो सकता।

कठवल्ली (६,५) की 'यथादर्शे तथात्मनि' इत्यादि श्रुति पर भाष्यकार भगवत्पाद लिखते हैं कि जैसे मल रहित दर्पण में मनुष्य को अपना प्रतिबिंब स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है वैसे ही तमोगुण और रजोगुण से शुद्ध होने पर बुद्धि रूपी निर्मल आदर्श पर आत्मतत्त्व का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखा करता है। अर्थात् योगियों को प्रत्यक्ष होने वाला हृदय पुरुष परमतत्त्व का प्रतिबिंब है, जो उर्ध्वोन्मीलित सूर्य और अधोन्मीलित चन्द्र के योग से योगियों के हृदय में सदा क्रीडा किया करता है। अथवा वह शक्ति का ही रूप है जो योगियों के हृदयस्थ सूर्यमण्डल रूपी मुकुर में परमतत्त्व का प्रतिबिंब मात्र है।

३१० सौंदर्य लहरी


लक्ष्मीधर के मतानुसार श्लोक ९४, ९९ और १०२ तीनों क्षेपक हैं। ऊपर कहा जा चुका है कि कैवल्य शर्मा के मत से श्लोक ८८ क्षेपक है। शंकर भगवत्पाद ने पूरी शतश्लोकी लिखी थी इसलिये ३ श्लोक क्षेपक होने चाहिये अर्थात् उक्त चारों में एक श्लोक क्षेपक नहीं है। हमारी समझ में यह ९४ वां श्लोक क्षेपक नहीं माना जाना चाहिये, क्योंकि इसकी पूर्व संगति ९२ श्लोक से और उत्तर संगति ९५ श्लोक से स्पष्ट है। शृङ्गार के लिये यदि ९५ श्लोकोक्त शृङ्गार का डिब्बा पास में दिखाया जाता है तो शृङ्गार के आवश्यक साधन मुकुर को क्यों नहीं स्थान दिया जाना चाहिये। शृङ्गार के लिये शृङ्गार का डिब्बा जितना अनिवार्य है उतना आवश्यक मुकुर भी है।

श्रृङ्गार के डिब्बे का ध्यानः—

( ९६ )

कलङ्कः कस्तूरी रजनिकर बिम्बं जलमयं
कलाभिः कर्पूरैर्मरकतकरण्डं निबिडितम् ।
अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं
विधिर्भूयो भूयो निबडयति नूनं तव कृते ॥

कठिन शब्दः— मरकतं=एक हरे रंग की मणि; करण्ड=डिब्बा, पिटारी; निबिडितं=भरा हुआ; कुहरं=डिब्बे के भीतर का पोलापन।

अर्थः— चन्द्र बिंब एक मरकत मणि के बने हुए डिब्बे के सदृश है, उसका कलङ्क (काला धब्बा) कस्तूरी का काला

सौन्दर्य लहरी ३११

रंग है और चमकती हुई कलायें कपूर सदृश हैं। दोनों को जल में पीसकर तेरे आभोग के लिये डिब्बे में भरकर रखा हुआ है, जो प्रतिरात्रि खर्च होता रहता है और ब्रह्मा उसे फिर दिन में बार २ भरता रहता है।

नीचे चरणों के पास सूर्यमण्डल, और ऊपर विशुद्ध चक्र में १६ कलायुक्त चन्द्रमण्डल दोनों भगवती के श्रृङ्गार के साधन हैं। सूर्यमण्डल यदि मुकुर है तो चन्द्रमण्डल श्रृङ्गार का डिब्बा है। कृष्णपक्ष भगवती की रात्रि है और शुक्लपक्ष दिवस। शुक्ल और कृष्ण पक्षों को देवताओं का दिनरात कहते हैं।


भगवती की सपर्या की असुलभता

( ९६ )

पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः
सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा ।
तथाह्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमत्तुलां
तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाऽऽद्याभिरमराः ॥

