सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
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अर्थात गौण उपचार है। वाह्य और अभ्यन्तर इन्द्रियों की रूप ग्रहण करने की योग्यता बनी रहे यह इच्छा आवाहन है। उन वाह्याभ्यन्तर कर्मों की एक विषय पर स्थिरता आसन है। रक्त और शुक्ल पदों का एकीकरण पाद्य है। (ईडा और पिंगला शक्ति के दोनों चरणों में शक्त्यात्मक पद रक्त है और शिवात्मक पद शुक्ल है। आमोद और आनंद का प्रकाश आसनदान और अर्घ्यदान। स्वतः सिद्ध स्वच्छता आचमन। चन्द्रमयी चिति से सर्वांग स्रवण स्नान है। चिदग्नि स्वरुप परमानन्द शक्ति का स्फुरण वस्त्र है। सत्ताइस भेदों से युक्त क्रिया, इच्छा और ज्ञान रूपी ब्रह्म ग्रंथिवाली छः तन्तु की ब्रह्म नाडी ब्रह्म सूत्र है। प्रत्येक क्रिया शक्ति, इच्छा और ज्ञान शक्ति के २७ भेद कहे गये हैं। अधिभौतिक, अधिदैविक, और अध्यात्म भेद से तीनों शक्तियां तीन तीन प्रकार की होती है। फिर प्रत्येक के मृदु मध्य और तीव्र भेद से तीनों के नवधा भेद समझना चाहिये। फिर प्रत्येक के सुख दुःख और मोहात्मक अथवा सात्विक राजसिक और तामसिक भेद से सत्ताईस भेद होते हैं। मृदु मध्य और तीव्र के स्थान पर मनसा वाचा कर्मणा भेद से भी तीनों को त्रिधा माना जा सकता है। ब्रह्म सूत्र में तीन ग्रंथियां इच्छा ज्ञान और क्रिया रूपा है और उसमें छः तन्तु है। तीनों की शक्तियां शिव शक्ति अथवा ईडा पिंगला भेद से ६ प्रकार की होती हैं। इस प्रकार २७ तारों का यज्ञोपवीत बट कर उसकी छ डोरियों