भारतकोश
सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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भगवती पुरके मध्य में धारण करती है। अर्थात् पुष्पवती विक- सिता विश्वमाता की 'ए'नामाख्या और जो शुक्ल पक्ष की १५ तिथियों युक्त है वह नित्या शिवाभिमुखसषोडशीक मध्य में स्वर- युक्त है उसे पुरके मध्य में लिये हुए श्रीचक्र अथवा सहस्रारस्थ अकथ चक्र को धारण करती है ।

इस श्रुति का संकेत अष्टम मंत्रोक्त विद्या की ओर और विशुद्ध चक्र एवं श्रीचक्र के पूजन की विधि की ओर है । अर्थात् कादिविद्या को सषोडशीक लेना चाहिये, जिसके १५ अक्षर शुक्लपक्ष की तिथियों के सदृश विकसित हो रहे हैं । अविः से रजस्वला स्त्री का अर्थ ग्रहण नहीं करना चाहिये । उसका अर्थ शिवाभिमुख अर्थात् शिव की ओर मुख किये हुए मोक्ष मार्ग की ओर ले जाने वाली होनी चाहिये । विशुद्ध चक्र जो सब स्वरों का स्थान है उसमें उसका ध्यान करना चाहिये, जिसके दल सह- स्रार की ओर विकसित हो रहे हैं ।

यद्वा मंडलाद्वा स्तनविम्बमेकं मुखं चाधस्त्रीणि गुहासदनानि । कामीकलां कामरूपां चिन्तित्वा नरो जायते कामरूपश्चकामः ॥१२॥

अर्थः— अथवा जो गोल होने के कारण स्तनबिम्ब के सदृश एक मुख वाला है और उसके नीचे तीन गुहा सदृश घर बने हुए हैं एसी कामरूपा कला के कोई सकामी मनुष्य अनु-