कठिन शब्दः— शतमख=इन्द्र

अर्थः— तू त्रिपुरारि के अन्तःपुर की रानी है इसलिये तेरे चरणों की सपर्या पूजा की मर्यादा चंचल इंद्रियों वाले मनुष्यों को सुलभ नहीं, और इन्द्र की प्रमुखता में रहने

३१२ सौंदर्य लहरी

वाले ये देवगण तेरे द्वार के निकट खडी रहने वाली अणिमादि की अतुल सिद्धियों तक ही पहुंच पाते हैं ।

देवताओं के पास जो अणिमादि सिद्धियां होती हैं, उनका स्थान भगवती के अन्तःपुर के द्वारों के बाहर ही है, जैसाकि श्रीचक्र के भूपृह के बहिर्द्वारों पर उनका स्थान बताया जाता है, और असंयतेन्द्रिय चंचल चित्त वाले मनुष्यों की तो वहां तक गति ही दुर्लभ है । उनको तो भगवती की पूजा करने का भी सौभाग्य प्राप्त नहीं होता, कहा है देवो भूत्वा देवं यजेत् । और सिद्धियां भी अन्तःपुर में प्रवेश नहीं कर पातीं ।

इस श्लोक में असंयमी और सिद्धियों की कामना रखने वाले मनुष्यों की निन्दा की गई है और अगले श्लोक में कुरवक तरु (कांटेदार वृक्षों) के सदृश कषायों से युक्त कुत्सित् मनुष्यों में शक्ति के जागरण होने की असंभावना दिखाई गई है ।

(९७)

कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपिधनैः । महादेवं हित्वा तव सति सतीनामचरमे कुचाभ्यामासंगः कुरवकतरोरप्यसुलभः ॥

कुरवक=एक प्रकार का वृक्ष, जिसमें पीत, रक्त और नीले रंग के पुष्प होते हैं । लाल फूलों वाला कुवरक कहलाता है, पीले फूलों

सौंदर्य लहरी ३१३


वाला कुरुण्टक, और नीले रंग वाले को झिंर्टी कहते हैं । कुत्सित् है 'रव' अर्थात् शब्द जिसका वह कुरवक ।

अर्थः— विधाता की स्त्री सरस्वती को क्या कितने ही कविजन नहीं भजते ? और कौन थोडा सा भी धनवान होकर लक्ष्मी का पति नहीं होता ? (धनाड्य को धनपति या लक्ष्मि पति कहने लगते हैं) । परन्तु हे सति सतियों में श्रेष्ठ ! महादेव को छोडकर तेरे कुचों का संग तो कुरवक तरू को भी दुर्लभ है ।

यहां भगवती का आसंग आलिंगन करने से शक्ति के जागृत होने पर उसकी क्रिया अथवा उसके आवेश का अपने शरीर में अनुभव करने का अभिप्राय है, परन्तु वह कुरवक जैसे कषाय युक्त कुतर्की कुवादियों को सुलभ नहीं होता, शक्ति जागृत होने पर तो मनुष्य शिवतुल्य हो जाता है । कवि होना और धनवान होना सुलभ है परन्तु भगवती का कृपा पात्र बनना कठिन है ।

( ९८ )

गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो
हरेःपत्निं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।
तुरीया काऽपित्वं दुरधिगम निःसीममहिमा
महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ॥

अर्थः— हे पर ब्रह्म की महाराज्ञि ! शास्त्रों के जानने वाले ब्रह्मा की पत्नि को सरस्वती वाक देवी कहते हैं, विष्णु

३१४ | सौंदर्य लहरी

की पत्नि को पद्मा (कमला) कहते हैं और हर की सहचरी को पार्वती कहते हैं। परन्तु तू महामाया कोई चौथी ही है, तेरी महिमा असीम है तूने सारे विश्व को भ्रम में डाल रखा है, तुझको जानना कठिन है।

