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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 415 में से

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सौंदर्य लहरी २९५

बंध लग जाने से शिर भी आगे को झुक जाता है और चिबुक कंठ कूप पर जा लगती है, उस समय दृष्टि नीचे की ओर झुक जाती है और उसे वैलक्ष्य नमित कह सकते हैं। इन्द्रिय संयम युक्त जालंधर बन्ध लगने पर शांभवी मुद्रा का फल यह होता है कि शक्ति का उत्थान होकर वह झट आज्ञा चक्र के ऊपर चढ जाती है, अर्थात् आज्ञा चक्रस्थ शिव के ललाट पर पदार्पण करती हुई सहस्रार में प्रवेश करने को उतावली हो उठती है। भर्त्तार पद से देहाभिमानी देह का पोषण करने वाला भर्ता ही महेश्वर है।

उपद्रष्टानुमन्ताच भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन्पुरुषः परः ॥ गीता

क्योंकि आज्ञा चक्र तक ही देहाभिमान रहता है, उसके ऊपर चित्त की अवस्था उन्मुन्याभिमुखी होने लगती है और देहाभिमान शिथिल होने पर भर्ता शब्द की उपयुक्तता कम होने लगती है।

शंकर भगवत्पाद ने स्थान २ पर भगवती के अंग प्रत्यंग की सुन्दरता का वर्णन करते समय उसके हावभावों में कामदेव का सहयोग दिखाया है, मानो कामदेव सदा भगवती का आश्रय लेकर अपना कार्य करता रहता है, और ऐसा प्रतीत होता है कि मानो भगवती कामदेव की ही प्रति मूर्ति है। कादि विद्या का प्रथम अक्षर ककार है, जिससे ब्रह्म की आदि काम रूपा शक्ति अभिप्रेत है। उसकी त्रिपुरतापिन्युपनिषद में इस प्रकार व्याख्या मिलती है।

स एको देवः शिव रूपी दृश्यत्वेन विकासते, यतिषु, यज्ञेषु, योगिषु कामयते । कामं जायते । स एष निरंजनोऽका-

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