सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११
ष्ठान में लाता है तो उसकी कामना पूर्ण होती है और वह स्वयं कामरूप हो जाता है। यहां कामबीज की ओर संकेत है।
परिस्रुतं झषमाजंफलं च भक्तानि योनीः सुपरिष्कृताश्च । निवेदयन्देवतायै महत्यै स्वात्मीकृते सुकृते सिद्धिमेति ॥१२॥
अर्थः— परिस्रुतं=मदिरा, झषं=मत्स्य, नागरवेल, आजं= अजा से संबंध रखने वाला फल, अथवा आज्यं घी और फल अथवा झषा नागबला से उत्पन्न होने वाला फल, भात भोजन के पदार्थ, और योनियों को अच्छी तरह साफ सुथरा करके महादेवी को नैवेद्य देकर अपने लिये किये हुए सुकृत से सिद्धि पाता है। यह सारी विद्या सांगोपांग अति गोपनीय है, इसका यंत्र, मंत्र, पूजन विधि और पूजन की सामग्री का वर्णन कूट शब्दों में किया गया है। वास्तविक अर्थ सांप्रदायिक आचार्यों के मुख से ही जाना जा सकता है। इसलिये नैवेद्य की सामग्री के नाम भी कूट शब्दों में बताये हैं। जैसे परिस्रुतं मदिरा, झषं मछली, आजंबकरे का मांस. योनि स्त्री की योनि इत्यादि वास्तव में इन निषिद्ध पदार्थों के नामों द्वारा कूटशब्दों में अध्यात्म निवेदन निहित है। उसको गुप्त रखा गया है। परिस्रुतं से कुण्डलिनी जागरणोपरान्त अनुभव में आने वाली आध्यात्म मस्ती का संकेत है, झषमाजफलं से कर्मों का फल, भक्तानि से प्रारब्ध भोग और योनी से उनकी कारण भूत वासनायें समझनीं चाहिये।