सरस्वती का बीज मंत्र ऐं है, लक्ष्मी का श्रीं, पार्वती का क्लीं और महामाया का ह्रीं। वाग्भव कूट का तीसरा अक्षर शक्ति का वाचक है और वर्णमाला का चौथा अक्षर होने से तुरीय पद समाधि का द्योतक है और वह सब बीजाक्षरों के अन्त में रहता है। अनुस्वार भी शक्ति के साथ सदा रहता है, वह शिवात्मक है। इसे काम कला कहते हैं।

<u>घटा अवस्था</u>

( ९९ )

समुद्भूतस्थूलस्तनभरमुरश्चारुहसितं
कटाक्षे कंदर्पो कतिचन कदम्बद्युतिवपुः ।
हरस्य त्वद्भ्रान्ति मनसि जनयसिस्म विमला
भवत्या ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे ॥

अर्थ — हे उमे ! ऊपर उभरे हुए स्थूल स्तनों के भार से युक्त उरुःस्थल, सुन्दर हंसी और कटाक्ष में कंदर्प और कदंब वृक्ष की कुछ शोभा वाला शरीर, सब हर के मन में तेरी याद दिलाकर भ्रम उत्पन्न करते हैं, क्योंकि तेरे विमल भक्तों में तेरी तद्रूपता की परिणति के कारण वे तेरे जैसे दिखने लगते हैं।

सौंदर्य लहरी ३१५


ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति, ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्म स्वरूप हो जाता है, भगवती के निरन्तर चिन्तन करने से भगवती के भक्त भी भगवती के रूप वाले हो जाते हैं। शक्ति जागृत होने पर साधक का शरीर आनखशिख शक्ति के आवेश से पूर्ण आविष्ट हो जाता है। इस अवस्था को घटा अवस्था कहते हैं।

यह श्लोक क्षेपक माना जाता है। यह क्षेपक हो सकता है क्योंकि इसकी संगति पूर्वापर से नहीं मिलती। और भगवती के शरीर का इस प्रकार का वर्णन पहिले भी आ चुका है।

प्रार्थना

( १०० )

कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं
पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् ।
प्रकृत्या मूकानामपि च कविता कारणतया
यदाधत्ते वाणी मुखकमल ताम्बूलरसताम् ॥

अर्थ— हे मां ! बताओ, वह समय कब आयेगा, जब मैं एक विद्यार्थी, तेरे चरणों का धुला हुआ जल (चरणोदक), जो लाक्षारस (महावर) के रंग से लाल हो रहा है, पान करूंगा, जिसमें सरस्वती के मुखकमल से निकले हुए पान की पीक के सदृश, जन्म के गूंगे को भी कविता शक्ति प्रदान करने की क्षमता है।

३१६ | सौंदर्य लहरी

यहां 'अयं विद्यार्थी' पद से अनुमान होता है, कि जिस समय यह स्तोत्र लिखा गया था, उस समय शंकर भगवत्पाद् विद्यार्थी ही थे । वैसे तो मनुष्य जीवन भर विद्या का प्रार्थी रहता है परन्तु विद्यार्थी शब्द रूढी अर्थ में गुरु कुल में रहने वाले विद्यार्थी के लिये ही प्रयुक्त होता है ।

(१०१)

सरस्वत्या लक्ष्म्या विधि हरि सपत्नो विहरते
रतेः पातिव्रत्यं शिथिलयति रम्येण वपुषा ।
चिरञ्जीवन्नेव क्षपितपशुपाशव्यतिकरः
परानन्दाभिख्यं रसयति रसं त्वद्भजनवान् ॥

**अर्थ—**तेरा भजन करने वाला मनुष्य सरस्वती और लक्ष्मी दोनों से युक्त होकर ब्रह्मा और हरि के सापत्नडाह का पात्र बनकर विहार करता है । और सुन्दर रम्य शरीर से रति (कामदेव की स्त्री) के भी पातिव्रत धर्म को शिथिल करता है, अर्थात् वह विद्वान्, धनाढ्य और सुन्दर रूपलावण्य युक्त शरीर वाला हो जाता है । और पशु पाश के दुःखों को नष्ट करके चिरकाल तक परमानन्द के रस का रसास्वाद लेता हुआ जीवित रहता है ।

