सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 375, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी ३२५
इसी प्रकार स्वप्नस्थानी अन्तःप्रज्ञ प्रविविक्तभुक् तैजस तैजसा- त्मिका से और सुषुप्तस्थानी एकीभूत प्रज्ञानघन आनंदमय आनंदभुक् चेतोमुख प्राज्ञ प्राज्ञात्मिका से अभिन्न एक ही रूप है, सर्व अवस्थाओं से वर्जित शुद्ध शान्त अद्वैत शिव चिन्मात्र आत्मा का स्वरूप तुर्यावस्था है।
जैसे जगत् नियन्त्रिणी विराट्रूपा विश्वतो मुखी भगवती का अनुग्रह प्रतिमा विशेष में अथवा ब्रह्माण्ड और पिण्ड के प्रतीक स्वरूप श्रीयंत्र में पूजन अर्चन करने से अनन्य भक्ति द्वारा प्राप्त किया जाता है, वैसे ही अध्यात्म योग विद्या के जानकार देह को ही श्रीयंत्र जान कर चिदात्मिका की अंतर्भावना द्वारा उपासना करते हैं। जैसा कि कहा है:-'अंतर्मुख समाराध्या बहिर्मुख सुदुर्लभा ।' (ल० स०) । योगीजन उस शक्ति की स्थिति प्राणिमात्र के देह में प्रसुप्त अवस्था में मानते हैं, जिसे कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं, जो भावना द्वारा जगाई जा सकती है।
मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रंथि विभेदिनी । मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रंथि विभेदिनी । आज्ञाचक्रान्तरास्था रुद्रग्रंथि विभेदिनी । सहस्राराम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी ॥ तडिल्लतासमरुचिः षट्चक्रोपरिसंस्थिता । महासक्तिः कुण्डलिनी विसतन्तुतनीयसी ॥ भवानी भावना गम्या भवारण्यकुठारिका ॥ (ल० स०)
भावना दो प्रकार की होती है:-आर्थीभावना और शाब्दी भावना । आर्थी भावना प्रवृत्तिरूपा होती है, यह स्थूलरूप है जिसका