सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 405, कुल 415 में से
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ने सुषुम्ना रूपी ब्रह्म सूत्र बना है। अपने को वस्तु संग रहित पृथक स्मरण करना विभूषण है। सच्चिदानन्द की परिपूर्णता का स्मरण करना गंध है। सब विषयों का एकाग्रस्थिर मन से अनुसंधान करना पुष्प हैं। उन को ही सर्वदा स्वीकार करना धूप है। सच्चित् स्वरूप उल्काकाश देह वाला जो पवन के झोकों से न हिलने वाला उर्द्ध शिखा युक्त प्रज्वलित दीप है। सर्वथा यातायात वर्जित एकान्तवास नैवेद्य है। तीनों अवस्थाओं का एकीकरण तांबूल है। मूलाधार से ब्रह्मरंध्र पर्यन्त और ब्रह्मरंध्र से मूलाधार तक आना जाना प्रदक्षिणा है। तुर्यावस्था नमस्कार है। देह के शून्य होने पर प्रमातृत्व का लय होना बलि हरण है। सत्य हैं कर्तव्य और अकर्तव्य परन्तु उदासीनता के भाव में नित्य आत्मा को मग्न रखना होम है। स्वयं उसकी पादुकाओं में निमग्नता परिपूर्ण ध्यान है। इस प्रकार तीन मुहूर्त्त भावना करने वाला जीवन्मुक्त हो जाता है। उसे सायुज्य देवात्मैक्य सिद्धि होती है। उसके चिन्तित कार्य बिना यत्न के सिद्ध होते हैं। वह ही शिवयोगी कहलाता है। यह कादि हादि मत के अनुसार भावना प्रतिपादित् की गई है। जो ऐसा जानता है वह जीवन मुक्त हो जाता है। वह जीवन मुक्त हो जाता है।
इति उपनिषत् । ॐ भद्रं कर्णे भिरिति शान्तिः।
हरीः ॐ तत्सत् ।
इत्यथर्वण वेदे भावनोपनिषद् हिन्दी अनुवाद।