बंधन में पडा हुआ जीव पशु कहलाता है, और राग रूपी पाश संसार रूपी खूंटे से बांधने की रस्सी है । कहीं २ आठ पाशों

सौंदर्य लहरी ३१७


का भी जिक्र आता है वे ये हैं, घृणा, लज्जा, भय, निन्दा, शोक, जाति, कुल और शील । परन्तु भावनोपनिषद् में मोह अथवा राग को ही पाश कहा है । श्वेताश्वतरोपनिषद् के (१,४) में भी एक ही पाश बताया गया है, जैसे 'अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं' इत्यादि ।

अगला १०२ वां श्लोक भी क्षेपक समझा जाता है । हम कह आये हैं कि लक्ष्मीधर के मत के अनुसार ९४, ९९ और १०२ श्लोक क्षेपक हैं और कैवल्य शर्मा ८८ वें श्लोक को ही क्षेपक मानते हैं । अनुमान से भगवत्पाद ने पूरे १०० श्लोक का ही यह स्तोत्र लिखा होगा । हमारी समझ में ९४ वां श्लोक क्षेपक नहीं होना चाहिये । इसलिये ८८, ९९ और १०२ ये तीन श्लोक क्षेपक कहे जा सकते हैं । ९९ श्लोक का क्षेपक होना तो स्पष्ट प्रतीत होता है । यदि अन्तिम दो श्लोकों को ग्रंथ का अंग न माना जाय, क्योंकि उनमें ग्रंथ की स्वीकृति के लिये भगवती से पृथक प्रार्थना की गई है अर्थात् ग्रंथ जिसके लिये प्रार्थना की गई है वह पूरे १०० वें श्लोक पर समाप्त होता है, तो प्रार्थना के इस १०२ श्लोक को भी क्षेपक कहना उचित् नहीं । इस दृष्टि से एक श्लोक ही क्षेपक कहा जा सकता है और वह ९९ वां श्लोक हो सकता है अथवा ८८ वां । ८ और ९ के अंक के पढने में भ्रांति होने के कारण किसी ने ८८ को किसी ने ९९ को क्षेपक समझ लिया है और संभव है ९९ के स्थान पर ८८ को गलती से क्षेपक कह दिया गया हो ।

३१८ | सौन्दर्य लहरी

समर्पण

[१०२]

निधेनित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे
निराघाटज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये ।
नियत्यानिर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतपदे
निरातंके नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम् ॥

अर्थ:— हे सदा हंसमुखि असीमगुणनिधे, नीतिनिपुणे, निरतिशयज्ञानवति, नियम परायण भक्तों के चित्त में घर करने वाली, नियति से निर्मुक्त अर्थात् नियति से अतीते, सब शास्त्र उपनिषद् जिसके पदकी स्तुति करते हैं ऐसी अभये, सनातनी नित्ये ! मेरी भी इस स्तुति को स्वीकार करके अपने निगमों में स्थान दो ।


[१०३]

प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः
सुधासूतेश्चन्द्रोपलजललवैर्घ्य रचना ।
स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधि सौहित्यकरणं
त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥

अर्थ:— हे जननि ! तेरी प्रदान की हुई वाक्शक्ति से की गई इस स्तुति के शब्द इस प्रकार हैं जैसे दीपक की ज्वालाओं से सूर्य की आरती उतारना, अथवा चन्द्रकान्त मणि से टपकते हुए जलकणों से चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करना, अथवा समुद्र का सत्कार उस ही के जल से करना ।

