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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 344, कुल 415 में से

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२९४ सौंदर्य लहरी


पूर्व श्लोक में शिवजी को भगवती के चरणों के ताडन की स्पृहा दिखाकर, इस श्लोक में यह दिखाया गया है कि भगवती ने भर्त्तार के ललाट पर चरण कमलों से लात मारकर उनकी इच्छा पूरी की । इसका सामान्य अर्थ शृंगार रस पूर्ण है और शृंगार रस के प्रेमी जन प्रेयसी के चरणस्पर्श करना, अथवा उसके पदप्रहारों से प्रसन्न होना शृंगार-रस की विशेषता मानते हैं । श्रीकृष्ण भगवान से भी राधिका के भक्त गण उनके चरण पलोटन कराने में अपनी उपासना की उत्कृष्टता समझते हैं । परन्तु आपत्ति जनक विषय तो यह है कि क्या ९७ श्लोकोक्त सतीत्व की चरम सीमा पति के ललाट पर पद प्रहार करने में होती है । ऐसे विरुद्ध भावों का समन्वय कैसे किया जा सकता है ? इसलिये हम इसका कूटार्थ योगपर दिखाने का नीचे यत्न करते हैं । सामान्य भाव तो यह ही है कि शंकर जिन्होंने काम को भस्म कर दिया, वह भी पत्नि की लातें खाकर काम के उपहास्यास्पद बनते हैं ।

इस श्लोक का दूसरा अर्थ इस प्रकार किया जा सकता है । गोत्र का अर्थ इन्द्रिय संयम किया जा सकता है, अर्थात् 'गां त्रायते इति गोत्रम्' इसलिये गोत्रस्खलनं से इन्द्रिय संयम की गिरावट अथवा इन्द्रिय संयम से च्युत होना है, उसको मृषाकृत्वा अर्थात् झूटा करने से इन्द्रिय संयम की कमी को पूरा करने का अभिप्राय है वैलक्ष्यनमितं उस दृष्टि को कहते हैं, जिसमें लक्ष्य रहित दृष्टि नीचे को झुकी होती है । शांभवी मुद्रा में भी नेत्रों की मुद्रा ऐसी ही रहती है । जिसमें अन्तर्लक्ष्य बहिर्दृष्टि होने से दृष्टि लक्ष्य रहित हो जाती है, और नेत्र अर्धोन्मीलित से खुले रहते हैं, जालंधर