सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें३२४ सौंदर्य लहरी
ब्रह्मणोऽभिन्नशक्तिस्तु ब्रह्मैव खलु नापरा । (सौर संहिता)
शक्ति ब्रह्म से अभिन्न होने के कारण ब्रह्म ही है अन्य नहीं । जड़चेतन भेद से उसके दोनों ही रूप हैं कहा है:—
चिच्छक्ति श्चेतनारूपा जडशक्तिर्जडात्मिका ।.
(ल० स०) देखे श्लोक ३, ५ सौ० ल०
सत्चित् आनन्द की अभिव्यक्ति अस्ति, भाति और प्रियता द्वारा सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रही है । अखिल ब्रह्मांड की भौतिक सत्ता सत् शक्ति का कार्य है, उसका ज्ञान प्राणिमात्र में प्रतिभासित् होने वाली चित् शक्ति का परिस्फुरण है, और उस बाह्य ज्ञान से उदय होने वाली प्रियता आनंद की प्रतिफलित क्रिया है । अर्थात् सत् शक्ति के आसन पर चिति शक्ति महात्रिपुर सुंदरी विराजमान है, जिस चिदानंद-लहरी से पिण्ड और ब्रह्मांड दोनों व्याप्त हैं और परब्रह्म उसकी आत्मा है, (श्लोक ३४) । विश्व उस विश्वरूपा षोडश-कलात्मिका का विराट्देह है इसलिये स्थूल शरीराभिमानी जागरित्-स्थानों बहिःप्रज्ञः एकोनविंशति-मुखः स्थूलभुकवैश्वानरोजीव उसी का अभिन्न स्वरूप है ।
ललिता सहस्रनाम में कहा है—
विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ।
सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्यासर्वावस्थाविवर्जिता ॥