सौंदर्य लहरी ३१९


उपसंहार

शास्त्रों में कर्म, भक्ति, ध्यान और ज्ञान भेद से अध्यात्मसाधन के सोपानक्रम के तीन स्तर कहे गये हैं, इनकी साधन पद्धतियों में भिन्नता अवश्य है, परन्तु सब के आधार में एक ही मूल सिद्धान्त है, इसलिये परस्पर में एक दूसरे के विरोधी न होते हुए वे अधिकारी भेदसे सबको उत्तरोत्तर एकही लक्ष्य पर पहुंचाते हैं। श्रीकृष्ण भगवान् ने सब साधनों की उपयोगिता बताते हुए सब जिज्ञासुओं को तीन प्रकार का अधिकारी माना है। प्रथम श्रेणि के वे पुरुष हैं जिनको धनदारादि में दृढ आसक्ति है, वे कर्मयोग के अधिकारी होते हैं, दूसरी श्रेणि के वे पुरुष हैं जिनको संसार से तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो गया है वे ध्यान ज्ञान के अधिकारी होते हैं, तीसरे मध्यम श्रेणि के मनुष्य वे हैं जिनका चित्त संसार की आपत्तियों से व्याकुल रहता है परन्तु घर की आसक्ति का त्याग नहीं कर सकते, उनको भक्ति योग का अधिकारी समझना चाहिये, उनके लिये भक्ति उपासना का मार्ग ही श्रेयस्कर होता है। यद्यपि सब साधनों का लक्ष्य शुद्धचेतन स्वरूप परमात्मतत्त्व की प्राप्ति की ही ओर होता है, तो भी ऐहिक और पारलौकिक भोगों की प्रबल वासना उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अग्रसर होने में बाधा डालती रहती है। ज्यों २ अनेक दृष्ट और आनुश्रविक अर्थात् देखे और सुने विषयों की तृष्णा कम होती जाती है, चित्त की स्वस्थता उन्नत होती जाती है और वृत्तियां बाह्य विषयों का आश्रय त्याग कर अभ्यन्तर नित्य अखंड आनन्दमयी आत्मज्योति का अवलंबन पकडने लगती हैं। बाह्य विषयों से शनैः२ क्रमशः विरक्तिपूर्वक शुद्ध आत्मज्योति का प्रकाश एवं साक्षात्कार

३२० सौंदर्य लहरी


होने तक सारी साधन यात्रा को बाह्य, अभ्यन्तर और मिश्रित् उपासना भेद से तीन स्तरों पर बांटा जाता है। उनको बहिर्याग और अन्तर्याग अथवा अपरा और परा पूजा भी कहते हैं। शुद्ध सत्त्विक चेतन सत्ता एक परमात्मा की ही है और देहादि की उपाधियों के योग से प्रतिभासित होने वाली चेतना जीव कहलाती है। इसलिये चित्त की वृत्तियों को सब उपाधियों से हटाकर शुद्ध चेतन सत्ता पर लगाना ही सब साधनों का सार है, जिसका उपसंहार जिवाभिमान के सर्वथा नष्ट होने पर सब वृत्तियों का परमतत्त्व में विलीनीकरण द्वारा होता है। कर्मयोगी उसे स्थित प्रज्ञता कहता है, भक्त उसे जीव ब्रह्म का सायुज्य योग मानता है और ज्ञानी उसे ब्राह्मी स्थिति जानता है।

इसलिये उपासना सदा चेतनसत्ता की की जाती है, जड पदार्थों की नहीं। व्यवहार में भी सब मनुष्य पुत्र कलत्र मित्र बंधु राजा और राज्य कर्मचारियों के देह की सेवा द्वारा देही आत्मा की ही प्रसन्नता प्राप्त किया करते हैं। परन्तु परम चेतन तत्त्व जिसकी व्यापकता सर्वत्र है सामान्यतया मनबुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ग्रहणगम्य नहीं, उसकी सेवा उपासना 'ईशावास्यमिदँ सर्वं' इस श्रुति के अनुसार यत्र तत्र सर्वत्र भावना द्वारा ही प्रतिमादि जड प्रतीकों के सहारे आवाहन पूजन के उपचारों सहित की जानी संभव है। सर्वव्यापी परमेश्वर का आवाहन अर्चन करने का विनियोग यंत्र प्रतिमा अथवा प्रतीक विशेष में उसके अस्तित्व की धारणा को दृढ करानां मात्र है। इस प्रकार दृढ संकल्प और दृढ धारणा से सर्वव्यापी की चेतन सत्ता उन जड प्रतीकों में इस प्रकार प्रकट हो जाती है

