सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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ज्योति सत्त्व गुण, ये तीनों क्रमशः अग्नि, सूर्य और सोम के मण्डल बनाती हैं।
४३ त्रिकोणों को समिधाओं से उपमित किया जाने से यह अभिप्राय प्रतीत होता है कि ये सब अग्नि और सूर्य मंडलों के अन्तर्गत होने चाहिये क्योंकि चन्द्रमा को समिधा की आवश्यकता नहीं होती। इसलिये अष्ट दल और षोडश दल पद्म चन्द्रमण्ड में होने चाहिये, चतुर्दशार और बहिर्दशार सूर्य मंडल में, और अन्तर्दशार एवं अष्टार अग्नि मण्डल में। मध्य त्रिकोण शक्ति का स्थान है और भूगृह तीनों पुर अर्थात् भूर्भुवः स्वः तीनों लोकों का प्रतीक है।
अन्तर्दशार और बहिर्दशार के दस २ दलों को अग्नि की दस २ कलायें, अष्टार के ८ दलों को अष्टवसु अथवा ८ दिशाओं रूपी ८ समिधा और चतुर्दशार के १४ दलों को सप्ताह की दिन रात्रियों रूपी १४ समिधाओं से उपमित किया जा सकता है।
यास्तिस्रोरेखाः सदनानि भूस्त्रीस्त्रिविष्टपास्त्रिगुणास्त्रिप्रकाराः ।
एतन्त्रयं पूरकं पूरकाणां मंत्री प्रथते मदनो मदन्या ॥७॥
**अर्थः—**जो तीन रेखा हैं वे तीन सदन अर्थात लोक हैं, तीन प्रकार तीन गुण हैं। इस तीन मण्डलों से बने श्रीचक्र का कामेश्वरी मंत्र द्वारा मदन मंत्रीकरण करता है।