सौंदर्य लहरी ३२१


जैसे ईंधन में अग्नि। बाह्य यागों में जैसे मूर्ति अथवा यंत्रों में देव का आवाहन प्राणप्रतिष्ठा और तदनन्तर पंचोपचार षोडशोपचार सहित अर्चन पूजन एवं ध्यान किया जाता है, वैसेही अन्तर्याग में भी, देहरूपी प्रतीक के अंग प्रत्यंगों में करन्यास अंगन्यासों द्वारा उसी देव की प्रत्येक अंग संबंधिनी शक्तियों का आवाहन, हृदय में प्राणप्रतिष्ठा और मानसिक पूजन ध्यानादि अनेक क्रियाओं का विधान है, जिनका तात्पर्य अपने देह रूपी प्रतीक में उस सर्वान्तर्यामी की जागृति करना है, जब उस देवात्मिका शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव अपने अन्तर में होने लगता है, तब बाह्य प्रतीकों की अपेक्षा नहीं रहती, तो भी वे मूर्तियां और यंत्रादि विशेष आदरणीय बने ही रहते हैं।

इसके पश्चात् उस मनुष्य की उपासना का स्तर सूक्ष्म हो जाता है और उपासना के पीठ स्थान स्थूल देहको छोड़कर सूक्ष्म देह के स्तरों पर उठने लगते हैं। पंचतन्मात्राओं पंचप्राणों और पंच कर्मेन्द्रियों का देहसे सुषुम्नागत मूलाधारादि चक्रोंद्वारा संबंध है और पंचज्ञानेन्द्रियों का आज्ञाचक्र द्वारा। साधक इस स्तरपर अपना भावनायुक्त ध्यान क्रमशः भिन्न-भिन्न चक्रों पर करता हुआ सहस्रार तक ऊपर उठाता है। प्रत्येक चक्र पर प्रत्यक्ष होने वाले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव प्रभृति सब शिव शक्ति भेद से एक ही परम चेतनतत्व के उस उस चक्र से संबंधित रूप हैं। इनसे ऊपर नाद, कला, ज्योति, शांति आदि भी उस ही परम चिति शक्ति की अभिव्यक्तियां प्रत्यक्ष रूप से अनुभव में आती हैं।

३२२ | सौंदर्य लहरी


एक ही निर्विशेष चिदात्मा ब्रह्म की सगुण निर्गुण भेद से उपासना की जाती है । सगुण ब्रह्म के दो भेद हैं, एक जगत् का नियन्ता और दूसरा जगदात्मक अर्थात् सबका अन्तरात्मा । ज्ञान क्रिया, गुणादि की उपाधि भेद से जैसे एक ही ईश्वर का अनेक रूपों से ध्यानार्चन किया जाता है, वैसे ही उसका स्मरण भी अनेक नामों द्वारा किया जाता है । विष्णु सहस्रनाम, गोपाल सहस्रनाम, शिवसहस्रनाम दुर्गासहस्रनाम, ललितासहस्रनाम, अनेक सहस्र-नामावलियां प्रसिद्ध हैं, जिनमें पुलिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग पदों द्वारा ब्रह्मपद का गुणविशिष्ट निर्देश देखने में आता है, वास्तव में ब्रह्म को किसी लिंग वाच्य नहीं कहा जा सकता । भास्करराय अपनी ललितासहस्रनाम की व्याख्या में कहते हैं कि 'पदानुसारीण्येव हि लिंगानि, नतुवास्तविकं ब्रह्मण्येकमपि लिंगम् ।' अर्थात् ये लिंग पदानुसारी मात्र हैं, वास्तविकता यह है कि ब्रह्म में एक भी लिंग नहीं होता जैसा कि कहा है,

पुंरूपं वा स्मरेद्देवि स्त्रीरूपं वा चिन्तयेत् ।
अथवा निष्कलं ध्यायेत्सच्चिदानन्दलक्षणम् ॥

अर्थः— हे देवी, चाहे पुंरूप से उसका स्मरण करो, चाहे स्त्रीरूप से चिन्तन करो, अथवा उस निष्कल ब्रह्म पद का ध्यान सत्चित् आनन्द लक्षण युक्त करो ।

बहिर्यागों में भक्त जिसका भगवान् अथवा भगवती पदों से संबोधन करता है, उसी को अन्तर्याग वाला साधक प्रज्ञानात्मा,

सौंदर्य लहरी ३२३

चिदात्मा, चिन्मय अन्तःपुरुष, चिन्मयी या चितिशक्ति कह कर ध्यान और निदिध्यासन करता है । जैसा कि श्रुति कहती है

एकोवशी सर्वभूतान्तरात्मा, एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यंति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतंनेतरेषाम् ॥

उसी परम तत्व को श्रीविद्या के उपासक ललिता महात्रिपुर सुन्दरी कहते हैं।

श्रीचक्रराजनिलया, श्रीमत्त्रिपुर सुंदरी ।
श्रीशिवा शिवशक्त्यैक्यरूपिणी ललिताम्बिका ॥
( ललिता सहस्त्रनाम )

अर्थात् श्रीचक्रराज में निवास करने वाली श्रीमत्त्रिपुर सुंदरी श्रीशिवा ललिता अंबिका शिवशक्ति के भेदरहित ऐक्यरूपा है

त्रिपुर सुंदरी का अर्थ भास्करराय इस प्रकार करते हैं:--अत्र त्रीणि पुराणि ब्रह्मविष्णुशिवशरीराणि यस्मिन् सः त्रिपुरः परशिवः, तस्य सुंदरी शक्तिः । वायुसंहिता में भी कहा है कि:—

शिवेच्छया पराशक्तिः शिवतत्त्वैकतां गता ।
ततः परिस्फुरत्यादौ सर्गे तैलंतिलादिव ॥

अर्थः—वह पराशक्ति सृष्टि के आदि में शिव की इच्छा (संकल्प) से, शिवतत्व की एकता रखने वाली उस ही (शिव से) परिस्फुरित होती है, जैसे तिलों से तेल । इसलिये यह ही भाव सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में व्यक्त किया गया है।

३२४ सौंदर्य लहरी


ब्रह्मणोऽभिन्नशक्तिस्तु ब्रह्मैव खलु नापरा । (सौर संहिता)

शक्ति ब्रह्म से अभिन्न होने के कारण ब्रह्म ही है अन्य नहीं । जड़चेतन भेद से उसके दोनों ही रूप हैं कहा है:—

चिच्छक्ति श्चेतनारूपा जडशक्तिर्जडात्मिका ।.

(ल० स०) देखे श्लोक ३, ५ सौ० ल०

सत्चित् आनन्द की अभिव्यक्ति अस्ति, भाति और प्रियता द्वारा सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रही है । अखिल ब्रह्मांड की भौतिक सत्ता सत् शक्ति का कार्य है, उसका ज्ञान प्राणिमात्र में प्रतिभासित् होने वाली चित् शक्ति का परिस्फुरण है, और उस बाह्य ज्ञान से उदय होने वाली प्रियता आनंद की प्रतिफलित क्रिया है । अर्थात् सत् शक्ति के आसन पर चिति शक्ति महात्रिपुर सुंदरी विराजमान है, जिस चिदानंद-लहरी से पिण्ड और ब्रह्मांड दोनों व्याप्त हैं और परब्रह्म उसकी आत्मा है, (श्लोक ३४) । विश्व उस विश्वरूपा षोडश-कलात्मिका का विराट्देह है इसलिये स्थूल शरीराभिमानी जागरित्-स्थानों बहिःप्रज्ञः एकोनविंशति-मुखः स्थूलभुकवैश्वानरोजीव उसी का अभिन्न स्वरूप है ।

ललिता सहस्रनाम में कहा है—

विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ।
सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्यासर्वावस्थाविवर्जिता ॥

सौंदर्य लहरी ३२५

इसी प्रकार स्वप्नस्थानी अन्तःप्रज्ञ प्रविविक्तभुक् तैजस तैजसा- त्मिका से और सुषुप्तस्थानी एकीभूत प्रज्ञानघन आनंदमय आनंदभुक् चेतोमुख प्राज्ञ प्राज्ञात्मिका से अभिन्न एक ही रूप है, सर्व अवस्थाओं से वर्जित शुद्ध शान्त अद्वैत शिव चिन्मात्र आत्मा का स्वरूप तुर्यावस्था है।

जैसे जगत् नियन्त्रिणी विराट्रूपा विश्वतो मुखी भगवती का अनुग्रह प्रतिमा विशेष में अथवा ब्रह्माण्ड और पिण्ड के प्रतीक स्वरूप श्रीयंत्र में पूजन अर्चन करने से अनन्य भक्ति द्वारा प्राप्त किया जाता है, वैसे ही अध्यात्म योग विद्या के जानकार देह को ही श्रीयंत्र जान कर चिदात्मिका की अंतर्भावना द्वारा उपासना करते हैं। जैसा कि कहा है:-'अंतर्मुख समाराध्या बहिर्मुख सुदुर्लभा ।' (ल० स०) । योगीजन उस शक्ति की स्थिति प्राणिमात्र के देह में प्रसुप्त अवस्था में मानते हैं, जिसे कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं, जो भावना द्वारा जगाई जा सकती है।

मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रंथि विभेदिनी । मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रंथि विभेदिनी । आज्ञाचक्रान्तरास्था रुद्रग्रंथि विभेदिनी । सहस्राराम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी ॥ तडिल्लतासमरुचिः षट्चक्रोपरिसंस्थिता । महासक्तिः कुण्डलिनी विसतन्तुतनीयसी ॥ भवानी भावना गम्या भवारण्यकुठारिका ॥ (ल० स०)

भावना दो प्रकार की होती है:-आर्थीभावना और शाब्दी भावना । आर्थी भावना प्रवृत्तिरूपा होती है, यह स्थूलरूप है जिसका

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सावयव अनुभव किया जा सकता है और शाब्दी सूक्ष्म मंत्रमयी है। योगिनी हृदय में भावना के तीन प्रकार इस प्रकार कहे गये हैं।

आज्ञान्तं सकलं प्रोक्तं ततः सकलनिष्कलम् ।
उन्मन्यन्ते परे स्थाने निष्कलं च त्रिधास्थितम् ॥

अर्थः— मूलाधार से आज्ञाचक्र तक सगुण रूप कहा जाता है, उसके ऊपर उन्मनी तक सगुण निर्गुण, और उसके अंत में सहस्रारस्थ परम स्थान पर निष्कल निर्गुण की स्थिति है; इसलिये तीनों में वैसे ही भावना करना चाहिये। यह आर्थी भावना के भेद हैं।

शाब्दी भावना के अंतर्गत, मंत्रों का न्यास, प्राणप्रतिष्ठा और जप स्वाध्याय का समावेश है। वैदिक, तांत्रिक और पौराणिक भेद से मंत्र अनेक हैं, परन्तु वे सब एक नादरूपा नामरूपविवर्जिता शक्ति के ही अनेक पदवाचक रूप हैं, जैसा कि कहा है

यदा भवति सा संवित् विगुणीकृतविग्रहा ।
सा प्रसूते कुंडलिनी शब्दब्रह्ममयी विभुः ॥
शक्तिस्ततो ध्वनिस्तस्मान्नादस्तस्मान्निरोधिका ।
ततोऽर्धेन्दुस्ततो विन्दुस्तस्मादासीत्पराततः ॥
पश्यन्ति मध्यमा वाणी वैखरीसर्गजन्मभूः
इच्छाज्ञानक्रियात्मासौ तेजोरूपा गुणात्मिका ।
क्रमेणानेन सृजति कुण्डलिन्यर्णमालिकाम् ।
विश्वात्मना प्रबुद्धा सा सूते मंत्रमयंजगत् ॥